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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 51

इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम् । अब्रवीत् तां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम् ॥ १ ॥

भावार्थ

इस तरह पूछकर हनुमान्जी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करनेवाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनीसे वहाँ फिर बोले—॥ १ ॥

इदं प्रविष्टाः सहसा बिलं तिमिरसंवृतम् । क्षुत्पिपासापरिश्रान्ताः परिखिन्नाश्च सर्वशः ॥ २ ॥ महद् धरण्या विवरं प्रविष्टाः स्म पिपासिताः । इमांस्त्वेवंविधान् भावान् विविधानद्भुतोपमान् ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा वयं प्रव्यथिताः सम्भ्रान्ता नष्टचेतसः । कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसंनिभाः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘देवि ! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावटसे कष्ट पा रहे थे । इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफामें घुस आये । भूतलका यह विवर बहुत बड़ा है । हम प्याससे पीड़ित होनेके कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँके इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थोंको देखकर हमारे मनमें बड़ी व्यथा हुई है— हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरोंकी माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मनमें घबराहट हो रही है । हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है । हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्यके समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं ? ॥ २—४ ॥

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च । काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च ॥ ५ ॥ तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च । पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्याः सुरभिगन्धयः ॥ ६ ॥ इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा ।

भावार्थ

‘ये भोजनकी पवित्र वस्तुएँ, फल-मूल, सोनेके विमान, चाँदीके घर, मणियोंकी जालीसे ढकी हुई सोनेकी खिड़कियाँ तथा पवित्र सुगन्धसे युक्त एवं फल-फूलोंसे लदे हुए ये सुवर्णमय पावन वृक्ष किसके तेजसे प्रकट हुए हैं ? ॥५-६½॥

काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले ॥ ७ ॥ कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः । आत्मनस्त्वनुभावाद् वा कस्य वैतत्तपोबलम् ॥ ८ ॥ अजानतां नः सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि ।

भावार्थ

‘यहाँके निर्मल जलमें सोनेके कमल कैसे उत्पन्न हुए ? इन सरोवरोंके मत्स्य और कछुए सुवर्णमय कैसे दिखायी देते हैं ? यह सब तुम्हारे अपने प्रभावसे हुआ है या और किसीके ? यह किसके तपोबलका प्रभाव है ? हम सब अनजान हैं; इसलिये पूछते हैं । तुम हमें सारी बातें बतानेकी कृपा करो’ ॥ ७-८½ ॥

एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी ॥ ९ ॥ प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता ।

भावार्थ

हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उस धर्मपरायणा तापसीने उत्तर दिया—॥ ९½ ॥

मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभ ॥ १० ॥ तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम् ।

भावार्थ

‘वानरश्रेष्ठ ! मायाविशारद महातेजस्वी मयका नाम तुमने सुना होगा । उसीने अपनी मायाके प्रभावसे इस समूचे स्वर्णमय वनका निर्माण किया था ॥ १०½ ॥

पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह ॥ ११ ॥ येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम् ।

भावार्थ

‘मयासुर पहले दानव शिरोमणियोंका विश्वकर्मा था, जिसने इस दिव्य सुवर्णमय उत्तम भवनको बनाया है ॥ ११½ ॥

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महद्वने ॥ १२ ॥ पितामहाद् वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम् ।

भावार्थ

‘उसने एक सहस्र वर्षोंतक वनमें घोर तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदानके रूपमें शुक्राचार्यका सारा शिल्प-वैभव प्राप्त किया था ॥ १२½ ॥

विधाय सर्वं बलवान् सर्वकामेश्वरस्तदा ॥ १३ ॥ उवास सुखितः कालं कंचिदस्मिन् महावने ।

भावार्थ

‘सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी बलवान् मयासुरने यहाँकी सारी वस्तुओंका निर्माण करके इस महान् वनमें कुछ कालतक सुखपूर्वक निवास किया था ॥ १३½ ॥

तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम् ॥ १४ ॥ विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेशः पुरंदरः ।

भावार्थ

‘आगे चलकर उस दानवराजका हेमा नामकी अप्सराके साथ सम्पर्क हो गया । यह जानकर देवेश्वर इन्द्रने हाथमें वज्र ले उसके साथ युद्ध करके उसे मार भगाया ॥ १४½ ॥

इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम् ॥ १५ ॥ शाश्वतः कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम् ।

भावार्थ

‘तत्पश्चात् ब्रह्माजीने यह उत्तम वन, यहाँका अक्षय काम-भोग तथा यह सोनेका भवन हेमाको दे दिया ॥ १५½ ॥

दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्याः स्वयंप्रभा ॥ १६ ॥ इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम ।

भावार्थ

‘मैं मेरुसावर्णिकी कन्या हूँ । मेरा नाम स्वयंप्रभा है । वानरश्रेष्ठ ! मैं उस हेमाके इस भवनकी रक्षा करती हूँ ॥ १६½ ॥

मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा ॥ १७ ॥ तयादत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनं महत् ।

भावार्थ

‘नृत्य और गीतकी कलामें चतुर हेमा मेरी प्यारी सखी है । उसने मुझसे अपने भवनकी रक्षाके लिये प्रार्थना की थी, इसलिये मैं इस विशाल भवनका संरक्षण करती हूँ ॥ १७½ ॥

किं कार्यं कस्य वा हेतोः कान्ताराणि प्रपद्यथ ॥ १८ ॥ कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम् ।

भावार्थ

‘तुमलोगोंका यहाँ क्या काम है ? किस उद्देश्यसे तुम इन दुर्गम स्थानोंमें विचरते हो ? इस वनमें आना तो बहुत कठिन है । तुमने कैसे इसे देख लिया ? ॥ १८½ ॥

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च । भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हसि ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘अच्छा, ये शुद्ध भोजन और फल-मूल प्रस्तुत हैं । इन्हें खाकर पानी पी लो । फिर मुझसे अपना सारा वृत्तान्त कहो’ ॥ १९ ॥

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