Ramayana.com

बालकाण्ड, सर्ग 45

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राघवः सहलक्ष्मणः । विस्मयं परमं गत्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

विश्वामित्रजीकी बातें सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ । वे मुनिसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया । गङ्गावतरणं पुण्यं सागरस्यापि पूरणम् ॥ २ ॥ क्षणभूतेव नौ रात्रिः संवृत्तेयं परंतप । इमां चिन्तयतोः सर्वां निखिलेन कथां तव ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘ब्रह्मन् ! आपने गङ्गाजीके स्वर्गसे उतरने और समुद्रके भरनेकी यह बड़ी उत्तम और अत्यन्त अद्भुत कथा सुनायी ॥ ‘काम-क्रोधादि शत्रुओंको संताप देनेवाले महर्षे ! आपकी कही हुई इस सम्पूर्ण कथापर पूर्णरूपसे विचार करते हुए हम दोनों भाइयोंकी यह रात्रि एक क्षणके समान बीत गयी है॥३॥

तस्य सा शर्वरी सर्वा मम सौमित्रिणा सह । जगाम चिन्तयानस्य विश्वामित्र कथां शुभाम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘विश्वामित्रजी ! लक्ष्मणके साथ इस शुभ कथापर विचार करते हुए ही मेरी यह सारी रात बीती है’ ॥ ४ ॥

ततः प्रभाते विमले विश्वामित्रं तपोधनम् । उवाच राघवो वाक्यं कृताह्निकमरिंदमः ॥ ५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् निर्मल प्रभातकाल उपस्थित होनेपर तपोधन विश्वामित्रजी जब नित्यकर्मसे निवृत्त हो चुके, तब शत्रुदमन श्रीरामचन्द्रजीने उनके पास जाकर कहा—॥ ५ ॥

गता भगवती रात्रिः श्रोतव्यं परमं श्रुतम् । तराम सरितां श्रेष्ठां पुण्यां त्रिपथगां नदीम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘मुने ! यह पूजनीया रात्रि चली गयी । सुनने योग्य सर्वोत्तम कथा मैंने सुन ली । अब हमलोग सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला त्रिपथगामिनी नदी गङ्गाजीके उस पार चलें ॥६॥

नौरेषा हि सुखास्तीर्णा ऋषीणां पुण्यकर्मणाम् । भगवन्तमिह प्राप्तं ज्ञात्वा त्वरितमागता ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘सदा पुण्यकर्ममें तत्पर रहनेवाले ऋषियोंकी यह नाव उपस्थित है । इसपर सुखद आसन बिछा है । आप परमपूज्य महर्षिको यहाँ उपस्थित जानकर ऋषियोंकी भेजी हुई यह नाव बड़ी तीव्र गतिसे यहाँ आयी है’ ॥ ७ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । संतरं कारयामास सर्षिसङ्घस्य कौशिकः ॥ ८ ॥

भावार्थ

महात्मा रघुनन्दनका यह वचन सुनकर विश्वामित्रजीने पहले ऋषियोंसहित श्रीराम-लक्ष्मणको पार कराया ॥ ८ ॥

उत्तरं तीरमासाद्य सम्पूज्यर्षिगणं ततः । गङ्गाकूले निविष्टास्ते विशालां दद्दशुः पुरीम् ॥ ९ ॥ ततो मुनिवरस्तूर्णं जगाम सहराघवः । विशालां नगरीं रम्यां दिव्यां स्वर्गोपमां तदा ॥ १० ॥ अथ रामो महाप्राज्ञो विश्वामित्रं महामुनिम् । पप्रच्छ प्राञ्जलिर्भूत्वा विशालामुत्तमां पुरीम् ॥ ११ ॥ कनमो राजवंशोऽयं विशालायां महामुने । श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते परं कौतूहलं हि मे ॥ १२ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् स्वयं भी उत्तर तटपर पहुँचकर उन्होंने वहाँ रहनेवाले ऋषियोंका सत्कार किया । फिर सब लोग गङ्गाजीके किनारे ठहरकर विशाला नामक पुरीकी शोभा देखने लगे ॥ तदनन्तर श्रीराम-लक्ष्मणको साथ ले मुनिवर विश्वामित्र तुरंत उस दिव्य एवं रमणीय नगरी विशालाकी ओर चल दिये, जो अपनी सुन्दर शोभासे स्वर्गके समान जान पड़ती थी ॥ उस समय परम बुद्धिमान् श्रीरामने हाथ जोड़कर उस उत्तम विशाला पुरीके विषयमें महामुनि विश्वामित्रसे पूछा—॥ ‘महामुने ! आपका कल्याण हो । मैं यह सुनना चाहता हूँ कि विशालामें कौन-सा राजवंश राज्य कर रहा है ? इसके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा है’ ॥ १२ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामस्य मुनिपुङ्गवः । आख्यातुं तत्समारेभे विशालायाः पुरातनम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

श्रीरामका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने विशाला पुरीके प्राचीन इतिहासका वर्णन आरम्भ किया—॥ १३ ॥

श्रूयतां राम शक्रस्य कथां कथयतः श्रुताम् । अस्मिन् देशे हि यद् वृत्तं शृणु तत्त्वेन राघव ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम ! मैंने इन्द्रके मुखसे विशालापुरीके वैभवका प्रतिपादन करनेवाली जो कथा सुनी है, उसे बता रहा हूँ, सुनो । इस देशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ है, उसे यथार्थरूपसे श्रवण करो ॥ १४ ॥

पूर्वं कृतयुगे राम दितेः पुत्रा महाबलाः । अदितेश्च महाभागा वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! पहले सत्ययुगमें दितिके पुत्र दैत्य बड़े बलवान् थे और अदितिके परम धर्मात्मा पुत्र महाभाग देवता भी बड़े शक्तिशाली थे ॥ १५ ॥

ततस्तेषां नरव्याघ्र बुद्धिरासीन्महात्मनाम् । अमरा विजराश्चैव कथं स्यामो निरामयाः ॥ १६ ॥ तेषां चिन्तयतां तत्र बुद्धिरासीद् विपश्चिताम् । क्षीरोदमथनं कृत्वा रसं प्राप्स्याम तत्र वै ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह ! उन महामना दैत्यों और देवताओंके मनमें यह विचार हुआ कि हम कैसे अजर-अमर और नीरोग हों ? ॥ ‘इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन विचारशील देवताओं और दैत्योंकी बुद्धिमें यह बात आयी कि हमलोग यदि क्षीरसागरका मन्थन करें तो उसमें निश्चय ही अमृतमय रस प्राप्त कर लेंगे ॥ १७ ॥

ततो निश्चित्य मथनं योक्त्रं कृत्वा च वासुकिम् । मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुरमितौजसः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘समुद्रमन्थनका निश्चय करके उन अमिततेजस्वी देवताओं और दैत्योंने वासुकि नागको रस्सी और मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीर-सागरको मथना आरम्भ किया ॥१८॥

अथ वर्षसहस्रेण योक्त्रसर्पशिरांसि च । वमन्तोऽतिविषं तत्र ददंशुर्दशनैः शिलाः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर रस्सी बने हुए सर्पके बहुसंख्यक मुख अत्यन्त विष उगलते हुए वहाँ मन्दराचलकी शिलाओंको अपने दाँतोंसे डँसने लगे ॥ १९ ॥

उत्पातापाग्निसंकाशं हालाहलमहाविषम् । तेन दग्धं जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ २० ॥ अथ देवा महादेवं शङ्करं शरणार्थिनः । जग्मुः पशुपतिं रुद्रं त्राहि त्राहीति तुष्टुवुः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘अतः उस समय वहाँ अग्निके समान दाहक हालाहल नामक महाभयंकर विष ऊपरको उठा । उसने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्णजगत्को दग्ध करना आरम्भ किया ॥ ‘यह देख देवतालोग शरणार्थी होकर सबका कल्याण करनेवाले महान् देवता पशुपति रुद्रकी शरणमें गये और त्राहि-त्राहिकी पुकार लगाकर उनकी स्तुति करने लगे ॥२१॥

एवमुक्तस्ततो देवैर्देवदेवेश्वरः प्रभुः । प्रादुरासीत् ततोऽत्रैव शङ्खचक्रधरो हरिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘देवताओंके इस प्रकार पुकारनेपर देवदेवेश्वर भगवान् शिव वहाँ प्रकट हुए । फिर वहीं शङ्ख-चक्रधारी भगवान् श्रीहरि भी उपस्थित हो गये ॥ २२ ॥

उवाचैनं स्मितं कृत्वा रुद्रं शूलधरं हरिः । दैवतैर्मथ्यमाने तु यत्पूर्वं समुपस्थितम् ॥ २३ ॥ तत् त्वदीयं सुरश्रेष्ठ सुराणामग्रतो हि यत् । अग्रपूजामिह स्थित्वा गृहाणेदं विषं प्रभो ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘श्रीहरिने त्रिशूलधारी भगवान् रुद्रसे मुसकराकर कहा— ‘सुरश्रेष्ठ ! देवताओंके समुद्रमन्थन करनेपर जो वस्तु सबसे पहले प्राप्त हुई है, वह आपका भाग है; क्योंकि आप सब देवताओंमें अग्रगण्य हैं । प्रभो ! अग्रपूजाके रूपमें प्राप्त हुए इस विषको आप यहीं खड़े होकर ग्रहण करें’ ॥ २३-२४ ॥

इत्युक्त्वा च सुरश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत । देवतानां भयं दृष्ट्वा श्रुत्वा वाक्यं तु शार्ङ्गिणः ॥ २५ ॥ हालाहलं विषं घोरं संजग्राहामृतोपमम् । देवान् विसृज्य देवेशो जगाम भगवान् हरः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘ऐसा कहकर देवशिरोमणि विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये । देवताओंका भय देखकर और भगवान् विष्णुकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवेश्वर भगवान् रुद्रने उस घोर हालाहल विषको अमृतके समान मानकर अपने कण्ठमें धारण कर लिया तथा देवताओंको विदा करके वे अपने स्थानको चले गये ॥ २५-२६ ॥

ततो देवासुराः सर्वे ममन्थू रघुनन्दन । प्रविवेशाथ पातालं मन्थानः पर्वतोत्तमः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! तत्पश्चात् देवता और असुर सब मिलकर क्षीरसागरका मन्थन करने लगे । उस समय मथानी बना हुआ उत्तम पर्वत मन्दर पातालमें घुस गया ॥ २७ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वास्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् । त्वं गतिः सर्वभूतानां विशेषेण दिवौकसाम् ॥ २८ ॥ पालयास्मान् महाबाहो गिरिमुद्धर्तुमर्हसि ।

भावार्थ

‘तब देवता और गन्धर्व भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे—‘महाबाहो ! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति हैं । विशेषतः देवताओंके अवलम्बन तो आप ही हैं । आप हमारी रक्षा करें और इस पर्वतको उठावें’ ॥ २८½ ॥

इति श्रुत्वा हृषीकेशः कामठं रूपमास्थितः ॥ २९ ॥ पर्वतं पृष्ठतः कृत्वा शिश्ये तत्रोदधौ हरिः ।

भावार्थ

‘यह सुनकर भगवान् हृषीकेशने कच्छपका रूप धारण कर लिया और उस पर्वतको अपनी पीठपर रखकर वे श्रीहरि वहीं समुद्रके भीतर सो गये ॥ २९½ ॥

पर्वताग्रं तु लोकात्मा हस्तेनाक्रम्य केशवः ॥ ३० ॥ देवानां मध्यतः स्थित्वा ममन्थ पुरुषोत्तमः ।

भावार्थ

‘फिर विश्वात्मा पुरुषोत्तम भगवान् केशव उस पर्वतशिखरको हाथसे पकड़कर देवताओंके बीचमें खड़े हो स्वयं भी समुद्रका मन्थन करने लगे ॥ ३०½ ॥

अथ वर्षसहस्रेण आयुर्वेदमयः पुमान् ॥ ३१ ॥ उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्डः सकमण्डलुः । पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चसः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर उस क्षीरसागरसे एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथमें दण्ड और दूसरेमें कमण्डलु था । उनका नाम धन्वन्तरि था । उनके प्राकट्यके बाद सागरसे सुन्दर कान्तिवाली बहुत-सी अप्सराएँ प्रकट हुईं ॥ ३१-३२ ॥

अप्सु निर्मथनादेव रसात् तस्माद् वरस्त्रियः । उत्पेतुर्मनुजश्रेष्ठ तस्मादप्सरसोऽभवन् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! मन्थन करनेसे ही अप् ( जल ) में उसके रससे वे सुन्दरी स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं, इसलिये अप्सरा कहलायीं ॥ ३३ ॥

षष्टिः कोट्योऽभवंस्तासामप्सराणां सुवर्चसाम् । असंख्येयास्तु काकुत्स्थ यास्तासां परिचारिकाः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! उन सुन्दर कान्तिवाली अप्सराओंकी संख्या साठ करोड़ थी और जो उनकी परिचारिकाएँ थीं, उनकी गणना नहीं की जा सकती । वे सब असंख्य थीं ॥ ३४ ॥

न ताः स्म प्रतिगृह्णन्ति सर्वे ते देवदानवाः । अप्रतिग्रहणादेव ता वै साधारणाः स्मृताः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘उन अप्सराओंको समस्त देवता और दानव कोई भी अपनी ‘पत्नी’ रूपसे ग्रहण न कर सके, इसलिये वे साधारणा ( सामान्या ) मानी गयीं ॥ ३५ ॥

वरुणस्य ततः कन्या वारुणी रघुनन्दन । उत्पपात महाभागा मार्गमाणा परिग्रहम् ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! तदनन्तर वरुणकी कन्या वारुणी, जो सुराकी अभिमानिनी देवी थी, प्रकट हुई और अपनेको स्वीकार करनेवाले पुरुषकी खोज करने लगी ॥ ३६ ॥

दितेः पुत्रा न तां राम जगृहुर्वरुणात्मजाम् । अदितेस्तु सुता वीर जगृहुस्तामनिन्दिताम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘वीर श्रीराम ! दैत्योंने उस वरुणकन्या सुराको नहीं ग्रहण किया, परंतु अदितिके पुत्रोंने इस अनिन्द्य सुन्दरीको ग्रहण कर लिया ॥ ३७ ॥

असुरास्तेन दैतेयाः सुरास्तेनादितेः सुताः । हृष्टाः प्रमुदिताश्चासन् वारुणीग्रहणात् सुराः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘सुरासे रहित होनेके कारण ही दैत्य ‘असुर’ कहलाये और सुरा-सेवनके कारण ही अदितिके पुत्रोंकी ‘सुर’ संज्ञा हुई । वारुणीको ग्रहण करनेसे देवतालोग हर्षसे उत्फुल्ल एवं आनन्दमग्न हो गये ॥ ३८ ॥

उच्चैःश्रवा हयश्रेष्ठो मणिरत्नं च कौस्तुभम् । उदतिष्ठन्नरश्रेष्ठ तथैवामृतमुत्तमम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! तदनन्तर घोड़ोंमें उत्तम उच्चैःश्रवा, मणिरत्न कौस्तुभ तथा परम उत्तम अमृतका प्राकट्य हुआ ॥ ३९ ॥

अथ तस्य कृते राम महानासीत् कुलक्षयः । अदितेस्तु ततः पुत्रा दितिपुत्रानयोधयन् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! उस अमृतके लिये देवताओं और असुरोंके कुलका महान् संहार हुआ । अदितिके पुत्र दितिके पुत्रोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४० ॥

एकतामगमन् सर्वे असुरा राक्षसैः सह । युद्धमासीन्महाघोरं वीर त्रैलोक्यमोहनम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

समस्त असुर राक्षसोंके साथ मिलकर एक हो गये । वीर ! देवताओंके साथ उनका महाघोर संग्राम होने लगा, जो तीनों लोकोंको मोहमें डालनेवाला था ॥ ४१ ॥

यदा क्षयं गतं सर्वं तदा विष्णुर्महाबलः । अमृतं सोऽहरत् तूर्णं मायामास्थाय मोहिनीम् ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘जब देवताओं और असुरोंका वह सारा समूह क्षीण हो चला, तब महाबली भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही अमृतका अपहरण कर लिया ॥ ४२ ॥

ये गताभिमुखं विष्णुमक्षरं पुरुषोत्तमम् । सम्पिष्टास्ते तदा युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘जो दैत्य बलपूर्वक अमृत छीन लानेके लिये अविनाशी पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुके सामने गये, उन्हें प्रभावशाली भगवान् विष्णुने उस समय युद्धमें पीस डाला ॥ ४३ ॥

अदितेरात्मजा वीरा दितेः पुत्रान् निजघ्निरे । अस्मिन् घोरे महायुद्धे दैतेयादित्ययोर्भृशम् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘देवताओं और दैत्योंके उस घोर महायुद्धमें अदितिके वीर पुत्रोंने दितिके पुत्रोंका विशेष संहार किया ॥ ४४ ॥

निहत्य दितिपुत्रांस्तु राज्यं प्राप्य पुरंदरः । शशास मुदितो लोकान् सर्षिसङ्घान् सचारणान् ॥४५॥

भावार्थ

‘दैत्योंका वध करनेके पश्चात् त्रिलोकीका राज्य पाकर देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और ऋषियों तथा चारणोंसहित समस्त लोकोंका शासन करने लगे’ ॥ ४५ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें