अयोध्याकाण्ड, सर्ग 57
कथयित्वा तु दुःखार्तः सुमन्त्रेण चिरं सह। रामे दक्षिणकूलस्थे जगाम स्वगृहं गुहः ॥ १ ॥
भावार्थ
इधर, जब श्रीराम गङ्गाके दक्षिणतटपर उतर गये, तब गुह दुःखसे व्याकुल हो सुमन्त्रके साथ बड़ी देरतक बातचीत करता रहा। इसके बाद वह सुमन्त्रको साथ ले अपने घरको चला गया ॥ १ ॥
भरद्वाजाभिगमनं प्रयागे च सभाजनम्। आ गिरेर्गमनं तेषां तत्रस्थैरभिलक्षितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका प्रयागमें भरद्वाजके आश्रमपर जाना, मुनिके द्वारा सत्कार पाना तथा चित्रकूट पर्वतपर पहुँचना—— ये सब वृत्तान्त शृङ्गवेरके निवासी गुप्तचरोंने देखे और लौटकर गुहको इन बातोंसे अवगत कराया ॥ २ ॥
अनुज्ञातः सुमन्त्रोऽथ योजयित्वा हयोत्तमान्। अयोध्यामेव नगरीं प्रययौ गाढदुर्मनाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
इन सब बातोंको जानकर सुमन्त्र गुहसे विदा ले अपने उत्तम घोड़ोंको रथमें जोतकर अयोध्याकी ओर ही लौट पड़े। उस समय उनके मनमें बड़ा दुःख हो रहा था ॥ ३ ॥
स वनानि सुगन्धीनि सरितश्च सरांसि च। पश्यन् यत्तो ययौ शीघ्रं ग्रामाणि नगराणि च ॥ ४ ॥
भावार्थ
वे मार्गमें सुगन्धित वनों, नदियों, सरोवरों, गाँवों और नगरोंको देखते हुए बड़ी सावधानीके साथ शीघ्रतापूर्वक जा रहे थे ॥ ४ ॥
ततः सायाह्नसमये द्वितीयेऽहनि सारथिः। अयोध्यां समनुप्राप्य निरानन्दां ददर्श ह ॥ ५ ॥
भावार्थ
शृङ्गबेरपुरसे लौटनेके दूसरे दिन सायंकालमें अयोध्या पहुँचकर उन्होंने देखा, सारी पुरी आनन्दशून्य हो गयी है ॥ ५ ॥
स शून्यामिव निःशब्दां दृष्ट्वा परमदुर्मनाः। सुमन्त्रश्चिन्तयामास शोकवेगसमाहतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
वहाँ कहीं एक शब्द भी सुनायी नहीं देता था। सारी पुरी ऐसी नीरव थी, मानो मनुष्योंसे सूनी हो गयी हो। अयोध्याकी ऐसी दशा देखकर सुमन्त्रके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वे शोकके वेगसे पीड़ित हो इस प्रकार चिन्ता करने लगे——॥ ६ ॥
कच्चिन्न सगजा साश्वा सजना सजनाधिपा। रामसंतापदुःखेन दग्धा शोकाग्निना पुरी ॥ ७ ॥ इति चिन्तापरः सूतो वाजिभिः शीघ्रयायिभिः। नगरद्वारमासाद्य त्वरितः प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि श्रीरामके विरहजनित संतापके दुःखसे व्यथित हो हाथी, घोड़े, मनुष्य और महाराजसहित सारी अयोध्यापुरी शोकाग्निसे दग्ध हो गयी हो’॥ इसी चिन्तामें पड़े हुए सारथि सुमन्त्रने शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा नगरद्वारपर पहुँचकर तुरंत ही पुरीके भीतर प्रवेश किया ॥ ८ ॥
सुमन्त्रमभिधावन्तः शतशोऽथ सहस्रशः। क राम इति पृच्छन्तः सूतमभ्यद्रवन् नराः ॥ ९ ॥
भावार्थ
सुमन्त्रको देखकर सैकड़ों और हजारों पुरवासी मनुष्य दौड़े आये और ‘श्रीराम कहाँ हैं?’ यह पूछते हुए उनके रथके साथ-साथ दौड़ने लगे ॥ ९ ॥
तेषां शशंस गङ्गायामहमापृच्छ्य राघवम्। अनुज्ञातो निवृत्तोऽस्मि धार्मिकेण महात्मना ॥ १० ॥ ते तीर्णा इति विज्ञाय बाष्पपूर्णमुखा नराः। अहो धिगिति निःश्वस्य हा रामेति विचुक्रुशुः ॥ ११ ॥
भावार्थ
उस समय सुमन्त्रने उन लोगोंसे कहा—‘सज्जनो ! मैं गङ्गाजीके किनारेतक श्रीरघुनाथजीके साथ गया था। वहाँसे उन धर्मनिष्ठ महात्माने मुझे लौट जानेकी आज्ञा दी। अतः मैं उनसे विदा लेकर यहाँ लौट आया हूँ। ‘वे तीनों व्यक्ति गङ्गाके उस पार चले गये’ यह जानकर सब लोगोंके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह चलीं। ‘अहो ! हमें धिक्कार है।’ ऐसा कहकर वे लंबी साँसें खींचते और ‘हा राम !’ की पुकार मचाते हुए जोर-जोरसे करुणक्रन्दन करने लगे ॥ १०-११ ॥
शुश्राव च वचस्तेषां वृन्दं वृन्दं च तिष्ठताम्। हताः स्म खलु ये नेह पश्याम इति राघवम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
सुमन्त्रने उनकी बातें सुनीं। वे झुंड-के-झुंड खड़े होकर कह रहे थे—‘हाय ! निश्चय ही हमलोग मारे गये; क्योंकि अब हम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीको नहीं देख पायँगे ॥ १२ ॥
दानयज्ञविवाहेषु समाजेषु महत्सु च। न द्रक्ष्यामः पुनर्जातु धार्मिकं राममन्तरा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘दान, यज्ञ, विवाह तथा बड़े-बड़े सामाजिक उत्सवोंके समय अब हम कभी धर्मात्मा श्रीरामको अपने बीचमें खड़ा हुआ नहीं देख सकेंगे ॥ १३ ॥
किं समर्थं जनस्यास्य किं प्रियं किं सुखावहम् । इति रामेण नगरं पित्रेव परिपालितम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अमुक पुरुषके लिये कौन-सी वस्तु उपयोगी है ? क्या करनेसे उसका प्रिय होगा ? और कैसे किस-किस वस्तुसे उसे सुख मिलेगा, इत्यादि बातोंका विचार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी पिताकी भाँति इस नगरका पालन करते थे’ ॥ १४ ॥
वातायनगतानां च स्त्रीणामन्वन्तरापणम् । राममेवाभितप्तानां शुश्राव परिदेवनाम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
बाजारके बीचसे निकलते समय सारथिके कानोंमें स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनायी दी, जो महलोंकी खिड़कियोंमें बैठकर श्रीरामके लिये ही संतप्त हो विलाप कर रहीं थीं ॥ १५ ॥
स राजमार्गमध्येन सुमन्त्रः पिहितानन: । यत्र राजा दशरथस्तदेवोपययौ गृहम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
राजमार्गके बीचसे जाते हुए सुमन्त्रने कपड़ेसे अपना मुँह ढक लिया । वे रथ लेकर उसी भवनकी ओर गये, जहाँ राजा दशरथ मौजूद थे ॥ १६ ॥
सोऽवतीर्य रथाच्छीघ्रं राजवेश्म प्रविश्य च । कक्ष्याः सप्ताभिचक्राम महाजनसमाकुलाः ॥ १७ ॥
भावार्थ
राजमहलके पास पहुँचकर वे शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और भीतर प्रवेश करके बहुत-से मनुष्योंसे भरी हुई सात ड्योढ़ियोंको पार कर गये ॥ १७ ॥
हर्म्यैर्विमानैः प्रासादैरवेक्ष्याथ समागतम् । हाहाकारकृता नार्यो रामादर्शनकर्शिताः ॥ १८ ॥
भावार्थ
धनियोंकी अट्टालिकाओं, सतमंजिले मकानों तथा राजभवनोंमें बैठी हुई स्त्रियाँ सुमन्त्रको लौटा हुआ देख श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित होनेके दुःखसे दुर्बल हो हाहाकार कर उठीं ॥ १८ ॥
आयतैर्विमलैर्नेत्रैरश्रुवेगपरिप्लुतैः । अन्योन्यमभिवीक्षन्तेऽव्यक्तमार्ततराः स्त्रियः ॥ १९ ॥
भावार्थ
उनके कजल आदिसे रहित बड़े-बड़े नेत्र आँसुओंके वेगमें डूबे हुए थे । वे स्त्रियाँ अत्यन्त आर्त होकर अव्यक्त-भावसे एक दूसरीकी ओर देख रही थीं ॥ १९ ॥
ततो दशरथस्त्रीणां प्रासादेभ्यस्ततस्ततः । रामशोकाभितप्तानां मन्दं शुश्राव जल्पितम् ॥ २० ॥
भावार्थ
तदनन्तर राजमहलोंमें जहाँ-तहाँसे श्रीरामके शोकसे संतप्त हुई राजा दशरथकी रानियोंके मन्दस्वरमें कहे गये वचन सुनायी पड़े ॥ २० ॥
सह रामेण निर्यातो विना राममिहागतः । सूतः किं नाम कौसल्यां क्रोशन्तीं प्रतिवक्ष्यति ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘ये सारथि सुमन्त्र श्रीरामके साथ यहाँसे गये थे और उनके बिना ही यहाँ लौटे हैं, ऐसी दशामें करुणक्रन्दन करती हुई कौसल्याको ये क्या उत्तर देंगे ? ॥ २१ ॥
यथा च मन्ये दुर्जीवमेवं न सुकरं ध्रुवम् । आच्छिद्य पुत्रे निर्याते कौसल्या यत्र जीवति ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मैं समझती हूँ, जैसे जीवन दुःखजनित है, निश्चय ही उसी प्रकार इसका नाश भी सुकर नहीं है; तभी तो न्यायतः प्राप्त हुए अभिषेकको त्यागकर पुत्रके वनमें चले जानेपर भी कौसल्या अभीतक जीवित हैं’ ॥ २२ ॥
सत्यरूपं तु तद् वाक्यं राजस्त्रीणां निशामयन् । प्रदीप्त इव शोकेन विवेश सहसा गृहम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
रानियोंकी वह सच्ची बात सुनकर शोकसे दग्ध-से होते हुए सुमन्त्रने सहसा राजभवनमें प्रवेश किया ॥ २३ ॥
स प्रविश्याष्टमीं कक्ष्यां राजानं दीनमातुरम् । पुत्रशोकपरिद्यूनमपश्यत् पाण्डुरे गृहे ॥ २४ ॥
भावार्थ
आठवीं ड्योढ़ीमें प्रवेश करके उन्होंने देखा, राजा एक श्वेत भवनमें बैठे और पुत्रशोकसे मलिन, दीन एवं आतुर हो रहे हैं ॥ २४ ॥
अभिगम्य तमासीनं राजानमभिवाद्य च । सुमन्त्रो रामवचनं यथोक्तं प्रत्यवेदयत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
सुमन्त्रने वहाँ बैठे हुए महाराजके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई बातें ज्यों-की-त्यों सुना दीं ॥ २५ ॥
स तूष्णीमेव तच्छ्रुत्वा राजा विद्रुतमानसः । मूर्च्छितो न्यपतद् भूमौ रामशोकाभिपीडितः ॥ २६ ॥
भावार्थ
राजाने चुपचाप ही वह सुन लिया, सुनकर उनका हृदय द्रवित ( व्याकुल ) हो गया । फिर वे श्रीरामके शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
ततोऽन्तःपुरमाविद्धं मूर्च्छिते पृथिवीपतौ । उच्छ्रित्य बाहू चुक्रोश नृपतौ पतिते क्षितौ ॥ २७ ॥
भावार्थ
महाराजके मूर्च्छित हो जानेपर सारा अन्तःपुर दुःखसे व्यथित हो उठा । राजाके पृथ्वीपर गिरते ही सब लोग दोनों बाहें उठाकर जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ २७ ॥
सुमित्रया तु सहिता कौसल्या पतितं पतिम् । उत्थापयामास तदा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २८ ॥
भावार्थ
उस समय कौसल्याने सुमित्राकी सहायतासे अपने गिरे हुए पतिको उठाया और इस प्रकार कहा—॥२८ ॥
इमं तस्य महाभाग दूतं दुष्करकारिणः । वनवासादनुप्राप्तं कस्मान्न प्रतिभाषसे ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘महाभाग ! ये सुमन्त्रजी दुष्कर कर्म करनेवाले श्रीरामके दूत होकर—उनका संदेश लेकर वनवाससे लौटे हैं। आप इनसे बात क्यों नहीं करते हैं ? ॥ २९ ॥
अद्येममनयं कृत्वा व्यपत्रपसि राघव। उत्तिष्ठ सुकृतं तेऽस्तु शोके न स्यात् सहायता ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! पुत्रको वनवास दे देना अन्याय है। यह अन्याय करके आप लजित क्यों हो रहे हैं ? उठिये, आपको अपने सत्यके पालनका पुण्य प्राप्त हो । जब आप इस तरह शोक करेंगे, तब आपके सहायकोंका समुदाय भी आपके साथ ही नष्ट हो जायगा ॥ ३० ॥
देव यस्या भयाद् रामं नानुपृच्छसि सारथिम् । नेह तिष्ठति कैकेयी विश्रब्धं प्रतिभाष्यताम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘देव ! आप जिसके भयसे सुमन्त्रजीसे श्रीरामका समाचार नहीं पूछ रहे हैं, वह कैकेयी यहाँ मौजूद नहीं है; अतः निर्भय होकर बात कीजिये’ ॥ ३१ ॥
सा तथोक्त्वा महाराजं कौसल्या शोकलालसा । धरण्यां निपपाताशु बाष्पविप्लुतभाषिणी ॥ ३२ ॥
भावार्थ
महाराजसे ऐसा कहकर कौसल्याका गला भर आया । आँसुओंके कारण उनसे बोला नहीं गया और वे शोकसे व्याकुल होकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३२ ॥
विलपन्तीं तथा दृष्ट्वा कौसल्यां पतितां भुवि । पतिं चावेक्ष्य ताः सर्वाः समन्ताद् रुरुदुः स्त्रियः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार विलाप करती हुई कौसल्याको भूमिपर पड़ी देख और अपने पतिकी मूर्च्छित दशापर दृष्टिपात करके सभी रानियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं ॥ ३३ ॥
ततस्तमन्तःपुरनादमुत्थितं समीक्ष्य वृद्धास्तरुणाश्च मानवाः । स्त्रियश्च सर्वा रुरुदुः समन्ततः पुरं तदासीत् पुनरेव संकुलम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
अन्तःपुरसे उठे हुए उस आर्तनादको देख-सुनकर नगरके बूढ़े और जवान पुरुष रो पड़े । सारी स्त्रियाँ भी रोने लगीं । वह सारा नगर उस समय सब ओरसे पुनः शोकसे व्याकुल हो उठा ॥ ३४ ॥
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