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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 58

प्रत्याश्वस्तो यदा राजा मोहात् प्रत्यागतस्मृतिः । तदाजुहाव तं सूतं रामवृत्तान्तकारणात् ॥ १ ॥

भावार्थ

मूर्च्छा दूर होनेपर जब राजाको चेत हुआ तब सुस्थिर चित्त होकर उन्होंने श्रीरामका वृत्तान्त सुननेके लिये सारथि सुमन्त्रको सामने बुलाया ॥ १ ॥

तदा सूतो महाराजं कृताञ्जलिरुपस्थितः । राममेवानुशोचन्तं दुःखशोकसमन्वितम् ॥ २ ॥

भावार्थ

उस समय सुमन्त्र श्रीरामके ही शोक और चिन्तामें निरन्तर डूबे रहनेवाले दुःख-शोकसे व्याकुल महाराज दशरथके पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २ ॥

वृद्धं परमसंतप्तं नवग्रहमिव द्विपम् । विनिःश्वसन्तं ध्यायन्तमस्वस्थमिव कुञ्जरम् ॥ ३ ॥ राजा तु रजसा सूतं ध्वस्ताङ्गं समुपस्थितम् । अश्रुपूर्णमुखं दीनमुवाच परमार्तवत् ॥ ४ ॥

भावार्थ

जैसे जंगलसे तुरंत पकड़कर लाया हुआ हाथी अपने यूथपति गजराजका चिन्तन करके लंबी साँस खींचता और अत्यन्त संतप्त तथा अस्वस्थ हो जाता है; उसी प्रकार बूढ़े राजा दशरथ श्रीरामके लिये अत्यन्त संतप्त हो लंबी साँस खींचकर उन्हींका ध्यान करते हुए अस्वस्थ-से हो गये थे । राजाने देखा, सारथिका सारा शरीर धूलसे भर गया है । यह सामने खड़ा है । इसके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही है और यह अत्यन्त दीन दिखायी देता है । उस अवस्थामें राजाने अत्यन्त आर्त होकर उससे पूछा—॥ ३-४ ॥

क्व नु वत्स्यति धर्मात्मा वृक्षमूलमुपाश्रितः । सोऽत्यन्तसुखितः सूत किमशिष्यति राघवः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘सूत ! धर्मात्मा श्रीराम वृक्षकी जड़का सहारा ले कहाँ निवास करेंगे ? जो अत्यन्त सुखमें पले थे, वे मेरे लाड़ले राम वहाँ क्या खायेंगे ? ॥ ५ ॥

दुःखस्यानुचितो दुःखं सुमन्त्र शयनोचितः । भूमिपालात्मजो भूमौ शेते कथमनाथवत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘सुमन्त्र ! जो दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन्हीं श्रीरामको भारी दुःख प्राप्त हुआ है । जो राजोचित शय्यापर शयन करनेयोग्य हैं, वे राजकुमार श्रीराम अनाथकी भाँति भूमिपर कैसे सोते होंगे ? ॥ ६ ॥

यं यान्तमनुयान्ति स्म पदातिरथकुञ्जराः । स वत्स्यति कथं रामो विजनं वनमाश्रितः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जिनके यात्रा करते समय पीछे-पीछे पैदलों, रथियों और हाथीसवारोंकी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम निर्जन वनमें पहुँचकर वहाँ कैसे निवास करेंगे ? ॥ ७ ॥

व्यालैर्मृगैराचरितं कृष्णसर्पनिषेवितम् । कथं कुमारौ वैदेह्या सार्धं वनमुपाश्रितौ ॥ ८ ॥ सुकुमार्या तपस्विन्या सुमन्त्र सह सीतया । राजपुत्रौ कथं पादैरवरुह्य रथाद् गतौ ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘जहाँ अजगर और व्याघ्र-सिंह आदि हिंसक पशु विचरते हैं तथा काले सर्प जिसका सेवन करते हैं, उसी वनका आश्रय लेनेवाले मेरे दोनों कुमार सीताके साथ वहाँ कैसे रहेंगे ? ॥ ‘सुमन्त्र ! परम सुकुमारी तपस्विनी सीताके साथ वे दोनों राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण रथसे उतरकर पैदल कैसे गये होंगे ? ॥ ९ ॥

सिद्धार्थः खलु सूत त्वं येन दृष्टौ ममात्मजौ । वनान्तं प्रविशन्तौ तावश्विनाविव मन्दरम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सारथे ! तुम कृतकृत्य हो गये; क्योंकि जैसे दोनों अश्विनीकुमार मन्दराचलके वनमें जाते हैं, उसी प्रकार वनके भीतर प्रवेश करते हुए मेरे दोनों पुत्रोंको तुमने अपनी आँखोंसे देखा है ॥ १० ॥

किमुवाच वचो रामः किमुवाच च लक्ष्मणः । सुमन्त्र वनमासाद्य किमुवाच च मैथिली ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘सुमन्त्र ! वनमें पहुँचकर श्रीरामने तुमसे क्या कहा ? लक्ष्मणने भी क्या कहा ? तथा मिथिलेशकुमारी सीताने क्या संदेश दिया ? ॥ ११ ॥

आसितं शयितं भुक्तं सूत रामस्य कीर्तय । जीविष्याम्ययमेतेन ययातिरिव साधुषु ॥ १२ ॥ इति सूतो नरेन्द्रेण चोदितः सज्जमानया । उवाच वाचा राजानं स बाष्पपरिबद्धया ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘सूत ! तुम श्रीरामके बैठने, सोने और खाने-पीनेसे सम्बन्ध रखनेवाली बातें बताओ । जैसे स्वर्गसे गिरे हुए राजा ययाति सत्पुरुषोंके बीचमें उपस्थित होनेपर सत्संगके प्रभावसे पुनः सुखी हो गये थे, उसी प्रकार तुम-जैसे साधुपुरुषके मुखसे पुत्रका वृत्तान्त सुननेसे मैं सुखपूर्वक जीवन धारण कर सकूँगा’ ॥ महाराजके इस प्रकार पूछनेपर सारथि सुमन्त्रने आँसुओंसे रुँधी हुई गद्गद वाणीद्वारा उनसे कहा—॥ १३ ॥

अब्रवीन्मे महाराज धर्ममेवानुपालयन् । अञ्जलिं राघवः कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य च ॥ १४ ॥ सूत मद्वचनात् तस्य तातस्य विदितात्मनः । शिरसा वन्दनीयस्य वन्द्यौ पादौ महात्मनः ॥ १५ ॥ सर्वमन्तःपुरं वाच्यं सूत मद्वचनात् त्वया । आरोग्यमविशेषेण यथार्हमभिवादनम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! श्रीरामचन्द्रजीने धर्मका ही निरन्तर पालन करते हुए दोनों हाथ जोड़कर और मस्तक झुकाकर कहा है— ‘सूत ! तुम मेरी ओरसे आत्मज्ञानी तथा वन्दनीय मेरे महात्मा पिताके दोनों चरणोंमें प्रणाम कहना तथा अन्तःपुरमें सभी माताओंको मेरे आरोग्यका समाचार देते हुए उनसे विशेषरूपसे मेरा यथोचित प्रणाम निवेदन करना ॥ १४–१६ ॥

माता च मम कौसल्या कुशलं चाभिवादनम् । अप्रमादं च वक्तव्या ब्रूयाश्चैनामिदं वचः ॥ १७ ॥ धर्मनित्या यथाकालमग्न्यगारपरा भव । देवि देवस्य पादौ च देववत् परिपालय ॥ १८ ॥ अभिमानं च मानं च त्यक्त्वा वर्तस्व मातृषु । अनुराजानमार्यां च कैकेयीमम्ब कारय ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘इसके बाद मेरी माता कौसल्यासे मेरा प्रणाम करके बताना कि ‘मैं कुशलसे हूँ और धर्मपालनमें सावधान रहता हूँ ।’ फिर उनको मेरा यह संदेश सुनाना कि ‘माँ ! तुम सदा धर्ममें तत्पर रहकर यथासमय अग्निशालाके सेवन ( अग्निहोत्र-कार्य ) में संलग्न रहना । देवि ! महाराजको देवताके समान मानकर उनके चरणोंकी सेवा करना ॥ ‘अभिमान और मानको त्यागकर सभी माताओंके प्रति समान बर्ताव करना—उनके साथ हिल-मिलकर रहना । अम्ब ! जिसमें राजाका अनुराग है, उस कैकेयीको भी श्रेष्ठ मानकर उसका सत्कार करना ॥ १९ ॥

कुमारे भरते वृत्तिर्वर्तितव्या च राजवत् । अप्यज्येष्ठा हि राजानो राजधर्ममनुस्मर ॥ २० ॥

भावार्थ

‘कुमार भरतके प्रति राजोचित बर्ताव करना । राजा छोटी उम्रके हों तो भी वे आदरणीय ही होते हैं—इस राजधर्मको याद रखना’ ॥ २० ॥

भरतः कुशलं वाच्यो वाच्यो मद्वचनेन च । सर्वास्वेव यथान्यायं वृत्तिं वर्तस्व मातृषु ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘कुमार भरतसे भी मेरा कुशल-समाचार बताकर उनसे मेरी ओरसे कहना—‘भैया ! तुम सभी माताओंके प्रति न्यायोचित बर्ताव करते रहना ॥ २१ ॥

वक्तव्यश्च महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः । पितरं यौवराज्यस्थो राज्यस्थमनुपालय ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘इक्ष्वाकुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु भरतसे यह भी कहना चाहिये कि युवराजपदपर अभिषिक्त होनेके बाद भी तुम राज्यसिंहासनपर विराजमान पिताजीकी रक्षा एवं सेवामें संलग्न रहना ॥ २२ ॥

अतिक्रान्तवया राजा मा स्मैनं व्यपरोरुधः । कुमारराज्ये जीवस्व तस्यैवाज्ञाप्रवर्तनात् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘राजा बहुत बूढ़े हो गये हैं—ऐसा मानकर तुम उनका विरोध न करना—उन्हें राजसिंहासनसे न उतारना । युवराज-पदपर ही प्रतिष्ठित रहकर उनकी आज्ञाका पालन करते हुए ही जीवन-निर्वाह करना ॥ २३ ॥

अब्रवीच्चापि मां भूयो भृशमश्रूणि वर्तयन् । मातेव मम माता ते द्रष्टव्या पुत्रगर्धिनी ॥ २४ ॥ इत्येवं मां महाबाहुर्बुवन्नेव महायशाः । रामो राजीवपत्राक्षो भृशमश्रूण्यवर्तयत् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘फिर उन्होंने नेत्रोंसे बहुत आँसू बहाते हुए मुझसे भरतसे कहनेके लिये ही यह संदेश दिया—‘भरत ! मेरी पुत्रवत्सला माताको अपनी ही माताके समान समझना ।’ मुझसे इतना ही कहकर महाबाहु महायशस्वी कमलनयन श्रीराम बड़े वेगसे आँसुओंकी वर्षा करने लगे ॥ २४-२५ ॥

लक्ष्मणस्तु सुसंक्रुद्धो निःश्वसन् वाक्यमब्रवीत् । केनायमपराधेन राजपुत्रो विवासितः ॥ २६ ॥ राज्ञा तु खलु कैकेय्या लघु चाश्रुत्य शासनम् । कृतं कार्यमकार्यं वा वयं येनाभिपीडिताः ॥ २७ ॥ यदि प्रव्राजितो रामो लोभकारणकारितम् । वरदाननिमित्तं वा सर्वथा दुष्कृतं कृतम् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘परंतु लक्ष्मण उस समय अत्यन्त कुपित हो लंबी साँस खींचते हुए बोले—‘सुमन्त्रजी ! किस अपराधके कारण महाराजने इन राजकुमार श्रीरामको देशनिकाला दे दिया है ?॥ ‘राजाने कैकेयीका आदेश सुनकर झटसे उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली । उनका यह कार्य उचित हो या अनुचित, परंतु हमलोगोंको उसके कारण कष्ट भोगना ही पड़ता है ॥ ‘श्रीरामको वनवास देना कैकेयीके लोभके कारण हुआ हो अथवा राजाके दिये हुए वरदानके कारण, मेरी दृष्टिमें यह सर्वथा पाप ही किया गया है ॥ २८ ॥

इदं तावद् यथाकाममीश्वरस्य कृते कृतम् । रामस्य तु परित्यागे न हेतुमुपलक्षये ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘यह श्रीरामको वनवास देनेका कार्य राजाकी स्वेच्छा-चारिताके कारण किया गया हो अथवा ईश्वरकी प्रेरणासे, परंतु मुझे श्रीरामके परित्यागका कोई समुचित कारण नहीं दिखायी देता है ॥ २९ ॥

असमीक्ष्य समारब्धं विरुद्धं बुद्धिलाघवात् । जनयिष्यति संक्रोशं राघवस्य विवासनम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘बुद्धिकी कमी अथवा तुच्छताके कारण उचित-अनुचित-का विचार किये बिना ही जो यह राम-वनवासरूपी शास्त्रविरुद्ध कार्य आरम्भ किया गया है; यह अवश्य ही निन्दा और दुःखका जनक होगा ॥ ३० ॥

अहं तावन्महाराजे पितृत्वं नोपलक्षये । भ्राता भर्ता च बन्धुश्च पिता च मम राघवः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘मुझे इस समय महाराजमें पिताका भाव नहीं दिखायी देता । अब तो रघुकुलनन्दन श्रीराम ही मेरे भाई, स्वामी, बन्धु-बान्धव तथा पिता हैं ॥ ३१ ॥

सर्वलोकप्रियं त्यक्त्वा सर्वलोकहिते रतम् । सर्वलोकोऽनुरज्येत कथं चानेन कर्मणा ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘जो सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर होनेके कारण सब लोगोंके प्रिय हैं, उन श्रीरामका परित्याग करके राजाने जो यह क्रूरतापूर्ण पापकृत्य किया है, इसके कारण अब सारा संसार उनमें कैसे अनुरक्त रह सकता है ? ( अब उनमें राजोचित गुण कहाँ रह गया है ? ) ॥ ३२ ॥

सर्वप्रजाभिरामं हि रामं प्रव्रज्य धार्मिकम् । सर्वलोकविरोधेन कथं राजा भविष्यति ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘जिनमें समस्त प्रजाका मन रमता है, उन धर्मात्मा श्रीरामको देशनिकाला देकर समस्त लोकोंका विरोध करनेके कारण अब वे कैसे राजा हो सकेंगे ? ॥ ३३ ॥

जानकी तु महाराज निःश्वसन्ती तपस्विनी । भूतोपहतचित्तेव विष्ठिता विस्मृता स्थिता ॥ ३४ ॥ अदृष्टपूर्वव्यसना राजपुत्री यशस्विनी । तेन दुःखेन रुदती नैव मां किंचिदब्रवीत् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! तपस्विनी जनकनन्दिनी सीता तो लंबी साँस खींचती हुई इस प्रकार निश्चेष्ट खड़ी थीं, मानो उनमें किसी भूतका आवेश हो गया हो । वे भूली-सी जान पड़ती थीं ॥ ‘उन यशस्विनी राजकुमारीने पहले कभी ऐसा संकट नहीं देखा था । वे पतिके ही दुःखसे दुखी होकर रो रही थीं । उन्होंने मुझसे कुछ भी नहीं कहा ॥ ३५ ॥

उद्वीक्षमाणा भर्तारं मुखेन परिशुष्यता । मुमोच सहसा बाष्पं प्रयान्तमुपवीक्ष्य सा ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘मुझे इधर आनेके लिये उद्यत देख वे सूखे मुँहसे पतिकी ओर देखती हुई सहसा आँसू बहाने लगी थीं ॥ ३६ ॥

तथैव रामोऽश्रुमुखः कृताञ्जलिः स्थितोऽब्रवीलक्ष्मणबाहुपालितः । तथैव सीता रुदती तपस्विनी निरीक्षते राजरथं तथैव माम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘इसी प्रकार लक्ष्मणकी भुजाओंसे सुरक्षित श्रीराम उस समय हाथ जोड़े खड़े थे । उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी । मनस्विनी सीता भी रोती हुई कभी आपके इस रथकी ओर देखती थीं और कभी मेरी ओर’ ॥ ३७ ॥

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