बालकाण्ड, सर्ग 46
हतेषु तेषु पुत्रेषु दितिः परमदुःखिता । मारीचं कश्यपं नाम भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
अपने उन पुत्रोंके मारे जानेपर दितिको बड़ा दुःख हुआ । वे अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपके पास जाकर बोलीं—॥ १ ॥
हतपुत्रास्मि भगवंस्तव पुत्रैर्महाबलैः । शक्रहन्तारमिच्छामि पुत्रं दीर्घतपोर्जितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! आपके महाबली पुत्र देवताओंने मेरे पुत्रोंको मार डाला; अतः मैं दीर्घकालकी तपस्यासे उपार्जित एक ऐसा पुत्र चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ हो ॥ २ ॥
साहं तपश्चरिष्यामि गर्भं मे दातुमर्हसि । ईश्वरं शक्रहन्तारं त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मैं तपस्या करूँगी, आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरे गर्भमें ऐसा पुत्र प्रदान करें, जो सब कुछ करनेमें समर्थ तथा इन्द्रका वध करनेवाला हो’ ॥ ३ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा मारीचः कश्यपस्तदा। प्रत्युवाच महातेजा दितिं परमदुःखिताम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उसकी यह बात सुनकर महातेजस्वी मरीचिनन्दन कश्यपने उस परम दुःखिनी दितिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ४ ॥
एवं भवतु भद्रं ते शुचिर्भव तपोधने। जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शक्रहन्तारमाहवे ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तपोधने ! ऐसा ही हो। तुम शौचाचारका पालन करो। तुम्हारा भला हो। तुम ऐसे पुत्रको जन्म दोगी, जो युद्धमें इन्द्रको मार सके ॥ ५ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु शुचिर्यदि भविष्यसि। पुत्रं त्रैलोक्यहन्तारं मत्तस्त्वं जनयिष्यसि ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘यदि पूरे एक सहस्र वर्षतक पवित्रतापूर्वक रह सकोगी तो तुम मुझसे त्रिलोकीनाथ इन्द्रका वध करनेमें समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी’ ॥ ६ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः पाणिना सम्ममार्ज ताम्। तामालभ्य ततः स्वस्ति इत्युक्त्वा तपसे ययौ ॥ ७ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी कश्यपने दितिके शरीरपर हाथ फेरा। फिर उनका स्पर्श करके कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो।’ ऐसा कहकर वे तपस्याके लिये चले गये ॥ ७ ॥
गते तस्मिन् नरश्रेष्ठ दितिः परमहर्षिता। कुशप्लवं समासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
नरश्रेष्ठ ! उनके चले जानेपर दिति अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरकर कुशप्लव नामक तपोवनमें आर्यों और अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगीं ॥ ८ ॥
तपस्तस्यां हि कुर्वत्यां परिचर्यां चकार ह। सहस्राक्षो नरश्रेष्ठ परया गुणसम्पदा ॥ ९ ॥
भावार्थ
पुरुषप्रवर श्रीराम ! दितिके तपस्या करते समय सहस्रलोचन इन्द्र विनय आदि उत्तम गुणसम्पत्तिसे युक्त हो उनकी सेवा-टहल करने लगे ॥ ९ ॥
अग्निं कुशान् काष्ठमपः फलं मूलं तथैव च। न्यवेदयत् सहस्राक्षो यच्चान्यदपि काङ्क्षितम् ॥ १० ॥
भावार्थ
सहस्राक्ष इन्द्र अपनी मौसी दितिके लिये अग्नि, कुशा, काष्ठ, जल, फल, मूल तथा अन्यान्य अभिलषित वस्तुओंको ला लाकर देते थे ॥ १० ॥
गात्रसंवाहनैश्चैव श्रमापनयनैस्तथा। शक्रः सर्वेषु कालेषु दितिं परिचचार ह ॥ ११ ॥
भावार्थ
इन्द्र मौसीकी शारीरिक सेवाएँ करते, उनके पैर दबाकर उनकी थकावट मिटाते तथा ऐसी ही अन्य आवश्यक सेवाओंद्वारा वे हर समय दितिकी परिचर्या करते थे ॥ ११ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे सा दशोने रघुनन्दन। दितिः परमसंहृष्टा सहस्राक्षमथाब्रवीत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! जब सहस्र वर्ष पूर्ण होनेमें कुल दस वर्ष बाकी रह गये, तब एक दिन दितिने अत्यन्त हर्षमें भरकर सहस्रलोचन इन्द्रसे कहा—॥ १२ ॥
तपश्चरन्त्या वर्षाणि दश वीर्यवतां वर। अवशिष्टानि भद्रं ते भ्रातरं द्रक्ष्यसे ततः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर ! अब मेरी तपस्याके केवल दस वर्ष और शेष रह गये हैं। तुम्हारा भला हो। दस वर्ष बाद तुम अपने होनेवाले भाईको देख सकोगे ॥ १३ ॥
यमहं त्वत्कृते पुत्र तमाधास्ये जयोत्सुकम्। त्रैलोक्यविजयं पुत्र सह भोक्ष्यसि विज्वरः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! मैंने तुम्हारे विनाशके लिये जिस पुत्रकी याचना की थी, वह जब तुम्हें जीतनेके लिये उत्सुक होगा, उस समय मैं उसे शान्त कर दूँगी—तुम्हारे प्रति उसे वैर-भावसे रहित तथा भ्रातृ-स्नेहसे युक्त बना दूँगी। फिर तुम उसके साथ रहकर उसीके द्वारा की हुई त्रिभुवन-विजयका सुख निश्चिन्त होकर भोगना ॥ १४ ॥
याचितेन सुरश्रेष्ठ पित्रा तव महात्मना। वरो वर्षसहस्रान्ते मम दत्तः सुतं प्रति ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सुरश्रेष्ठ ! मेरे प्रार्थना करनेपर तुम्हारे महात्मा पिताने एक वर्षके बाद पुत्र होनेका मुझे वर दिया है’ ॥ १५ ॥
इत्युक्त्वा च दितिस्तत्र प्राप्ते मध्यं दिनेश्वरे। निद्रयापहृता देवी पादौ कृत्वाथ शीर्षतः ॥ १६ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर दिति नींदसे अचेत हो गयीं। उस समय सूर्यदेव आकाशके मध्य भागमें आ गये थे—दोपहरका समय हो गया था। देवी दिति आसनपर बैठी-बैठी झपकी लेने लगीं। सिर झुक गया और केश पैरोंसे जा लगे। इस प्रकार निद्रावस्थामें उन्होंने पैरोंको सिरसे लगा लिया ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा तामशुचिं शक्रः पादयोः कृतमूर्धजाम्। शिरःस्थाने कृतौ पादौ जहास च मुमोद च ॥ १७ ॥
भावार्थ
उन्होंने अपने केशोंको पैरोंपर डाल रखा था। सिरको टिकानेके लिये दोनों पैरोंको ही आधार बना लिया था। यह देख दितिको अपवित्र हुई जान इन्द्र हँसे और बड़े प्रसन्न हुए ॥ १७ ॥
तस्याः शरीरविवरं प्रविवेश पुरंदरः। गर्भं च सप्तधा राम चिच्छेद परमात्मवान् ॥ १८ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! फिर तो सतत सावधान रहनेवाले इन्द्र माता दितिके उदरमें प्रविष्ट हो गये और उसमें स्थित हुए गर्भके उन्होंने सात टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
भिद्यमानस्ततो गर्भो वज्रेण शतपर्वणा। रुरोद सुस्वरं राम ततो दितिरबुध्यत ॥ १९ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! उनके द्वारा सौ पर्वोंवाले वज्रसे विदीर्ण किये जाते समय वह गर्भस्थ बालक जोर-जोरसे गेने लगा । इससे दितिकी निद्रा टूट गयी—वे जागकर उठ बैठीं ॥ १९ ॥
मा रुदो मा रुदश्चेति गर्भं शक्रोऽभ्यभाषत । बिभेद च महातेजा रुदन्तमपि वासवः ॥ २० ॥
भावार्थ
तब इन्द्रने उस रोते हुए गर्भसे कहा—‘भाई ! मत रो, मत रो’ परंतु महातेजस्वी इन्द्रने रोते रहनेपर भी उस गर्भके टुकड़े कर ही डाले ॥ २० ॥
न हन्तव्यं न हन्तव्यमित्येव दितिरब्रवीत् । निष्पपात ततः शक्रो मातुर्वचनगौरवात् ॥ २१ ॥
भावार्थ
उस समय दितिने कहा—‘इन्द्र ! बच्चेको न मारो, न मारो ।’ माताके वचनका गौरव मानकर इन्द्र सहसा उदरसे निकल आये ॥ २१ ॥
प्राञ्जलिर्वज्रसहितो दितिं शक्रोऽभ्यभाषत । अशुचिर्देवि सुप्तासि पादयोः कृतमूर्धजा ॥ २२ ॥ तदन्तरमहं लब्ध्वा शक्रहन्ताग्माहवे । अभिन्दं सप्तधा देवि तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
भावार्थ
फिर वज्रसहित इन्द्रने हाथ जोड़कर दितिसे कहा—‘देवि ! तुम्हारे सिरके बाल पैरोंसे लगे थे । इस प्रकार तुम अपवित्र अवस्थामें सोयी थीं । यही छिद्र पाकर मैंने इस ‘इन्द्रहन्ता’ बालकके सात टुकड़े कर डाले हैं । इसलिये माँ ! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो’ ॥ २२-२३ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें