बालकाण्ड, सर्ग 43
देवदेवे गते तस्मिन् सोऽङ्गुष्ठाग्रनिपीडिताम् । कृत्वा वसुमतीं राम वत्सरं समुपासत ॥ १ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! देवाधिदेव ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा भगीरथ पृथ्वीपर केवल अँगूठेके अग्रभागको टिकाये हुए खड़े हो एक वर्षतक भगवान् शङ्करकी उपासनामें लगे रहे ॥ १ ॥
अथ संवत्सरे पूर्णे सर्वलोकनमस्कृतः । उमापतिः पशुपती राजानमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
वर्ष पूरा होनेपर सर्वलोकवन्दित उमावल्लभ भगवान् पशुपतिने प्रकट होकर राजासे इस प्रकार कहा—॥ २ ॥
प्रीतस्तेऽहं नरश्रेष्ठ करिष्यामि तव प्रियम् । शिरसा धारयिष्यामि शैलराजसुतामहम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा । मैं गिरिराजकुमारी गङ्गादेवीको अपने मस्तकपर धारण करूँगा’ ॥ ३ ॥
ततो हैमवती ज्येष्ठा सर्वलोकनमस्कृता । तदा सातिमहद्रूपं कृत्वा वेगं च दुःसहम् ॥ ४ ॥ आकाशादपतद् राम शिवे शिवशिरस्युत ।
भावार्थ
श्रीराम ! शङ्करजीकी स्वीकृति मिल जानेपर हिमालयकी ज्येष्ठ पुत्री गङ्गाजी, जिनके चरणोंमें सारा संसार मस्तक झुकाता है, बहुत बड़ा रूप धारण करके अपने वेगको दुस्सह बनाकर आकाशसे भगवान् शङ्करके शोभायमान मस्तकपर गिरीं ॥ ४½ ॥
अचिन्तयच्च सा देवी गङ्गा परमदुर्धरा ॥ ५ ॥ विशाम्यहं हि पातालं स्रोतसा गृह्य शंकरम् ।
भावार्थ
उस समय परम दुर्धर गङ्गादेवीने यह सोचा था कि मैं अपने प्रखर प्रवाहके साथ शङ्करजीको लिये-दिये पातालमें घुस जाऊँगी ॥ ५½ ॥
तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धस्तु भगवान् हरः ॥ ६ ॥ तिरोभावयितुं बुद्धिं चक्रे त्रिनयनस्तदा ।
भावार्थ
उनके इस अहंकारको जानकर त्रिनेत्रधारी भगवान् हर कुपित हो उठे और उन्होंने उस समय गङ्गाको अदृश्य कर देनेका विचार किया ॥ ६½ ॥
सा तस्मिन् पतिता पुण्या पुण्ये रुद्रस्य मूर्धनि ॥ ७ ॥ हिमवत्प्रतिमे राम जटामण्डलगह्वरे । सा कथंचिन्महीं गन्तुं नाशक्नोद् यत्नमास्थिता ॥ ८ ॥
भावार्थ
पुण्यस्वरूपा गङ्गा भगवान् रुद्रके पवित्र मस्तकपर गिरीं । उनका वह मस्तक जटामण्डलरूपी गुफासे सुशोभित हिमालयके समान जान पड़ता था । उसपर गिरकर विशेष प्रयत्न करनेपर भी किसी तरह वे पृथ्वीपर न जा सकीं ॥७-८॥
नैव सा निर्गमं लेभे जटामण्डलमन्ततः । तत्रैवाबभ्रमद् देवी संवत्सरगणान् बहून् ॥ ९ ॥
भावार्थ
भगवान् शिवके जटा-जालमें उलझकर किनारे आकर भी गङ्गादेवी वहाँसे निकलनेका मार्ग न पा सकीं और बहुत वर्षोंतक उस जटाजूटमें ही भटकती रहीं ॥ ९ ॥
तामपश्यत् पुनस्तत्र तपः परममास्थितः । स तेन तोषितश्चासीदत्यन्तं रघुनन्दन ॥ १० ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! भगीरथने देखा, गङ्गाजी भगवान् शङ्करके जटामण्डलमें अदृश्य हो गयी हैं; तब वे पुनः वहाँ भारी तपस्यामें लग गये । उस तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शिवको बहुत संतुष्ट कर लिया ॥ १० ॥
विससर्ज ततो गङ्गां हरो बिन्दुसरः प्रति । तस्यां विसृज्यमानायां सप्त स्रोतांसि जज्ञिरे ॥ ११ ॥
भावार्थ
तब महादेवजीने गङ्गाजीको बिन्दुसरोवरमें ले जाकर छोड़ दिया । वहाँ छूटते ही उनकी सात धाराएँ हो गयीं ॥११॥
ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च तथैव च । तिस्रः प्राचीं दिशं जग्मुर्गङ्गाः शिवजलाः शुभाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
ह्लादिनी, पावनी और नलिनी—ये कल्याणमय जलसे सुशोभित गङ्गाकी तीन मङ्गलमयी धाराएँ पूर्व दिशाकी ओर चली गयीं ॥ १२ ॥
सुचक्षुश्चैव सीता च सिन्धुश्चैव महानदी । तिस्रस्त्वेता दिशं जग्मुः प्रतीचीं तु दिशं शुभाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु—ये तीन शुभ धाराएँ पश्चिम दिशाकी ओर प्रवाहित हुईं ॥ १३ ॥
सप्तमी चान्वगात् तासां भगीरथरथं तदा । भगीरथोऽपि राजर्षिर्दिव्यं स्यन्दनमास्थितः ॥ १४ ॥ प्रायादग्रे महातेजा गङ्गा तं चाप्यनुव्रजत् । गगनाच्छंकरशिरस्ततो धरणिमागता ॥ १५ ॥ असर्पत जलं तत्र तीव्रशब्दपुरस्कृतम् । मत्स्यकच्छपसङ्घैश्च शिंशुमारगणैस्तथा ॥ १६ ॥ पतद्भिः पतितैश्चैव व्यरोचत वसुंधरा ।
भावार्थ
उनकी अपेक्षा जो सातवीं धारा थी, वह महाराज भगीरथके रथके पीछे-पीछे चलने लगी । महातेजस्वी राजर्षि भगीरथ भी दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चले और गङ्गा उन्हींके पथका अनुसरण करने लगीं । इस प्रकार वे आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर और वहाँसे इस पृथ्वीपर आयी थीं ॥ गङ्गाजीकी वह जलराशि महान् कलकल नादके साथ तीव्र गतिसे प्रवाहित हुई । मत्स्य, कच्छप और शिंशुमार ( सूँस ) झुंड-के-झुंड उसमें गिरने लगे । उन गिरे हुए जल-जन्तुओंसे वसुन्धराकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १६½ ॥
ततो देवर्षिगन्धर्वा यक्षसिद्धगणास्तथा ॥ १७ ॥ व्यलोकयन्त ते तत्र गगनाद् गां गतां तदा । विमानैर्नगराकारैर्हयैर्गजवरैस्तदा ॥ १८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर देवता, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष और सिद्धगण नगरके समान आकारवाले विमानों, घोड़ों तथा गजराजोंपर बैठकर आकाशसे पृथ्वीपर गयी हुई गङ्गाजीकी शोभा निहारने लगे ॥ १७-१८ ॥
पारिप्लवगताश्चापि देवतास्तत्र विष्ठिताः । तदद्भुतमिमं लोके गङ्गावतरणमुत्तमम् ॥ १९ ॥ दिदृक्षवो देवगणाः समीयुरमितौजसः ।
भावार्थ
देवतालोग आश्चर्यचकित होकर वहाँ खड़े थे । जगत्में गङ्गावतरणके इस अद्भुत एवं उत्तम दृश्यको देखनेकी इच्छासे अमित तेजस्वी देवताओंका समूह वहाँ जुटा हुआ था ॥१९½॥
सम्पतद्भिः सुरगणैस्तेषां चाभरणौजसा ॥ २० ॥ शतादित्यमिवाभाति गगनं गततोयदम् ।
भावार्थ
तीव्र गतिसे आते हुए देवताओं तथा उनके दिव्य आभूषणोंके प्रकाशसे वहाँका मेघरहित निर्मल आकाश इस तरह प्रकाशित हो रहा था, मानो उसमें सैकड़ों सूर्य उदित हो गये हों ॥ २०½ ॥
शिंशुमारोरगगणैर्मीनैरपि च चञ्चलैः ॥ २१ ॥ विद्युद्भिरिव विक्षिप्तैराकाशमभवत् तदा ।
भावार्थ
शिंशुमार, सर्प तथा चञ्चल मत्स्यसमूहोंके उछलनेसे गङ्गाजीके जलसे ऊपरका आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो वहाँ चञ्चल चपलाओंका प्रकाश सब ओर व्याप्त हो रहा हो ॥ २१½ ॥
पाण्डुरैः सलिलोत्पीडैः कीर्यमाणैः सहस्रधा ॥ २२ ॥ शारदाभ्रैरिवाकीर्णं गगनं हंससम्प्लवैः ।
भावार्थ
वायु आदिसे सहस्रों टुकड़ोंमें बँटे हुए फेन आकाशमें सब ओर फैल रहे थे। मानो शरद्ऋतुके श्वेत बादल अथवा हंस उड़ रहे हों ॥ २२½ ॥
क्वचिद् द्रुततरं याति कुटिलं क्वचिदायतम् ॥ २३ ॥ विनतं कचिदुद्भूतं कचिद् याति शनैः शनैः । सलिलेनैव सलिलं क्वचिदभ्याहतं पुनः ॥ २४ ॥
भावार्थ
गङ्गाजीकी वह धारा कहीं तेज, कहीं टेढ़ी और कहीं चौड़ी होकर बहती थी। कहीं बिल्कुल नीचेकी ओर गिरती और कहीं ऊँचेकी ओर उठी हुई थी। कहीं समतल भूमिपर वह धीरे-धीरे बहती थी और कहीं-कहीं अपने ही जलसे उसके जलमें बारंबार टक्करें लगती रहती थीं ॥ २३-२४ ॥
मुहुरूर्ध्वपथं गत्वा पपात वसुधां पुनः । तच्छंकरशिरोभ्रष्टं भ्रष्टं भूमितले पुनः ॥ २५ ॥ व्यरोचत तदा तोयं निर्मलं गतकल्मषम् । तत्रर्षिगणगन्धर्वा वसुधातलवासिनः ॥ २६ ॥ भवाङ्गपतितं तोयं पवित्रमिति पस्पृशुः ।
भावार्थ
गङ्गाका वह जल बार-बार ऊँचे मार्गपर उठता और पुनः नीची भूमिपर गिरता था। आकाशसे भगवान् शङ्करके मस्तकपर तथा वहाँसे फिर पृथ्वीपर गिरा हुआ वह निर्मल एवं पवित्र गङ्गाजल उस समय बड़ी शोभा पा रहा था ॥ उस समय भूतलनिवासी ऋषि और गन्धर्व यह सोचकर कि भगवान् शङ्करके मस्तकसे गिरा हुआ यह जल बहुत पवित्र है, उसमें आचमन करने लगे ॥ २६½ ॥
शापात् प्रपतिता ये च गगनाद् वसुधातलम् ॥ २७ ॥ कृत्वा तत्राभिषेकं ते बभूवुर्गतकल्मषाः । धूतपापाः पुनस्तेन तोयेनाथ शुभान्विताः ॥ २८ ॥ पुनराकाशमाविश्य स्वाँल्लोकान् प्रतिपेदिरे ।
भावार्थ
जो शापभ्रष्ट होकर आकाशसे पृथ्वीपर आ गये थे, वे गङ्गाके जलमें स्नान करके निष्पाप हो गये तथा उस जलसे पाप धुल जानेके कारण पुनः शुभ पुण्यसे संयुक्त हो आकाशमें पहुँचकर अपने लोकोंको पा गये ॥ २७-२८½ ॥
मुमुदे मुदितो लोकस्तेन तोयेन भास्वता ॥ २९ ॥ कृताभिषेको गङ्गायां बभूव गतकल्मषः ।
भावार्थ
उस प्रकाशमान जलके सम्पर्कसे आनन्दित हुए सम्पूर्ण जगत्को सदाके लिये बड़ी प्रसन्नता हुई। सब लोग गङ्गामें स्नान करके पापहीन हो गये ॥ २९½ ॥
भगीरथो हि राजर्षिर्दिव्यं स्यन्दनमास्थितः ॥ ३० ॥ प्रायादग्रे महाराजस्तं गङ्गा पृष्ठतोऽन्वगात् ।
भावार्थ
(हम पहले बता आये हैं कि) राजर्षि महाराज भगीरथ दिव्य रथपर आरूढ़ हो आगे-आगे चल रहे थे और गङ्गाजी उनके पीछे-पीछे जा रही थीं ॥ ३०½ ॥
देवाः सर्षिगणाः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ ३१ ॥ गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिंनरमहोरगाः । सर्पाश्चाप्सरसो राम भगीरथरथानुगाः ॥ ३२ ॥ गङ्गामन्वगमन् प्रीताः सर्वे जलचराश्च ये ।
भावार्थ
श्रीराम! उस समय समस्त देवता, ऋषि, दैत्य, दानव, राक्षस, गन्धर्व, यक्षप्रवर, किन्नर, बड़े-बड़े नाग, सर्प तथा अप्सरा—ये सब लोग बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा भगीरथके रथके पीछे गङ्गाजीके साथ-साथ चल रहे थे। सब प्रकारके जलजन्तु भी गङ्गाजीकी उस जलराशिके साथ सानन्द जा रहे थे ॥ ३१-३२½ ॥
यतो भगीरथो राजा ततो गङ्गा यशस्विनी ॥ ३३ ॥ जगाम सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी ।
भावार्थ
जिस ओर राजा भगीरथ जाते, उसी ओर समस्त पापोंका नाश करनेवाली सरिताओंमें श्रेष्ठ यशस्विनी गङ्गा भी जाती थीं ॥ ३३½ ॥
ततो हि यजमानस्य जह्नोरद्भुतकर्मणः ॥ ३४ ॥ गङ्गा सम्प्लावयामास यज्ञवाटं महात्मनः ।
भावार्थ
उस समय मार्गमें अद्भुत पराक्रमी महामना राजा जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गङ्गाजी अपने जल-प्रवाहसे उनके यज्ञमण्डपको बहा ले गयीं ॥ ३४½ ॥
तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धो जह्नुश्च राघव ॥ ३५ ॥ अपिबत् तु जलं सर्वं गङ्गायाः परमाद्भुतम् । ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च सुविस्मिताः ॥ ३६ ॥ पूजयन्ति महात्मानं जह्नुं पुरुषसत्तमम् ।
भावार्थ
रघुनन्दन! राजा जह्नु इसे गङ्गाजीका गर्व समझकर कुपित हो उठे; फिर तो उन्होंने गङ्गाजीके उस समस्त जलको पी लिया। यह संसारके लिये बड़ी अद्भुत बात हुई ॥ तब देवता, गन्धर्व तथा ऋषि अत्यन्त विस्मित होकर पुरुषप्रवर महात्मा जह्नुकी स्तुति करने लगे ॥ ३६½ ॥
गङ्गां चापि नयन्ति स्म दुहितृत्वे महात्मनः ॥ ३७ ॥ ततस्तुष्टो महातेजाः श्रोत्राभ्यामसृजत् प्रभुः । तस्माज्जह्नुसुता गङ्गा प्रोच्यते जाह्नवीति च ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उन्होंने गङ्गाजीको उन महात्मा नरेशकी कन्या बना दिया। (अर्थात् उन्हें यह विश्वास दिलाया कि गङ्गाजीको प्रकट करके आप इनके पिता कहलायेंगे।) इससे सामर्थ्यशाली महातेजस्वी जह्नु बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कानोंके छिद्रोंद्वारा गङ्गाजीको पुनः प्रकट कर दिया, इसलिये गङ्गा जह्नुकी पुत्री एवं जाह्नवी कहलाती हैं ॥ ३७-३८ ॥
जगाम च पुनर्गङ्गा भगीरथरथानुगा । सागरं चापि सम्प्राप्ता सा सरित्प्रवरा तदा॥ ३९॥ रसातलमुपागच्छत् सिद्ध्यर्थं तस्य कर्मणः ।
भावार्थ
वहाँसे गङ्गा फिर भगीरथके रथका अनुसरण करती हुई चलीं । उस समय सरिताओंमें श्रेष्ठ जाह्नवी समुद्रतक जा पहुँचीं और राजा भगीरथके पितरोंके उद्धाररूपी कार्यकी सिद्धिके लिये रसातलमें गयीं ॥ ३९½ ॥
भगीरथोऽपि राजर्षिर्गङ्गामादाय यत्नतः ॥ ४० ॥ पितामहान् भस्मकृतानपश्यद् गतचेतनः ।
भावार्थ
राजर्षि भगीरथ भी यत्नपूर्वक गङ्गाजीको साथ ले वहाँ गये । उन्होंने शापसे भस्म हुए अपने पितामहोंको अचेत-सा होकर देखा ॥ ४०½ ॥
अथ तद्भस्मनां राशिं गङ्गासलिलमुत्तमम् । प्लावयत् पूतपाप्मानः स्वर्गं प्राप्ता रघूत्तम ॥ ४१ ॥
भावार्थ
रघुकुलके श्रेष्ठ वीर ! तदनन्तर गङ्गाके उस उत्तम जलने सगर-पुत्रोंकी उस भस्मराशिको आप्लावित कर दिया और वे सभी राजकुमार निष्पाप होकर स्वर्गमें पहुँच गये ॥ ४१ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें