किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 50
सह ताराङ्गदाभ्यां तु संगम्य हनुमान् कपिः । विचिनोति च विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च ॥ १ ॥
भावार्थ
हनुमान्जी तार और अङ्गदके साथ मिलकर विन्ध्य-गिरिकी गुफाओं और घने जंगलोंमें सीताजीको ढूँढ़ने लगे ॥ १ ॥
सिंहशार्दूलजुष्टाश्च गुहाश्च परितस्तदा । विषमेषु नगेन्द्रस्य महाप्रस्रवणेषु च ॥ २ ॥
भावार्थ
उन्होंने सिंह और बाघोंसे भरी हुई कन्दराओं तथा उसके आस-पासकी भूमिको भी छान डाला । गिरिराज विन्ध्यपर जो बड़े-बड़े झरने और दुर्गम स्थान थे, वहाँ भी अन्वेषण किया ॥ २ ॥
आसेदुस्तस्य शैलस्य कोटिं दक्षिणपश्चिमाम् । तेषां तत्रैव वसतां स कालो व्यत्यवर्तत ॥ ३ ॥
भावार्थ
घूमते-फिरते वे तीनों वानर उस पर्वतके नैर्ऋत्यकोण-वाले शिखरपर जा पहुँचे । वहीं रहते हुए उनका वह समय, जो सुग्रीवने निश्चित किया था, बीत गया ॥ ३ ॥
स हि देशो दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान् । तत्र वायुसुतः सर्वं विचिनोति स्म पर्वतम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
गुफाओं और जंगलोंसे भरे हुए उस महान् प्रदेशमें सीताको ढूँढ़नेका काम बहुत ही कठिन था तो भी वहाँ वायुपुत्र हनुमान्जी सारे पर्वतकी छानबीन करने लगे ॥४॥
परस्परेण रहिता अन्योन्यस्याविदूरतः । गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः ॥ ५ ॥ मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमान् जाम्बवानपि। अङ्गदो युवराजश्च तारश्च वनगोचरः ॥ ६ ॥ गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम् । विचिन्वन्तस्ततस्तत्र ददृशुर्विवृतं बिलम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
फिर अलग-अलग एक दूसरेसे थोड़ी ही दूरपर रहकर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान्, जाम्बवान्, युवराज अङ्गद तथा वनवासी वानर तार—ये दक्षिण दिशाके देशोंमें जो पर्वत-मालाओंसे घिरे हुए थे, सीताकी खोज करने लगे । खोजते-खोजते उन्हें वहाँ एक गुफा दिखायी दी, जिसका द्वार बंद नहीं था ॥ ५—७ ॥
दुर्गमृक्षबिलं नाम दानवेनाभिरक्षितम् । क्षुत्पिपासापरीतास्तु श्रान्तास्तु सलिलार्थिनः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उसमें प्रवेश करना बहुत कठिन था । वह गुफा ऋक्ष-बिल नामसे विख्यात थी और एक दानव उसकी रक्षामें रहता था । वानरोंको भूख-प्यास सता रही थी । वे बहुत थक गये थे और पानी पीना चाहते थे ॥ ८ ॥
अवकीर्णं लतावृक्षैर्ददृशुस्ते महाबिलम् । तत्र क्रौञ्चाश्च हंसाश्च सारसाश्चापि निष्क्रमन् ॥ ९ ॥ जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च रक्ताङ्गाः पद्मरेणुभिः ।
भावार्थ
अतः लता और वृक्षोंसे आच्छादित विशाल गुफाकी ओर वे देखने लगे । इतनेमें उसके भीतरसे क्रौञ्च, हंस, सारस तथा जलसे भीगे हुए चक्रवाक पक्षी, जिनके अङ्ग कमलोंके परागसे रक्तवर्णके हो रहे थे, बाहर निकले ॥९½॥
ततस्तद् बिलमासाद्य सुगन्धि दुरतिक्रमम् ॥ १० ॥ विस्मयव्यग्रमनसो बभूवुर्वानरर्षभाः । संजातपरिशङ्कास्ते तद् बिलं प्लवगोत्तमाः ॥ ११ ॥
भावार्थ
तब उस सुगन्धित एवं दुर्लङ्घ्य गुफाके पास जाकर उन सभी श्रेष्ठ वानरोंका मन आश्चर्यसे चकित हो उठा । उस बिलके अंदर उन्हें जल होनेका संदेह हुआ ॥१०-११॥
अभ्यपद्यन्त संहृष्टास्तेजोवन्तो महाबलाः । नानासत्त्वसमाकीर्णं दैत्येन्द्रनिलयोपमम् ॥ १२ ॥ दुर्दर्शमिव घोरं च दुर्विगाह्यं च सर्वशः ।
भावार्थ
वे महाबली और तेजस्वी वानर बड़े हर्षमें भरकर उस गुफाके पास आये, जो नाना प्रकारके जन्तुओंसे भरी हुई तथा दैत्यराजोंके निवासस्थान पातालके समान भयंकर प्रतीत होती थी । वह इतनी भयानक थी कि उसकी ओर देखना कठिन जान पड़ता था । उसके भीतर घुसना सर्वथा कष्टसाध्य था ॥ १२½ ॥
ततः पर्वतकूटाभो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १३ ॥ अब्रवीद् वानरान् घोरान् कान्तारवनकोविदः ।
भावार्थ
उस समय पर्वत-शिखरके समान प्रतीत होनेवाले पवनपुत्र हनुमान्जी, जो दुर्गम वनके ज्ञाता थे, उन घोर वानरोंसे बोले—॥ १३½ ॥
गिरिजालावृतान् देशान् मार्गित्वा दक्षिणां दिशम् ॥ १४ ॥ वयं सर्वे परिश्रान्ता न च पश्याम मैथिलीम् ।
भावार्थ
‘बन्धुओ ! दक्षिण दिशाके देश प्रायः पर्वतमालाओंसे घिरे हुए हैं । इनमें मिथिलेशकुमारी सीताको खोजते-खोजते हम सब लोग बहुत थक गये; किंतु कहीं भी हमें उनके दर्शन नहीं हुए ॥ १४½ ॥
अस्माच्चापि बिलाद्धंसाः क्रौञ्चाश्च सह सारसैः ॥ १५ ॥ जलार्द्राश्चक्रवाकाश्च निष्पतन्ति स्म सर्वशः । नूनं सलिलवानत्र कूपो वा यदि वा ह्रदः ॥ १६ ॥ तथा चेमे बिलद्वारे स्निग्धास्तिष्ठन्ति पादपाः ।
भावार्थ
‘सामनेकी इस गुफासे हंस, क्रौञ्च, सारस और जलसे भीगे हुए चकवे सब ओर निकल रहे हैं । अतः निश्चय ही इसमें पानीका कुआँ अथवा और कोई जलाशय होना चाहिये । तभी इस गुफाके द्वारवर्ती वृक्ष हरे-भरे हैं’ ॥१५-१६½॥
इत्युक्तास्तद् बिलं सर्वे विविशुस्तिमिरावृतम् ॥ १७ ॥ अचन्द्रसूर्यं हरयो ददृशू रोमहर्षणम् ।
भावार्थ
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर वे सभी वानर अन्धकारसे भरी हुई उस गुफामें, जहाँ चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं, घुस गये । भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह गुफा रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी ॥ १७½ ॥
निशाम्य तस्मात् सिंहांश्च तांस्तांश्च मृगपक्षिणः ॥ १८ ॥ प्रविष्टा हरिशार्दूला बिलं तिमिरसंवृतम् ।
भावार्थ
उस बिलसे निकलते हुए उन-उन सिंहों, मृगों और पक्षियोंको देखकर वे श्रेष्ठ वानर अन्धकारसे आच्छादित हुई उस गुफामें प्रवेश करने लगे ॥ १८½ ॥
न तेषां सज्जते दृष्टिर्न तेजो न पराक्रमः ॥ १९ ॥ वायोरिव गतिस्तेषां दृष्टिस्तमसि वर्तते ।
भावार्थ
उनकी दृष्टि कहीं अटकती नहीं थी । उनका तेज और पराक्रम भी अवरुद्ध नहीं होता था । उनकी गति वायुके समान थी । अन्धकारमें भी उनकी दृष्टि काम कर रही थी ॥ १९½ ॥
ते प्रविष्टास्तु वेगेन तद् बिलं कपिकुञ्जराः ॥ २० ॥ प्रकाशं चाभिरामं च ददृशुर्देशमुत्तमम् ।
भावार्थ
वे श्रेष्ठ वानर उस बिलमें वेगपूर्वक घुस गये । भीतर जाकर उन्होंने देखा, वह स्थान बहुत ही उत्तम, प्रकाशमान और मनोहर था ॥ २०½ ॥
ततस्तस्मिन् बिले भीमे नानापादपसंकुले ॥ २१ ॥ अन्योन्यं सम्परिष्वज्य जग्मुर्योजनमन्तरम् ।
भावार्थ
नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरी हुई उस भयंकर गुफामें वे एक योजनतक एक दूसरेको पकड़े हुए गये ॥ २१½ ॥
ते नष्टसंज्ञास्तृषिताः सम्भ्रान्ताः सलिलार्थिनः ॥ २२॥ परिपेतुर्बिले तस्मिन् कंचित् कालमतन्द्रिताः ।
भावार्थ
प्यासके मारे उनकी चेतना लुप्त-सी हो रही थी । वे जल पीनेके लिये उत्सुक होकर घबरा गये थे और कुछ कालतक आलस्यरहित हो उस बिलमें लगातार आगे बढ़ते गये ॥ २२½ ॥
ते कृशा दीनवदनाः परिश्रान्ताः प्लवङ्गमाः ॥ २३ ॥ आलोकं ददृशुर्वीरा निराशा जीविते यदा । ततस्तं देशमागम्य सौम्या वितिमिरं वनम् ॥ २४ ॥ ददृशुः काञ्चनान् वृक्षान् दीप्तवैश्वानरप्रभान् ।
भावार्थ
वे वानरवीर जब दुर्बल, खिन्नवदन और श्रान्त होकर जीवनसे निराश हो गये, तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखायी दिया ॥ तदनन्तर उस अन्धकारसे प्रकाशपूर्ण देशमें आकर उन सौम्य वानरोंने वहाँ अन्धकाररहित वन देखा, जहाँके सभी वृक्ष सुवर्णमय थे और उनसे अग्निके समान प्रभा निकल रही थी ॥ २४½ ॥
सालांस्तालांस्तमालांश्च पुंनागान् वञ्जुलान् धवान् ॥ चम्पकान् नागवृक्षांश्च कर्णिकारांश्च पुष्पितान् ।
भावार्थ
खाल, ताल, तमाल, नागकेसर, अशोक, धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर—ये सभी वृक्ष फूलोंसे भरे हुए थे ॥२५½॥
स्तवकैः काञ्चनैश्चित्रै रक्तैः किसलयैस्तथा ॥ २६ ॥ आपीडैश्च लताभिश्च हेमाभरणभूषितान् ।
भावार्थ
विचित्र सुवर्णमय गुच्छे और लाल-लाल पल्लव मानो उन वृक्षोंके मुकुट थे । उनमें लताएँ लिपटी हुई थीं तथा वे अपने फलस्वरूप सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित थे॥२६½॥
तरुणादित्यसंकाशान् वैदूर्यमयवेदिकान् ॥ २७ ॥ विभ्राजमानान् वपुषा पादपांश्च हिरण्मयान् ।
भावार्थ
वे देखनेमें प्रातःकालिक सूर्यके समान जान पड़ते थे । उनके नीचे वैदूर्यमणिकी वेदी बनी थी । वे सुवर्णमय वृक्ष अपने दीप्तिमान् स्वरूपसे ही प्रकाशित हो रहे थे ॥ २७½ ॥
नीलवैदूर्यवर्णाश्च पद्मिनीः पतगैर्वृताः ॥ २८ ॥ महद्भिः काञ्चनैर्वृक्षैर्वृता बालार्कसंनिभैः । जातरूपमयैर्मत्स्यैर्महद्भिश्चाथ पङ्कजैः ॥ २९ ॥ नलिनीस्तत्र ददृशुः प्रसन्नसलिलायुताः ।
भावार्थ
वहाँ नील वैदूर्यमणिकी-सी कान्तिवाली पद्मलताएँ दिखायी देती थीं, जो पक्षियोंसे आवृत थीं । कई ऐसे सरोवर भी देखनेमें आये, जो बाल सूर्यकी-सी आभावाले, विशाल काञ्चनवृक्षोंसे घिरे हुए थे । उनके भीतर सुनहरे रंगके बड़े-बड़े मत्स्य शोभा पाते थे । वे सरोवर सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित तथा स्वच्छ जलसे भरे हुए थे ॥२८-२९½॥
काञ्चनानि विमानानि राजतानि तथैव च ॥ ३० ॥ तपनीयगवाक्षाणि मुक्ताजालावृतानि च । हैमराजतभौमानि वैदूर्यमणिमन्ति च ॥ ३१ ॥ दद्दशुस्तत्र हरयो गृहमुख्यानि सर्वशः ।
भावार्थ
वानरोंने वहाँ सब ओर सोने-चाँदीके बने हुए बहुत-से श्रेष्ठ भवन देखे, जिनकी खिड़कियाँ मोतीकी जालियोंसे ढकी थीं । उन भवनोंमें सोनेके जँगले लगे हुए थे । सोने-चाँदीके ही विमान भी थे । कोई घर सोनेके बने थे तो कोई चाँदीके । कितने ही गृह पार्थिव वस्तुओं ( ईंट, पत्थर, लकड़ी आदि ) से निर्मित हुए थे । उनमें वैदूर्यमणियाँ भी जड़ी गयी थीं ॥ ३०-३१½ ॥
पुष्पितान् फलिनो वृक्षान् प्रवालमणिसंनिभान् ॥ ३२॥ काञ्चनभ्रमरांश्चैव मधूनि च समन्ततः । मणिकाञ्चनचित्राणि शयनान्यासनानि च ॥ ३३ ॥ विविधानि विशालानि ददृशुस्ते समन्ततः । हैमराजतकांस्यानां भाजनानां च राशयः ॥ ३४ ॥ अगुरूणां च दिव्यानां चन्दनानां च संचयान् । शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च ॥ ३५ ॥ महार्हाणि च यानानि मधूनि रसवन्ति च । दिव्यानामम्बराणां च महार्हाणां च संचयान् ॥ ३६ ॥ कम्बलानां च चित्राणामजिनानां च संचयान् । तत्र तत्र च विन्यस्तान् दीप्तान् वैश्वानरप्रभान् ॥ ३७ ॥ ददृशुर्वानराः शुभ्राञ्जातरूपस्य संचयान् ।
भावार्थ
वहाँके वृक्षोंमें फूल और फल लगे थे । वे वृक्ष मूँगे और मणियोंके समान चमकीले थे । उनपर सुनहरे रंगके भौरे मड़रा रहे थे । वहाँके घरोंमें सब ओर मधु संचित थे । मणि और सुवर्णसे जटित विचित्र पलंग तथा आसन सब ओर सजाकर रक्खे गये थे, जो अनेक प्रकारके और विशाल थे । वानरोंने उन्हें भी देखा । वहाँ ढेर-के-ढेर सोने, चाँदी और कांस ( फूल ) के पात्र रक्खे गये थे । अगुरु तथा दिव्य चन्दनकी राशियाँ सुरक्षित थीं । पवित्र भोजनके सामान तथा फल-मूल भी विद्यमान थे । बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, महामूल्यवान् दिव्य वस्त्रोंके ढेर, विचित्र कम्बल एवं कालीनोंकी राशियाँ तथा मृगचर्मोंके समूह जहाँ-तहाँ रक्खे हुए थे । वे सब अग्निके समान प्रभासे उद्दीप्त हो रहे थे । वानरोंने वहाँ चमकीले सुवर्णके ढेर भी देखे ॥ ३२–३७½ ॥
तत्र तत्र विचिन्वन्तो बिले तत्र महाप्रभाः ॥ ३८ ॥ दद्दशुर्वानराः शूराः स्त्रियं कांचिद्दूरतः । तां च ते ददृशुस्तत्र चीरकृष्णाजिनाम्बराम् ॥ ३९ ॥ तापसीं नियताहारां ज्वलन्तीमिव तेजसा । विस्मिता हरयस्तत्र व्यवतिष्ठन्त सर्वशः । पप्रच्छ हनुमांस्तत्र कासि त्वं कस्य वा बिलम् ॥ ४० ॥ ततो हनूमान् गिरिसंनिकाशः कृताञ्जलिस्तामभिवाद्य वृद्धाम् । पप्रच्छ का त्वं भवनं बिलं च रत्नानि चेमानि वदस्व कस्य ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उस गुफामें जहाँ-तहाँ खोज करते हुए उन महातेजस्वी शूरवीर वानरोंने थोड़ी ही दूरपर किसी स्त्रीको भी देखा, जो वल्कल और काला मृगचर्म पहनकर नियमित आहार करती तपस्यामें संलग्न थी और अपने तेजसे दिप रही थी । वानरोंने वहाँ उसे बड़े ध्यानसे देखा और आश्चर्यचकित होकर सब ओर खड़े रहे । उस समय हनुमान्जीने उससे पूछा—‘देवि ! तुम कौन हो और यह किसकी गुफा है?’ ॥ पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने हाथ जोड़कर उस वृद्धा तपस्विनीको प्रणाम किया और पूछा—‘देवि ! तुम कौन हो ? यह गुफा, ये भवन तथा ये रत्न किसके हैं ? यह हमें बताओ’ ॥ ४१ ॥
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