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सुन्दरकाण्ड, सर्ग 53

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवो महात्मनः । देशकालहितं वाक्यं भ्रातुरुत्तरमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

छोटे भाई महात्मा विभीषणकी बात देश और कालके लिये उपयुक्त एवं हितकर थी। उसको सुनकर दशाननने इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥

सम्यगुक्तं हि भवता दूतवध्या विगर्हिता । अवश्यं तु वधादन्यः क्रियतामस्य निग्रहः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘विभीषण ! तुम्हारा कहना ठीक है। वास्तवमें दूतके वधकी बड़ी निन्दा की गयी है; परंतु वधके अतिरिक्त दूसरा कोई दण्ड इसे अवश्य देना चाहिये ॥ २ ॥

कपीनां किल लाङ्गूलमिष्टं भवति भूषणम् । तदस्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दग्धेन गच्छतु ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘वानरोंको अपनी पूँछ बड़ी प्यारी होती है। वही इनका आभूषण है। अतः जितना जल्दी हो सके, इसकी पूँछ जला दो। जली पूँछ लेकर ही यह यहाँसे जाय ॥ ३ ॥

ततः पश्यन्त्वमुं दीनमङ्गवैरूप्यकर्शितम् । सुमित्रज्ञातयः सर्वे बान्धवाः सहृद्गजनाः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वहाँ इसके मित्र, कुटुम्बी, भाई-बन्धु तथा हितैषी सुहृद् इसे अङ्ग-भङ्गके कारण पीड़ित एवं दीन अवस्थामें देखें’ ॥ ४ ॥

आज्ञापयद् राक्षसेन्द्रः पुरं सर्वं सचत्वरम् । लाङ्गूलेन प्रदीप्तेन रक्षोभिः परिणीयताम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

फिर राक्षसराज रावणने यह आज्ञा दी कि ‘राक्षसगण इसकी पूँछमें आग लगाकर इसे सड़कों और चौराहोंसहित समूचे नगरमें घुमावें’ ॥ ५ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसाः कोपकर्कशाः । वेष्टन्ते तस्य लाङ्गूलं जीर्णैः कार्पासिकैः पटैः ॥ ६ ॥

भावार्थ

स्वामीका यह आदेश सुनकर क्रोधके कारण कठोरतापूर्ण बर्ताव करनेवाले राक्षस हनुमान्जीकी पूँछमें पुराने सूती कपड़े लपेटने लगे ॥ ६ ॥

संवेष्ट्यमाने लाङ्गूले व्यवर्धत महाकपिः । शुष्कमिन्धनमासाद्य वनेष्विव हुताशनम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

जब उनकी पूँछमें वस्त्र लपेटा जाने लगा, उस समय वनोंमें सूखी लकड़ी पाकर भभक उठनेवाली आगकी भाँति उन महाकपिका शरीर बढ़कर बहुत बड़ा हो गया ॥ ७ ॥

तैलेन परिषिच्याथ तेऽग्निं तत्रोपपादयन् । लाङ्गूलेन प्रदीप्तेन राक्षसांस्तानताडयत् ॥ ८ ॥ रोषामर्षपरीतात्मा बालसूर्यसमाननः ।

भावार्थ

राक्षसोंने वस्त्र लपेटनेके पश्चात् उनकी पूँछपर तेल छिड़क दिया और आग लगा दी। तब हनुमान्जीका हृदय रोषसे भर गया। उनका मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण आभासे उद्भासित हो उठा और वे अपनी जलती हुई पूँछसे ही राक्षसोंको पीटने लगे ॥ ८½ ॥

स भूयः संगतैः क्रूरै राक्षसैर्हरिपुङ्गवः ॥ ९ ॥ सहस्त्रीबालवृद्धाश्च जग्मुः प्रीतिं निशाचराः ।

भावार्थ

तब क्रूर राक्षसोंने मिलकर पुनः उन वानरशिरोमणिको कसकर बाँध दिया। यह देख स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंसहित समस्त निशाचर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ९½ ॥

निबद्धः कृतवान् वीरस्तत्कालसदृशीं मतिम् ॥ १० ॥ कामं खलु न मे शक्ता निबद्धस्यापि राक्षसाः । छित्त्वा पाशान् समुत्पत्य हन्यामहमिमान् पुनः ॥ ११ ॥

भावार्थ

तब वीरवर हनुमान्जी बँधे-बँधे ही उस समयके योग्य विचार करने लगे—‘यद्यपि मैं बँधा हुआ हूँ तो भी इन राक्षसोंका मुझपर जोर नहीं चल सकता। इन बन्धनोंको तोड़कर मैं ऊपर उछल जाऊँगा और पुनः इन्हें मार सकूँगा ॥ १०-११ ॥

यदि भर्तृहितार्थाय चरन्तं भर्तृशासनात् । निबध्नन्ते दुरात्मानो न तु मे निष्कृतिः कृता ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘मैं अपने स्वामी श्रीरामके हितके लिये विचर रहा हूँ, तो भी ये दुरात्मा राक्षस यदि अपने राजाके आदेशसे मुझे बाँध रहे हैं तो इससे मैं जो कुछ कर चुका हूँ, उसका बदला नहीं पूरा हो सका है ॥ १२ ॥

सर्वेषामेव पर्याप्तो राक्षसानामहं युधि । किं तु रामस्य प्रीत्यर्थं विषहिष्येऽहमीदृशम् ॥ १३ ॥ लङ्का चारयितव्या मे पुनरेव भवेदिति । रात्रौ नहि सुदृष्टा मे दुर्गकर्मविधानतः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मैं युद्धस्थलमें अकेला ही इन समस्त राक्षसोंका संहार करनेमें पूर्णतः समर्थ हूँ, किंतु इस समय श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये मैं ऐसे बन्धनको चुपचाप सह लूँगा ॥ ‘ऐसा करनेसे मुझे पुनः समूची लङ्कामें विचरने और इसके निरीक्षण करनेका अवसर मिलेगा; क्योंकि रातमें घूमनेके कारण मैंने दुर्गरचनाकी विधिपर दृष्टि रखते हुए इसका अच्छी तरह अवलोकन नहीं किया था ॥ १४ ॥

अवश्यमेव द्रष्टव्या मया लङ्का निशाक्षये । कामं बध्नन्तु मे भूयः पुच्छस्योद्दीपनेन च ॥ १५ ॥ पीडां कुर्वन्ति रक्षांसि न मेऽस्ति मनसः श्रमः ।

भावार्थ

‘अतः सबेरा हो जानेपर मुझे अवश्य ही लङ्का देखनी है । भले ही ये राक्षस मुझे बारंबार बाँधें और पूँछमें आग लगाकर पीड़ा पहुँचावें । मेरे मनमें इसके कारण तनिक भी कष्ट नहीं होगा’ ॥ १५½ ॥

ततस्ते संवृताकारं सत्त्ववन्तं महाकपिम् ॥ १६ ॥ परिगृह्य ययुर्हृष्टा राक्षसाः कपिकुञ्जरम् । शङ्खभेरीनिनादैश्च घोषयन्तः स्वकर्मभिः ॥ १७ ॥ राक्षसाः क्रूरकर्माणश्चारयन्ति स्म तां पुरीम् ।

भावार्थ

तदनन्तर वे क्रूरकर्मा राक्षस अपने दिव्य आकारको छिपाये रखनेवाले सत्त्वगुणशाली महान् वानरवीर कपिकुञ्जर हनुमान्जीको पकड़कर बड़े हर्षके साथ ले चले और शङ्ख एवं भेरी बजाकर उनके ( रावण-द्रोह आदि ) अपराधोंकी घोषणा करते हुए उन्हें लङ्कापुरीमें सब ओर घुमाने लगे ॥ १६-१७½ ॥

अन्वीयमानो रक्षोभिर्ययौ सुखमरिंदमः ॥ १८ ॥ हनूमांश्चारयामास राक्षसानां महापुरीम् । अथापश्यद् विमानानि विचित्राणि महाकपिः ॥ १९ ॥

भावार्थ

शत्रुदमन हनुमान्जी बड़ी मौजसे आगे बढ़ने लगे । समस्त राक्षस उनके पीछे-पीछे चल रहे थे । महाकपि हनुमान्जी राक्षसोंकी उस विशाल पुरीमें विचरते हुए उसे देखने लगे । उन्होंने वहाँ बड़े विचित्र विमान देखे ॥ १८-१९ ॥

संवृतान् भूमिभागांश्च सुविभक्तांश्च चत्वरान् । रथ्याश्च गृहसम्बाधाः कपिः शृङ्गाटकानि च ॥ २० ॥ तथा रथ्योपरथ्याश्च तथैव च गृहान्तरान् ।

भावार्थ

परकोटेसे घिरे हुए कितने ही भूभाग, पृथक्-पृथक् बने हुए सुन्दर चबूतरे, घनीभूत गृहपंक्तियोंसे घिरी हुई सड़कें, चौराहे, छोटी-बड़ी गलियाँ और घरोंके मध्यभाग–इन सबको वे बड़े गौरसे देखने लगे ॥ २०½ ॥

चत्वरेषु चतुष्केषु राजमार्गे तथैव च ॥ २१ ॥ घोषयन्ति कपिं सर्वे चार इत्येव राक्षसाः ।

भावार्थ

सब राक्षस उन्हें चौराहोंपर, चार खंभेवाले मण्डपोंमें तथा सड़कोंपर घुमाने और जासूस कहकर उनका परिचय देने लगे ॥ २१½ ॥

स्त्रीबालवृद्धा निर्जग्मुस्तत्र तत्र कुतूहलात् ॥ २२ ॥ तं प्रदीपितलाङ्गूलं हनूमन्तं दिदृक्षवः ।

भावार्थ

भिन्न-भिन्न स्थानोंमें जलती पूँछवाले हनुमान्जीको देखनेके लिये वहाँ बहुत-से बालक, वृद्ध और स्त्रियाँ कौतूहलवश घरसे बाहर निकल आती थीं ॥ २२½ ॥

दीप्यमाने ततस्तस्य लाङ्गूलाग्रे हनूमतः ॥ २३ ॥ राक्षस्यस्ता विरूपाक्ष्यः शंसुर्देव्यास्तदप्रियम् ।

भावार्थ

हनुमान्जीकी पूँछमें जब आग लगायी जा रही थी, उस समय भयंकर नेत्रोंवाली राक्षसियोंने सीतादेवीके पास जाकर उनसे यह अप्रिय समाचार कहा—॥ २३½ ॥

यस्त्वया कृतसंवादः सीते ताम्रमुखः कपिः ॥ २४ ॥ लाङ्गूलेन प्रदीप्तेन स एष परिणीयते ।

भावार्थ

‘सीते ! जिस लाल मुँहवाले बन्दरने तुम्हारे साथ बातचीत की थी, उसकी पूँछमें आग लगाकर उसे सारे नगरमें घुमाया जा रहा है’ ॥ २४½ ॥

श्रुत्वा तद् वचनं क्रूरमात्मापहरणोपमम् ॥ २५ ॥ वैदेही शोकसंतप्ता हुताशनमुपागमत् ।

भावार्थ

अपने अपहरणकी ही भाँति दुःख देनेवाली यह क्रूरतापूर्ण बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता शोकसे संतप्त हो उठीं और मन-ही-मन अग्निदेवकी उपासना करने लगीं ॥ २५½ ॥

मङ्गलाभिमुखी तस्य सा तदासीन्महाकपेः ॥ २६ ॥ उपतस्थे विशालाक्षी प्रयता हव्यवाहनम् ।

भावार्थ

उस समय विशाललोचना पवित्रहृदया सीता महाकपि हनुमान्जीके लिये मङ्गलकामना करती हुई अग्निदेवकी उपासनामें संलग्न हो गयीं और इस प्रकार बोलीं—॥ २६½ ॥

यद्यस्ति पतिशुश्रूषा यद्यस्ति चरितं तपः । यदि वा त्वेकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘अग्निदेव ! यदि मैंने पतिकी सेवा की है और यदि मुझमें कुछ भी तपस्या तथा पातिव्रत्यका बल है तो तुम हनुमान्के लिये शीतल हो जाओ ॥ २७ ॥

यदि किंचिदनुक्रोशस्तस्य मय्यस्ति धीमतः । यदि वा भाग्यशेषो मे शीतो भव हनूमतः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘यदि बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामके मनमें मेरे प्रति किंचिन्मात्र भी दया है अथवा यदि मेरा सौभाग्य शेष है तो तुम हनुमान्के लिये शीतल हो जाओ ॥ २८ ॥

यदि मां वृत्तसम्पन्नां तत्समागमलालसाम् । स विजानाति धर्मात्मा शीतो भव हनूमतः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘यदि धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी मुझे सदाचारसे सम्पन्न और अपनेसे मिलनेके लिये उत्सुक जानते हैं तो तुम हनुमान्के लिये शीतल हो जाओ ॥ २९ ॥

यदि मां तारयेदार्यः सुग्रीवः सत्यसंगरः । अस्माद् दुःखाम्बुसंरोधाच्छीतो भव हनूमतः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘यदि सत्यप्रतिज्ञ आर्य सुग्रीव इस दुःखके महासागरसे मेरा उद्धार कर सकें तो तुम हनुमान्के लिये शीतल हो जाओ’ ॥ ३० ॥

ततस्तीक्ष्णार्चिरव्यग्रः प्रदक्षिणशिखोऽनलः । जज्वाल मृगशावाक्ष्याः शंसन्निव शुभं कपेः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

मृगनयनी सीताके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव मानो उन्हें हनुमान्के मङ्गलकी सूचना देते हुए शान्तभावसे जलने लगे। उनकी शिखा प्रदक्षिणभावसे उठने लगी ॥ ३१ ॥

हनूमज्जनकश्चैव पुच्छानलयुतोऽनिलः । ववौ स्वास्थ्यकरो देव्याः प्रालेयानिलशीतलः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

हनुमान्के पिता वायुदेवता भी उनकी पूँछमें लगी हुई आगसे युक्त हो बर्फीली हवाके समान शीतल और देवी सीताके लिये स्वास्थ्यकारी (सुखद) होकर बहने लगे ॥३२॥

दह्यमाने च लाङ्गूले चिन्तयामास वानरः । प्रदीप्तोऽग्निरयं कस्मान्न मां दहति सर्वतः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उधर पूँछमें आग लगायी जानेपर हनुमान्जी सोचने लगे—‘अहो ! यह आग सब ओरसे प्रज्वलित होनेपर भी मुझे जलाती क्यों नहीं है ? ॥ ३३ ॥

दृश्यते च महाज्वालः करोति च न मे रुजम् । शिशिरस्येव सम्पातो लाङ्गूलाग्रे प्रतिष्ठितः ॥ ३४ ॥ अथ वा तदिदं व्यक्तं यद् दृष्टं प्लवता मया । रामप्रभावादाश्चर्यं पर्वतः सरितां पतौ ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘इसमें इतनी ऊँची ज्वाला उठती दिखायी देती है, तथापि यह आग मुझे पीड़ा नहीं दे रही है । मालूम होता है मेरी पूँछके अग्रभागमें बर्फका ढेर-सा रख दिया गया है।३४। ‘अथवा उस दिन समुद्रको लाँघते समय मैंने सागरमें श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावसे पर्वतके प्रकट होनेकी जो आश्चर्यजनक घटना देखी थी, उसी तरह आज यह अग्निकी शीतलता भी व्यक्त हुई है ॥ ३५ ॥

यदि तावत् समुद्रस्य मैनाकस्य च धीमतः । रामार्थं सम्भ्रमस्तादृक्किमग्निर्न करिष्यति ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘यदि श्रीरामके उपकारके लिये समुद्र और बुद्धिमान् मैनाकके मनमें वैसी आदरपूर्ण उतावली देखी गयी तो क्या अग्निदेव उन भगवान्के उपकारके लिये शीतलता नहीं प्रकट करेंगे ? ॥ ३६ ॥

सीतायाश्चानृशंस्येन तेजसा राघवस्य च । पितुश्च मम सख्येन न मां दहति पावकः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘निश्चय ही भगवती सीताकी दया, श्रीरघुनाथजीके तेज तथा मेरे पिताकी मैत्रीके प्रभावसे अग्निदेव मुझे जला नहीं रहे हैं’ ॥ ३७ ॥

भूयः स चिन्तयामास मुहूर्तं कपिकुञ्जरः । कथमस्मद्विधस्येह बन्धनं राक्षसाधमैः ॥ ३८ ॥ प्रतिक्रियास्य युक्ता स्यात् सति मह्यं पराक्रमे ।

भावार्थ

तदनन्तर कपिकुञ्जर हनुमान्ने पुनः एक मुहूर्ततक इस प्रकार विचार किया ‘मेरे-जैसे पुरुषका यहाँ इन नीच निशाचरोंद्वारा बाँधा जाना कैसे उचित हो सकता है ? पराक्रम रहते हुए मुझे अवश्य इसका प्रतीकार करना चाहिये’ ३८½

ततश्छित्त्वा च तान् पाशान् वेगवान् वै महाकपिः ॥ ३९ ॥ उत्पपाताथ वेगेन ननाद च महाकपिः ।

भावार्थ

यह सोचकर वे वेगशाली महाकपि हनुमान् ( जिन्हें राक्षसोंने पकड़ रखा था) उन बन्धनोंको तोड़कर बड़े वेगसे ऊपरको उछले और गर्जना करने लगे ( उस समय भी उनका शरीर रस्सियोंमें बँधा हुआ ही था ) ॥ ३९½ ॥

पुरद्वारं ततः श्रीमाञ्शैलशृङ्गमिवोन्नतम् ॥ ४० ॥ विभक्तरक्षःसम्बाधमाससादानिलात्मजः ।

भावार्थ

उछलकर वे श्रीमान् पवनकुमार पर्वत-शिखरके समान ऊँचे नगरद्वारपर जा पहुँचे, जहाँ राक्षसोंकी भीड़ नहीं थी ॥ ४०½ ॥

स भूत्वा शैलसंकाशः क्षणेन पुनरात्मवान् ॥ ४१ ॥ ह्रस्वतां परमां प्राप्तो बन्धनान्यवशातयत् । विमुक्तश्चाभवच्छ्रीमान् पुनः पर्वतसंनिभः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

पर्वताकार होकर भी वे मनस्वी हनुमान् पुनः क्षणभरमें बहुत ही छोटे और पतले हो गये । इस प्रकार उन्होंने अपने सारे बन्धनोंको निकाल फेंका । उन बन्धनोंसे मुक्त होते ही तेजस्वी हनुमान्जी फिर पर्वतके समान विशालकाय हो गये ॥ ४१-४२ ॥

वीक्षमाणश्च दद्दशे परिघं तोरणाश्रितम् । स तं गृह्य महाबाहुः कालायसपरिष्कृतम् । रक्षिणस्तान् पुनः सर्वान् सूदयामास मारुतिः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

उस समय उन्होंने जब इधर-उधर दृष्टि डाली, तब उन्हें फाटकके सहारे रक्खा हुआ एक परिघ दिखायी दिया । काले लोहेके बने हुए उस परिघको लेकर महाबाहु पवन-पुत्रने वहाँके समस्त रक्षकोंको फिर मार गिराया ॥ ४३ ॥

स तान् निहत्वा रणचण्डविक्रमः समीक्षमाणः पुनरेव लङ्काम् । प्रदीप्तलाङ्गूलकृतार्चिमाली प्रकाशितादित्य इवार्चिमाली ॥ ४४ ॥

भावार्थ

उन राक्षसोंको मारकर रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले हनुमान्जी पुनः लङ्कापुरीका निरीक्षण करने लगे । उस समय जलती हुई पूँछसे जो ज्वालाओंकी माला-सी उठ रही थी, उससे अलंकृत हुए वे वानरवीर तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४४ ॥

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