सुन्दरकाण्ड, सर्ग 54
वीक्षमाणस्ततो लङ्कां कपिः कृतमनोरथः । वर्धमानसमुत्साहः कार्यशेषमचिन्तयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके सभी मनोरथ पूर्ण हो गये थे । उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था । अतः वे लङ्काका निरीक्षण करते हुए शेष कार्यके सम्बन्धमें विचार करने लगे—॥ १ ॥
किं नु खल्ववशिष्टं मे कर्तव्यमिह साम्प्रतम् । यदेषां रक्षसां भूयः संतापजननं भवेत् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘अब इस समय लङ्कामें मेरे लिये कौन-सा ऐसा कार्य बाकी रह गया है, जो इन राक्षसोंको अधिक संताप देनेवाला हो ॥ २ ॥
वनं तावत्प्रमथितं प्रकृष्टा राक्षसा हताः । बलैकदेशः क्षपितः शेषं दुर्गविनाशनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘प्रमदावनको तो मैंने पहले ही उजाड़ दिया था, बड़े-बड़े राक्षसोंको भी मौतके घाट उतार दिया और रावणकी सेनाके भी एक अंशका संहार कर डाला । अब दुर्गका विध्वंस करना शेष रह गया ॥ ३ ॥
दुर्गे विनाशिते कर्म भवेत् सुखपरिश्रमम् । अल्पयत्नेन कार्येऽस्मिन् मम स्यात् सफलः श्रमः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘दुर्गका विनाश हो जानेपर मेरे द्वारा समुद्र-लङ्घन आदि कर्मके लिये किया गया प्रयास सुखद एवं सफल होगा । मैंने सीताजीकी खोजके लिये जो परिश्रम किया है, वह थोड़े-से ही प्रयत्नद्वारा सिद्ध होनेवाले लङ्कादहनसे सफल हो जायगा ॥ ४ ॥
यो ह्ययं मम लाङ्गूले दीप्यते हव्यवाहनः । अस्य संतर्पणं न्याय्यं कर्तुमेभिर्गृहोत्तमैः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेरी पूँछमें जो ये अग्निदेव देदीप्यमान हो रहे हैं, इन्हें इन श्रेष्ठ गृहोंकी आहुति देकर तृप्त करना न्यायसंगत जान पड़ता है’ ॥ ५ ॥
ततः प्रदीप्तलाङ्गूलः सविद्युदिव तोयदः । भवनाग्रेषु लङ्काया विचचार महाकपिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
ऐसा सोचकर जलती हुई पूँछके कारण विजलीसहित मेघकी भाँति शोभा पानेवाले कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी लङ्काके महलोंपर घूमने लगे ॥ ६ ॥
गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च वानरः । वीक्षमाणो ह्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ॥ ७ ॥
भावार्थ
वे वानरवीर राक्षसोंके एक घरसे दूसरे घरपर पहुँचकर उद्यानों और राजभवनोंको देखते हुए निर्भय होकर विचरने लगे ॥ ७ ॥
अवप्लुत्य महावेगः प्रहस्तस्य निवेशनम् । अग्निं तत्र विनिक्षिप्य श्वसनेन समो बली ॥ ८ ॥ ततोऽन्यत् पुप्लुवे वेश्म महापार्श्वस्य वीर्यवान् । मुमोच हनुमानग्निं कालानलशिखोपमम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
घूमते-घूमते वायुके समान बलवान् और महान् वेगशाली हनुमान् उछलकर प्रहस्तके महलपर जा पहुँचे और उसमें आग लगाकर दूसरे घरपर कूद पड़े । वह महापार्श्वका निवासस्थान था । पराक्रमी हनुमान्ने उसमें भी कालाग्निकी लपटोंके समान प्रज्वलित होनेवाली आग फैला दी ॥ ८-९ ॥
वज्रदंष्ट्रस्य च तथा पुप्लुवे स महाकपिः । शुकस्य च महातेजाः सारणस्य च धीमतः ॥ १० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वे महातेजस्वी महाकपि क्रमशः वज्रदंष्ट्र, शुक और बुद्धिमान् सारणके घरोंपर कूदे और उनमें आग लगाकर आगे बढ़ गये ॥ १० ॥
तथा चेन्द्रजितो वेश्म ददाह हरियूथपः । जम्बुमालेः सुमालेश्च ददाह भवनं ततः ॥ ११ ॥
भावार्थ
इसके बाद वानरयूथपति हनुमान्ने इन्द्रविजयी मेघनादका घर जलाया । फिर जम्बुमाली और सुमालीके घरोंको फूँक दिया ॥ ११ ॥
रश्मिकेतोश्च भवनं सूर्यशत्रोस्तथैव च । ह्रस्वकर्णस्य दंष्ट्रस्य रोमशस्य च रक्षसः ॥ १२ ॥ युद्धोन्मत्तस्य मत्तस्य ध्वजग्रीवस्य रक्षसः । विद्युज्जिह्वस्य घोरस्य तथा हस्तिमुखस्य च ॥ १३ ॥ करालस्य विशालस्य शोणिताक्षस्य चैव हि । कुम्भकर्णस्य भवनं मकराक्षस्य चैव हि ॥ १४ ॥ नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः । यज्ञशत्रोश्च भवनं ब्रह्मशत्रोस्तथैव च ॥ १५ ॥ वर्जयित्वा महातेजा विभीषणगृहं प्रति । क्रममाणः क्रमेणैव ददाह हरिपुङ्गवः ॥ १६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, दंष्ट्र, राक्षस रोमश, रणोन्मत्त मत्त, ध्वजग्रीव, भयानक विद्युजिह्न, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, मकराक्ष, नरान्तक, कुम्भ, दुरात्मा निकुम्भ, यज्ञशत्रु और ब्रह्मशत्रु आदि राक्षसोंके घरोंमें जा-जाकर उन्होंने आग लगायी ॥ उस समय महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने केवल विभीषणका घर छोड़कर अन्य सब घरोंमें क्रमशः पहुँचकर उन सबमें आग लगा दी ॥ १६ ॥
तेषु तेषु महार्हेषु भवनेषु महायशाः । गृहेष्वृद्धिमतामृद्धिं ददाह कपिकुञ्जरः ॥ १७ ॥
भावार्थ
महायशस्वी कपिकुञ्जर पवनकुमारने विभिन्न बहुमूल्य भवनोंमें जा-जाकर समृद्धिशाली राक्षसोंके घरोंकी सारी सम्पत्ति जलाकर भस्म कर डाली ॥ १७ ॥
सर्वेषां समतिक्रम्य राक्षसेन्द्रस्य वीर्यवान् । आससादाथ लक्ष्मीवान् रावणस्य निवेशनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
सबके घरोंको लाँघते हुए शोभाशाली पराक्रमी हनुमान् राक्षसराज रावणके महलपर जा पहुँचे ॥ १८ ॥
ततस्तस्मिन् गृहे मुख्ये नानारत्नविभूषिते । मेरुमन्दरसंकाशे नानामङ्गलशोभिते ॥ १९ ॥ प्रदीप्तमग्निमुत्सृज्य लाङ्गूलाग्रे प्रतिष्ठितम् । ननाद हनुमान् वीरो युगान्तजलदो यथा ॥ २० ॥
भावार्थ
वही लङ्काके सब महलोंमें श्रेष्ठ, भाँति-भाँतिके रत्नोंसे विभूषित, मेरुपर्वतके समान ऊँचा और नाना प्रकारके माङ्गलिक उत्सवोंसे सुशोभित था । अपनी पूँछके अग्रभागमें प्रतिष्ठित हुई प्रज्वलित अग्निको उस महलमें छोड़कर वीरवर हनुमान् प्रलयकालके मेघकी भाँति भयानक गर्जना करने लगे ॥ १९-२० ॥
श्वसनेन च संयोगादतिवेगो महाबलः । कालाग्निरिव जज्वाल प्रावर्धत हुताशनः ॥ २१ ॥
भावार्थ
हवाका सहारा पाकर वह प्रबल आग बड़े वेगसे बढ़ने लगी और कालाग्निके समान प्रज्वलित हो उठी ॥२१॥
प्रदीप्तमग्निं पवनस्तेषु वेश्मसु चारयन् । तानि काञ्चनजालानि मुक्तामणिमयानि च ॥ २२ ॥ भवनानि व्यशीर्यन्त रत्नवन्ति महान्ति च । तानि भग्नविमानानि निपेतुर्वसुधातले ॥ २३ ॥
भावार्थ
वायु उस प्रज्वलित अग्निको सभी घरोंमें फैलाने लगी । सोनेकी खिड़कियोंसे सुशोभित, मोती और मणियोंद्वारा निर्मित तथा रत्नोंसे विभूषित ऊँचे-ऊँचे प्रासाद एवं सतमहले भवन फट-फटकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २२-२३ ॥
भवनानीव सिद्धानामम्बरात् पुण्यसंक्षये । संजज्ञे तुमुलः शब्दो राक्षसानां प्रधावताम् ॥ २४ ॥ स्वे स्वे गृहपरित्राणे भग्नोत्साहोज्झितश्रियाम् ।
भावार्थ
वे गिरते हुए भवन पुण्यका क्षय होनेपर आकाशसे नीचे गिरनेवाले सिद्धोंके घरोंके समान जान पड़ते थे । उस समय राक्षस अपने-अपने घरोंको बचाने—उनकी आग बुझानेके लिये इधर-उधर दौड़ने लगे । उनका उत्साह जाता रहा और उनकी श्री नष्ट हो गयी थी । उन सबका तुमुल आर्तनाद चारों ओर गूँजने लगा ॥ २४½ ॥
नूनमेषोऽग्निरायातः कपिरूपेण हा इति ॥ २५ ॥ क्रन्दन्त्यः सहसा पेतुः स्तनंधयधराः स्त्रियः ।
भावार्थ
वे कहते थे—‘हाय ! यह वानरके रूपमें साक्षात् अग्नि देवता ही आ पहुँचा है ।’ कितनी ही स्त्रियाँ गोदमें बच्चे लिये सहसा क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं ॥२५½॥
काश्चिदग्निपरीताङ्ग्यो हर्म्येभ्यो मुक्तमूर्धजाः ॥ २६ ॥ पतन्त्यो रेजिरेऽभ्रेभ्यः सौदामन्य इवाम्बरात् ।
भावार्थ
कुछ राक्षसियोंके सारे अङ्ग आगकी लपेटमें आ गये, वे बाल बिखेरे अट्टालिकाओंसे नीचे गिर पड़ीं । गिरते समय वे आकाशमें स्थित मेघोंसे गिरनेवाली बिजलियोंके समान प्रकाशित होती थीं ॥ २६½ ॥
वज्रविद्रुमवैदूर्यमुक्तारजतसंहतान् ॥ २७ ॥ विचित्रान् भवनाद्धातूस्स्यन्दमानान् ददर्श सः ।
भावार्थ
हनुमान्जीने देखा जलते हुए घरोंसे हीरा, मूँगा, नीलम, मोती तथा सोने, चाँदी आदि विचित्र-विचित्र धातुओंकी राशि पिघल-पिघलकर बही जा रही है ॥ २७½ ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां तृणानां च यथा तथा ॥ २८ ॥ हनुमान् राक्षसेन्द्राणां वधे किंचिन्न तृप्यति । न हनूमद्विशस्तानां राक्षसानां वसुन्धरा ॥ २९ ॥
भावार्थ
जैसे आग सूखे काठ और तिनकोंको जलानेसे कभी तृप्त नहीं होती, उसी प्रकार हनुमान् बड़े-बड़े राक्षसोंके वध करनेसे तनिक भी तृप्त नहीं होते थे और हनुमान्जीके मारे हुए राक्षसोंको अपनी गोदमें धारण करनेसे इस वसुन्धरा-का भी जी नहीं भरता था ॥ २८-२९ ॥
हनूमता वेगवता वानरेण महात्मना । लङ्कापुरं प्रदग्धं तद् रुद्रेण त्रिपुरं यथा ॥ ३० ॥
भावार्थ
जैसे भगवान् रुद्रने पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था, उसी प्रकार वेगशाली वानरवीर महात्मा हनुमान्जीने लङ्कापुरीको जला दिया ॥ ३० ॥
ततः स लङ्कापुरपर्वताग्रे समुत्थितो भीमपराक्रमोऽग्निः । प्रसार्य चूडावलयं प्रदीप्तो हनूमता वेगवतोपसृष्टः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् लङ्कापुरीके पर्वत-शिखरपर आग लगी, वहाँ अग्निदेवका बड़ा भयानक पराक्रम प्रकट हुआ । वेगशाली हनुमान्जीकी लगायी हुई वह आग चारों ओर अपने ज्वाला-मण्डलको फैलाकर बड़े जोरसे प्रज्वलित हो उठी ॥ ३१ ॥
युगान्तकालानलतुल्यरूपः समारुतोऽग्निर्ववृधे दिवस्पृक् । विधूमरश्मिर्भवनेषु सक्तो रक्षःशरीराज्यसमर्पितार्चिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
हवाका सहारा पाकर वह आग इतनी बढ़ गयी कि उसका रूप प्रलयकालीन अग्निके समान दिखायी देने लगा । उसकी ऊँची लपटें मानो स्वर्गलोकका स्पर्श कर रही थीं । लङ्काके भवनोंमें लगी हुई उस आगकी ज्वालामें धूमका नाम भी नहीं था । राक्षसोंके शरीररूपी घीकी आहुति पाकर उसकी ज्वालाएँ उत्तरोत्तर बढ़ रही थीं ॥ ३२ ॥
आदित्यकोटीसदृशः सुतेजा लङ्कां समस्तां परिवार्य तिष्ठन् । शब्दैरनेकैरशनिप्ररूढै- र्भिन्दन्निवाण्डं प्रबभौ महाग्निः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
समूची लङ्कापुरीको अपनी लपटोंमें लपेटकर फैली हुई वह प्रचण्ड आग करोड़ों सूर्योंके समान प्रज्वलित हो रही थी । मकानों और पर्वतोंके फटने आदिसे होनेवाले नाना प्रकारके धड़ाकोंके शब्द बिजलीकी कड़कको भी मात करते थे, उस समय वह विशाल अग्नि ब्रह्माण्डको फोड़ती हुई-सी प्रकाशित हो रही थी ॥ ३३ ॥
तत्राम्बरादग्निरतिप्रवृद्धो रूक्षप्रभः किंशुकपुष्पचूडः । निर्वाणधूमाकुलराजयश्च नीलोत्पलाभाः प्रचकाशिरेऽभ्राः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
वहाँ धरतीसे आकाशतक फैली हुई अत्यन्त बढ़ी-चढ़ी आगकी प्रभा बड़ी तीखी प्रतीत होती थी । उसकी लपटें टेसूके फूलकी भाँति लाल दिखायी देती थीं । नीचेसे जिनका सम्बन्ध टूट गया था, वे आकाशमें फैली हुई धूम-पंक्तियाँ नील कमलके समान रंगवाले मेघोंकी भाँति प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३४ ॥
वज्री महेन्द्रस्त्रिदशेश्वरो वा साक्षाद् यमो वा वरुणोऽनिलो वा । रौद्रोऽग्निरर्को धनदश्च सोमो न वानरोऽयं स्वयमेव कालः ॥ ३५ ॥ किं ब्रह्मणः सर्वपितामहस्य लोकस्य धातुश्चतुराननस्य । इहागतो वानररूपधारी रक्षोपसंहारकरः प्रकोपः ॥ ३६ ॥ किं वैष्णवं वा कपिरूपमेत्य रक्षोविनाशाय परं सुतेजः । अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तमेकं स्वमायया साम्प्रतमागतं वा ॥ ३७ ॥ इत्येवमूचुर्बहवो विशिष्टा रक्षोगणास्तत्र समेत्य सर्वे । सप्राणिसङ्घां सगृहां सवृक्षां दग्धां पुरीं तां सहसा समीक्ष्य ॥ ३८ ॥ ततस्तु लङ्का सहसा प्रदग्धा सराक्षसा साश्वरथा सनागा । सपक्षिसङ्घा समृगा सवृक्षा रुरोद दीना तुमुलं सशब्दम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘प्राणियोंके समुदाय, गृह और वृक्षोंसहित समस्त लङ्कापुरीको सहसा दग्ध हुई देख बड़े-बड़े राक्षस झुंड-के-झुंड एकत्र हो गये और वे सब-के-सब परस्पर इस प्रकार कहने लगे—‘यह देवताओंका राजा वज्रधारी इन्द्र अथवा साक्षात् यमराज तो नहीं है ? वरुण, वायु, रुद्र, अग्नि, सूर्य, कुबेर या चन्द्रमामेंसे तो कोई नहीं है ? यह वानर नहीं साक्षात् काल ही है । क्या सम्पूर्ण जगत्के पितामह चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रचण्ड कोप ही वानरका रूप धारण करके राक्षसोंका संहार करनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ है ? अथवा भगवान् विष्णुका महान् तेज जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त और अद्वितीय है, अपनी मायासे वानरका शरीर ग्रहण करके राक्षसोंके विनाशके लिये तो इस समय नहीं आया है ?’ ॥ इस प्रकार घोड़े, हाथी, रथ, पशु, पक्षी, वृक्ष तथा कितने ही राक्षसोंसहित लङ्कापुरी सहसा दग्ध हो गयी । वहाँके निवासी दीनभावसे तुमुल नाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३९ ॥
हा तात हा पुत्रक कान्त मित्र हा जीवितेशाङ्ग हतं सुपुण्यम् । रक्षोभिरेवं बहुधा ब्रुवद्भिः शब्दः कृतो घोरतरः सुभीमः ॥ ४० ॥
भावार्थ
वे बोले—‘हाय रे बप्पा ! हाय बेटा ! हा स्वामिन् ! हा मित्र ! हा प्राणनाथ ! हमारे सब पुण्य नष्ट हो गये ।’ इस तरह भाँति-भाँतिसे विलाप करते हुए राक्षसोंने बड़ा भयंकर एवं घोर आर्तनाद किया ॥ ४० ॥
हुताशनज्वालसमावृता सा हतप्रवीरा परिवृत्तयोधा । हनूमतः क्रोधबलाभिभूता बभूव शापोपहतेव लङ्का ॥ ४१ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीके क्रोध-बलसे अभिभूत हुई लङ्कापुरी आगकी ज्वालासे घिर गयी थी । उसके प्रमुख-प्रमुख वीर मार डाले गये थे । समस्त योद्धा तितर-बितर और उद्विग्न हो गये थे । इस प्रकार वह पुरी शापसे आक्रान्त हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ४१ ॥
ससम्भ्रमं त्रस्तविषण्णराक्षसां समुज्ज्वलज्ज्वालहुताशनाङ्कितास् । ददर्श लङ्कां हनुमान् महामनाः स्वयंभुरोषोपहतामिवावनिम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
महामनस्वी हनुमान्ने लङ्कापुरीको स्वयम्भू ब्रह्माजीके रोषसे नष्ट हुई पृथ्वीके समान देखा । वहाँके समस्त राक्षस बड़ी घबराहटमें पड़कर त्रस्त और विषादग्रस्त हो गये थे । अत्यन्त प्रज्वलित ज्वालामालाओंसे अलंकृत अग्निदेवने उसपर अपनी छाप लगा दी थी ॥ ४२ ॥
भङ्क्त्वा वनं पादपरत्नसंकुलं हत्वा तु रक्षांसि महान्ति संयुगे । दग्ध्वा पुरीं तां गृहरत्नमालिनीं तस्थौ हनूमान् पवनात्मजः कपिः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
पवनकुमार वानरवीर हनुमान्जी उत्तमोत्तम वृक्षोंसे भरे हुए वनको उजाड़कर, युद्धमें बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर तथा सुन्दर महलोंसे सुशोभित लङ्कापुरीको जलाकर शान्त हो गये ॥ ४३ ॥
स राक्षसांस्तान् सुबहूंश्च हत्वा वनं च भङ्क्त्वा बहुपादपं तत् । विसृज्य रक्षोभवनेषु चाग्निं जगाम रामं मनसा महात्मा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
महात्मा हनुमान् बहुत-से राक्षसोंका वध और बहुसंख्यक वृक्षोंसे भरे हुए प्रमदावनका विध्वंस करके निशाचरोंके घरोंमें आग लगाकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करने लगे ॥ ४४ ॥
ततस्तु तं वानरवीरमुख्यं महाबलं मारुततुल्यवेगम् । महामतिं वायुसुतं वरिष्ठं प्रतुष्टुवुर्देवगणाश्च सर्वे ॥ ४५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सम्पूर्ण देवताओंने वानरवीरोंमें प्रधान, महाबलवान्, वायुके समान वेगवान्, परम बुद्धिमान् और वायुदेवताके श्रेष्ठ पुत्र हनुमान्जीका स्तवन किया ॥ ४५ ॥
देवाश्च सर्वे मुनिपुङ्गवाश्च गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च । भूतानि सर्वाणि महान्ति तत्र जग्मुः परां प्रीतिमतुल्यरूपाम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
उनके इस कार्यसे सभी देवता, मुनिवर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा सम्पूर्ण महान् प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हुए । उनके उस हर्षकी कहीं तुलना नहीं थी ॥ ४६ ॥
भङ्क्त्वा वनं महातेजा हत्वा रक्षांसि संयुगे । दग्ध्वा लङ्कापुरीं भीमां रराज स महाकपिः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी महाकपि पवनकुमार प्रमदावनको उजाड़कर, युद्धमें राक्षसोंको मारकर और भयंकर लङ्कापुरीको जलाकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ४७ ॥
गृहाग्र्यशृङ्गाग्रतले विचित्रे प्रतिष्ठितो वानरराजसिंहः । प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली व्यराजतादित्य इवार्चिमाली ॥ ४८ ॥
भावार्थ
श्रेष्ठ भवनोंके विचित्र शिखरपर खड़े हुए वानरराज-सिंह हनुमान अपनी जलती पूँछसे उठती हुई ज्वालामालाओंसे अलंकृत हो तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान सूर्यदेवके समान प्रकाशित होने लगे ॥ ४८ ॥
लङ्कां समस्तां सम्पीड्य लाङ्गूलाग्निं महाकपिः । निर्वापयामास तदा समुद्रे हरिपुङ्गवः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सारी लङ्कापुरीको पीड़ा दे वानरशिरोमणि महाकपि हनुमान्ने उस समय समुद्रके जलमें अपनी पूँछकी आग बुझायी ॥ ४९ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । दृष्ट्वा लङ्कां प्रदग्धां तां विस्मयं परमं गताः ॥ ५० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् लङ्कापुरीको दग्ध हुई देख देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि बड़े विस्मित हुए ॥ ५० ॥
तं दृष्ट्वा वानरश्रेष्ठं हनूमन्तं महाकपिम् । कालाग्निरिति संचिन्त्य सर्वभूतानि तत्रसुः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
उस समय वानरश्रेष्ठ महाकपि हनुमान्को देख ‘ये कालाग्नि हैं’ ऐसा मानकर समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे ॥५१॥
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