अयोध्याकाण्ड, सर्ग 60
ततो भूतोपसृष्टेव वेपमाना पुनः पुनः । धरण्यां गतसत्त्वेव कौसल्या सूतमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जैसे उनमें भूतका आवेश हो गया हो, इस प्रकार कौसल्या देवी बारंबार काँपने लगीं और अचेत-सी होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं । उसी अवस्थामें उन्होंने सारथिसे कहा—॥ १ ॥
नय मां यत्र काकुत्स्थः सीता यत्र च लक्ष्मणः । तान् विना क्षणमप्यद्य जीवितुं नोत्सहे ह्यहम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘सुमन्त्र ! जहाँ श्रीराम हैं, जहाँ सीता और लक्ष्मण हैं, वहीं मुझे भी पहुँचा दो । मैं उनके बिना अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती ॥ २ ॥
निवर्तय रथं शीघ्रं दण्डकान् नय मामपि । अथ तान् नानुगच्छामि गमिष्यामि यमक्षयम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘जल्दी रथ लौटाओ और मुझे भी दण्डकारण्यमें ले चलो । यदि मैं उनके पास न जा सकी तो यमलोककी यात्रा करूँगी’ ॥ ३ ॥
बाष्पवेगोपहतया स वाचा सज्जमानया । इदमाश्वासयन् देवीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
देवी कौसल्याकी बात सुनकर सारथि सुमन्त्रने हाथ जोड़कर उन्हें समझाते हुए आँसुओंके वेगसे अवरुद्ध हुई गद्गदवाणीमें कहा—॥ ४ ॥
त्यज शोकं च मोहं च सम्भ्रमं दुःखजं तथा । व्यवधूय च संतापं वने वत्स्यति राघवः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘महारानी ! यह शोक, मोह और दुःखजनित व्याकुलता छोड़िये । श्रीरामचन्द्रजी इस समय सारा संताप भूलकर वनमें निवास करते हैं ॥ ५ ॥
लक्ष्मणश्चापि रामस्य पादौ परिचरन् वने । आराधयति धर्मज्ञः परलोकं जितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ एवं जितेन्द्रिय लक्ष्मण भी उस वनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करते हुए अपना परलोक बना रहे हैं ॥ ६ ॥
विजनेऽपि वने सीता वासं प्राप्य गृहेष्विव । विस्रम्भं लभतेऽभीता रामे विन्यस्तमानसा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सीताका मन भगवान् श्रीराममें ही लगा हुआ है । इसलिये निर्जन वनमें रहकर भी वे घरकी ही भाँति प्रेम एवं प्रसन्नता पाती तथा निर्भय रहती हैं ॥ ७ ॥
नास्या दैन्यं कृतं किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्ष्यते । उचितेव प्रवासानां वैदेही प्रतिभाति मे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वनमें रहनेके कारण उनके मनमें कुछ थोड़ा-सा भी दुःख नहीं दिखायी देता । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो विदेहराजकुमारी सीताको परदेशमें रहनेका पहलेसे ही अभ्यास हो ॥ ८ ॥
नगरोपवनं गत्वा यथा स्म रमते पुरा । तथैव रमते सीता निर्जनेषु वनेष्वपि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जैसे यहाँ नगरके उपवनमें जाकर वे पहले घूमा करती थीं, उसी प्रकार निर्जन वनमें भी सीता सानन्द विचरती हैं ॥ ९ ॥
बालेव रमते सीताबालचन्द्रनिभानना । रामा रामे ह्यदीनात्मा विजनेऽपि वने सती ॥ १० ॥
भावार्थ
‘पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली रमणी-शिरोमणि उदारहृदया सती-साध्वी सीता उस निर्जन वनमें भी श्रीरामके समीप बालिकाके समान खेलती और प्रसन्न रहती हैं ॥ १० ॥
तद्गतं हृदयं यस्यास्तदधीनं च जीवितम् । अयोध्या हि भवेदस्या रामहीना तथा वनम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उनका हृदय श्रीराममें ही लगा हुआ है । उनका जीवन भी श्रीरामके ही अधीन है, अतः रामके बिना अयोध्या भी उनके लिये वनके समान ही होगी ( और श्रीरामके साथ रहनेपर वे वनमें भी अयोध्याके समान ही सुखका अनुभव करेंगी ) ॥ ११ ॥
परिपृच्छति वैदेही ग्रामांश्च नगराणि च । गतिं दृष्ट्वा नदीनां च पादपान् विविधानपि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘विदेहनन्दिनी सीता मार्गमें मिलनेवाले गाँवों, नगरों, नदियोंके प्रवाहों और नाना प्रकारके वृक्षोंको देखकर उनका परिचय पूछा करती हैं ॥ १२ ॥
रामं वा लक्ष्मणं वापि दृष्ट्वा जानाति जानकी । अयोध्या क्रोशमात्रे तु विहारमिव साश्रिता ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम और लक्ष्मणको अपने पास देखकर जानकीको यही जान पड़ता है कि मैं अयोध्यासे एक कोसकी दूरीपर मानो घूमने-फिरनेके लिये ही आयी हूँ ॥ १३ ॥
इदमेव स्मराम्यस्याः सहसैवोपजल्पितम् । कैकेयीसंश्रितं जल्पं नेदानीं प्रतिभाति माम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘सीताके सम्बन्धमें मुझे इतना ही स्मरण है । उन्होंने कैकेयीको लक्ष्य करके जो सहसा कोई बात कह दी थी, वह इस समय मुझे याद नहीं आ रही है’ ॥ १४ ॥
ध्वंसयित्वा तु तद् वाक्यं प्रमादात् पर्युपस्थितम् । ह्लादनं वचनं सूतो देव्या मधुरमब्रवीत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भूलसे निकली हुई कैकेयीविषयक उस बातको पलटकर सारथि सुमन्त्रने देवी कौसल्याके हृदयको आह्लाद प्रदान करनेवाला मधुर वचन कहा—॥ १५ ॥
अध्वना वातवेगेन सम्भ्रमेणातपेन च । न विगच्छति वैदेह्याश्चन्द्रांशुसदृशी प्रभा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मार्गमें चलनेकी थकावट, वायुके वेग, भयदायक वस्तुओंको देखनेके कारण होनेवाली घबराहट तथा धूपसे भी विदेहराजकुमारीकी चन्द्रकिरणोंके समान कमनीय कान्ति उनसे दूर नहीं होती है ॥ १६ ॥
सदृशं शतपत्रस्य पूर्णचन्द्रोपमप्रभम् । वदनं तद् वदान्याया वैदेह्या न विकम्पते ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उदारहृदया सीताका विकसित कमलके समान सुन्दर तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्ददायक कान्तिसे युक्त मुख कभी मलिन नहीं होता है ॥ १७ ॥
अलक्तकरसरक्ताभावलक्तकरसवर्जितौ । अद्यापि चरणौ तस्याः पद्मकोशसमप्रभौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘जिनमें महावरके रंग नहीं लग रहे हैं, सीताके वे दोनों चरण आज भी महावरके समान ही लाल तथा कमलकोशके समान कान्तिमान् हैं ॥ १८ ॥
नूपुरोत्कृष्टलीलेव खेलं गच्छति भामिनी । इदानीमपि वैदेही तद्रागान्यस्तभूषणा ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनुरागके कारण उन्हींकी प्रसन्नताके लिये जिन्होंने आभूषणोंका परित्याग नहीं किया है, वे विदेहराजकुमारी भामिनी सीता इस समय भी अपने नूपुरोंकी झनकारसे हंसोंके कलनादका तिरस्कार-सा करती हुई लीलाविलासयुक्त गतिसे चलती हैं ॥ १९ ॥
गजं वा वीक्ष्य सिंहं वा व्याघ्रं वा वनमाश्रिता । नाहारयति संत्रासं बाहू रामस्य संश्रिता ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वे श्रीरामचन्द्रजीके बाहुबलका भरोसा करके वनमें रहती हैं और हाथी, बाघ अथवा सिंहको भी देखकर कभी भय नहीं मानती हैं ॥ २० ॥
न शोच्यास्ते न चात्मा ते शोच्यो नापि जनाधिपः । इदं हि चरितं लोके प्रतिष्ठास्यति शाश्वतम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अतः आप श्रीराम, लक्ष्मण अथवा सीताके लिये शोक न करें, अपने और महाराजके लिये भी चिन्ता छोड़ें । श्रीरामचन्द्रजीका यह पावन चरित्र संसारमें सदा ही स्थिर रहेगा ॥ २१ ॥
विधूय शोकं परिहृष्टमानसा महर्षियाते पथि सुव्यवस्थिताः । वने रता वन्यफलाशनाः पितुः शुभां प्रतिज्ञां प्रतिपालयन्ति ते ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘वे तीनों ही शोक छोड़कर प्रसन्नचित्त हो महर्षियोंके मार्गपर दृढ़तापूर्वक स्थित हैं और वनमें रहकर फल-मूलका भोजन करते हुए पिताकी उत्तम प्रतिज्ञाका पालन कर रहे हैं’ ॥ २२ ॥
तथापि सूतेन सुयुक्तवादिना निवार्यमाणा सुतशोककर्शिता । न चैव देवी विरराम कूजितात् प्रियेति पुत्रेति च राघवेति च ॥ २३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार युक्तियुक्त वचन कहकर सारथि सुमन्त्रने पुत्रशोकसे पीड़ित हुई कौसल्याको चिन्ता करने और रोनेसे रोका तो भी देवी कौसल्या विलापसे विरत न हुईं । वे ‘हा प्यारे !’ ‘हा पुत्र !’ और ‘हा रघुनन्दन !’ की रट लगाती हुई करुणक्रन्दन करती ही रहीं ॥ २३ ॥
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