अयोध्याकाण्ड, सर्ग 55
उषित्वा रजनीं तत्र राजपुत्रावरिंदमौ । महर्षिमभिवाद्याथ जग्मतुस्तं गिरिं प्रति ॥ १ ॥
भावार्थ
उस आश्रममें रातभर रहकर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों राजकुमार महर्षिको प्रणाम करके चित्रकूट पर्वतपर जानेको उद्यत हुए ॥ १ ॥
तेषां स्वस्त्ययनं चैव महर्षिः स चकार ह । प्रस्थितान् प्रेक्ष्य तांश्चैव पिता पुत्रानिवौरसान् ॥ २ ॥
भावार्थ
उन तीनोंको प्रस्थान करते देख महर्षिने उनके लिये उसी प्रकार स्वस्तिवाचन किया जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंको यात्रा करते देख उनके लिये मङ्गलसूचक आशीर्वाद देता है ॥ २ ॥
ततः प्रचक्रमे वक्तुं वचनं स महामुनिः । भरद्वाजो महातेजा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महातेजस्वी महामुनि भरद्वाजने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥३॥
गङ्गायमुनयोः संधिमासाद्य मनुजर्षभौ । कालिन्दीमनुगच्छेतां नदीं पश्चान्मुखाश्रिताम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! तुम दोनों भाई गङ्गा और यमुनाके संगमपर पहुँचकर जिनमें पश्चिममुखी होकर गङ्गा मिली हैं, उन महानदी यमुनाके निकट जाना ॥ ४ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं प्रतिस्रोतःसमागताम् । तस्यास्तीर्थं प्रचरितं प्रकामं प्रेक्ष्य राघव । तत्र यूयं प्लवं कृत्वा तरतांशुमतीं नदीम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! तदनन्तर गङ्गाजीके जलके वेगसे अपने प्रवाहके प्रतिकूल दिशामें मुड़ी हुई यमुनाके पास पहुँचकर लोगोंके आने-जानेके कारण उनके पदचिह्नोंसे चिह्नित हुए अवतरण-प्रदेश ( पार उतरनेके लिये उपयोगी घाट ) को अच्छी तरह देख-भालकर वहाँ जाना और एक बेड़ा बनाकर उसीके द्वारा सूर्यकन्या यमुनाके उस पार उतर जाना ॥५॥
ततो न्यग्रोधमासाद्य महान्तं हरितच्छदम् । परीतं बहुभिर्वृक्षैः श्यामं सिद्धोपसेवितम् ॥ ६ ॥ तस्मिन् सीताञ्जलिं कृत्वा प्रयुञ्जीताशिषां क्रियाम् । समासाद्य च तं वृक्षं वसेद् वातिक्रमेत वा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् आगे जानेपर एक बहुत बड़ा बरगदका वृक्ष मिलेगा, जिसके पत्ते हरे रंगके हैं । वह चारों ओरसे बहुसंख्यक दूसरे वृक्षोंद्वारा घिरा हुआ है । उस वृक्षका नाम श्यामवट है । उसकी छायाके नीचे बहुत-से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं । वहाँ पहुँचकर सीता दोनों हाथ जोड़कर उस वृक्षसे आशीर्वादकी याचना करें । यात्रीकी इच्छा हो तो उस वृक्षके पास जाकर कुछ कालतक वहाँ निवास करे अथवा वहाँसे आगे बढ़ जाय ॥ ६-७ ॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा नीलं प्रेक्ष्य च काननम् । सल्लकीबदरीमिश्रं रम्यं वंशैश्च यामुनैः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘श्यामवटसे एक कोस दूर जानेपर तुम्हें नीलवनका दर्शन होगा; वहाँ सल्लकी ( चीड़ ) और बेरके भी पेड़ मिले हुए हैं । यमुनाके तटपर उत्पन्न हुए बाँसोंके कारण वह और भी रमणीय दिखायी देता है ॥ ८ ॥
स पन्थाश्चित्रकूटस्य गतस्य बहुशो मया । रम्यो मार्दवयुक्तश्च दावैश्चैव विवर्जितः ॥ ९ ॥ इति पन्थानमादिश्य महर्षिः संन्यवर्तत । अभिवाद्य तथेत्युक्त्वा रामेण विनिवर्तितः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यह वही स्थान है जहाँसे चित्रकूटको रास्ता जाता है । मैं उस मार्गसे कई बार गया हूँ । वहाँकी भूमि कोमल और दृश्य रमणीय है। उधर कभी दावानलका भय नहीं होता है’ ॥ इस प्रकार मार्ग बताकर जब महर्षि भरद्वाज लौटने लगे, तब श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—‘अब आप आश्रमको लौट जाइये’ ॥ १० ॥
उपावृत्ते मुनौ तस्मिन् रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । कृतपुण्याः स्म भद्रं ते मुनिर्यन्नोऽनुकम्पते ॥ ११ ॥
भावार्थ
उन महर्षिके लौट जानेपर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— ‘सुमित्रानन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो । ये मुनि हमारे ऊपर जो इतनी कृपा रखते हैं, इससे जान पड़ता है कि हमलोगोंने पहले कभी महान् पुण्य किया है’ ॥ ११ ॥
इति तौ पुरुषव्याघ्रौ मन्त्रयित्वा मनस्विनौ । सीतामेवाग्रतः कृत्वा कालिन्दीं जग्मतुर्नदीम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों मनस्वी पुरुषसिंह सीताको ही आगे करके यमुना नदीके तटपर गये ॥ १२ ॥
अथासाद्य तु कालिन्दीं शीघ्रस्रोतस्विनीं नदीम् । चिन्तामापेदिरे सद्यो नदीजलतितीर्षवः ॥ १३ ॥
भावार्थ
वहाँ कालिन्दीका स्रोत बड़ी तीव्रगतिसे प्रवाहित हो रहा था; वहाँ पहुँचकर वे इस चिन्तामें पड़े कि कैसे नदीको पार किया जाय; क्योंकि वे तुरंत ही यमुनाजीके जलको पार करना चाहते थे ॥ १३ ॥
तौ काष्ठसंघाटमथो चक्रतुः सुमहाप्लवम् । शुष्कैर्वंशैः समाकीर्णमुशीरैश्च समावृतम् ॥ १४ ॥ ततो वैतसशाखाश्च जम्बुशाखाश्च वीर्यवान् । चकार लक्ष्मणश्छित्त्वा सीतायाः सुखमासनम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
फिर उन दोनों भाइयोंने जंगलके सूखे काठ बटोरकर उन्हींके द्वारा एक बहुत बड़ा बेड़ा तैयार किया । वह बेड़ा सूखे बाँसोंसे व्याप्त था और उसके ऊपर खस बिछाया गया था । तदनन्तर पराक्रमी लक्ष्मणने बेंत और जामुनकी टहनियों-को काटकर सीताके बैठनेके लिये एक सुखद आसन तैयार किया ॥ १४-१५ ॥
तत्र श्रियमिवाचिन्त्यां रामो दाशरथिः प्रियाम् । ईषत्स लज्जमानां तामध्यारोपयत प्लवम् ॥ १६ ॥ पार्श्वे तत्र च वैदेह्या वसने भूषणानि च । प्लवे कठिनकाजं च रामश्चक्रे समाहितः ॥ १७ ॥
भावार्थ
दशरथनन्दन श्रीरामने लक्ष्मीके समान अचिन्त्य ऐश्वर्य-वाली अपनी प्रिया सीताको जो कुछ लज्जित-सी हो रही थीं, उस बेड़ेपर चढ़ा दिया और उनके बगलमें वस्त्र एवं आभूषण रख दिये; फिर श्रीरामने बड़ी सावधानीके साथ खन्ती ( कुदारी ) और बकरेके चमड़ेसे मढ़ी हुई पिटारीको भी बेड़ेपर ही रखा ॥ १६-१७ ॥
आरोप्य सीतां प्रथमं संघाटं परिगृह्य तौ । ततः प्रतेरतुर्यत्तौ प्रीतौ दशरथात्मजौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार पहले सीताको चढ़ाकर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण उस बेड़ेको पकड़कर खेने लगे । उन्होंने बड़े प्रयत्न और प्रसन्नताके साथ नदीको पार करना आरम्भ किया ॥ १८ ॥
कालिन्दीमध्यमायाता सीता त्वेनामवन्दत । स्वस्ति देवि तरामि त्वां पारयेन्मे पतिर्व्रतम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
यमुनाकी बीच धारामें आनेपर सीताने उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘देवि ! इस बेड़ेद्वारा मैं आपके पार जा रही हूँ। आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमलोग सकुशल पार हो जाएँ और मेरे पतिदेव अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञाको निर्विघ्न पूर्ण करें ॥ १९ ॥
यक्ष्ये त्वां गोसहस्रेण सुराघटशतेन च । स्वस्ति प्रत्यागते रामे पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘इक्ष्वाकुवंशी वीरोंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें श्रीरघुनाथजीके सकुशल लौट आनेपर मैं आपके किनारे एक सहस्र गौओंका दान करूँगी और सैकड़ों देवदुर्लभ पदार्थ अर्पित करके आपकी पूजा सम्पन्न करूँगी’ ॥ २० ॥
कालिन्दीमथ सीता तु याचमाना कृताञ्जलिः । तीरमेवाभिसम्प्राप्ता दक्षिणं वरवर्णिनी ॥ २१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सुन्दरी सीता हाथ जोड़कर यमुनाजीसे प्रार्थना कर रही थीं, इतनेहीमें वे दक्षिण तटपर जा पहुँचीं ॥ २१ ॥
ततः प्लवेनांशुमतीं शीघ्रगामूर्मिमालिनीम् । तीरजैर्बहुभिर्वृक्षैः संतेरुर्यमुनां नदीम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
इस तरह उन तीनोंने उसी बेड़ेद्वारा बहुसंख्यक तटवर्त्ती वृक्षोंसे सुशोभित और तरङ्गमालाओंसे अलंकृत शीघ्रगामिनी सूर्य-कन्या यमुना नदीको पार किया ॥ २२ ॥
ते तीर्णाः प्लवमुत्सृज्य प्रस्थाय यमुनावनात् । श्यामं न्यग्रोधमासेदुः शीतलं हरितच्छदम् ॥ २३ ॥ न्यग्रोधं समुपागम्य वैदेही चाभ्यवन्दत । नमस्तेऽस्तु महावृक्ष पारयेन्मे पतिर्व्रतम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
पार उतरकर उन्होंने बेड़ेको तो वहीं तटपर छोड़ दिया और यमुना-तटवर्ती वनसे प्रस्थान करके वे हरे-हरे पत्तोंसे सुशोभित शीतल छायावाले श्यामवटके पास जा पहुँचे ॥ वटके समीप पहुँचकर विदेहनन्दिनी सीताने उसे मस्तक झुकाया और इस प्रकार कहा–‘महावृक्ष ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पतिदेव अपने वनवासविषयक व्रतको पूर्ण करें ॥ २४ ॥
कौसल्यां चैव पश्येम सुमित्रां च यशस्विनीम् । इति सीताञ्जलिं कृत्वा पर्यगच्छन्मनस्विनी ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तथा हमलोग वनसे सकुशल लौटकर माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रादेवीका दर्शन कर सकें।’ इस प्रकार कहकर मनस्विनी सीताने हाथ जोड़े हुए उस वृक्षकी परिक्रमा की ॥ २५ ॥
अवलोक्य ततः सीतामायाचन्तीमनिन्दिताम् । दयितां च विधेयां च रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
सदा अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्राणप्यारी सती-साध्वी सीताको श्यामवटसे आशीर्वादकी याचना करती देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ २६ ॥
सीतामादाय गच्छ त्वमग्रतो भरतानुज । पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सायुधो द्विपदां वर ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘भरतके छोटे भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! तुम सीताको साथ लेकर आगे-आगे चलो और मैं धनुष धारण किये पीछेसे तुमलोगोंकी रक्षा करता हुआ चलूँगा ॥ २७ ॥
यद् यत् फलं प्रार्थयते पुष्पं वा जनकात्मजा । तत् तत् प्रयच्छ वैदेह्या यत्रास्या रमते मनः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘विदेहकुलनन्दिनी जनकदुलारी सीता जो-जो फल या फूल माँगें अथवा जिस वस्तुको पाकर इनका मन प्रसन्न रहे, वह सब इन्हें देते रहो’ ॥ २८ ॥
एकैकं पादपं गुल्मं लतां वा पुष्पशालिनीम् । अदृष्टरूपां पश्यन्ती रामं पप्रच्छ साबला ॥ २९ ॥
भावार्थ
अबला सीता एक-एक वृक्ष, झाड़ी अथवा पहलेकी न देखी हुई पुष्पशोभित लताको देखकर उसके विषयमें श्रीरामचन्द्रजीसे पूछती थीं ॥ २९ ॥
रमणीयान् बहुविधान् पादपान् कुसुमोत्करान् । सीतावचनसंरब्ध आनयामास लक्ष्मणः ॥ ३० ॥
भावार्थ
तथा लक्ष्मण सीताके कथनानुसार तुरंत ही भाँति-भाँतिके वृक्षोंकी मनोहर शाखाएँ और फूलोंके गुच्छे ला-लाकर उन्हें देते थे ॥ ३० ॥
विचित्रवालुकजलां हंससारसनादिताम् । रेमे जनकराजस्य सुता प्रेक्ष्य तदा नदीम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उस समय जनकराजकिशोरी सीता विचित्र वालुका और जलराशिसे सुशोभित तथा हंस और सारसोंके कलनादसे मुखरित यमुना नदीको देखकर बहुत प्रसन्न होती थीं ॥३१॥
क्रोशमात्रं ततो गत्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनावने ॥ ३२ ॥
भावार्थ
इस तरह एक कोसकी यात्रा करके दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण ( प्राणियोंके हितके लिये ) मार्गमें मिले हुए हिंसक पशुओंका वध करते हुए यमुना-तटवर्ती वनमें विचरने लगे ॥ ३२ ॥
विहृत्य ते बर्हिणपूगनादिते शुभे वने वारणवानरायुते । समं नदीवप्रमुपेत्य सत्वरं निवासमाजग्मुरदीनदर्शनाः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उदार दृष्टिवाले वे सीता, लक्ष्मण और श्रीराम मोरोंके झुंडोंकी मीठी बोलीसे गूँजते तथा हाथियों और वानरोंसे भरे हुए उस सुन्दर वनमें घूम-फिरकर शीघ्र ही यमुनानदीके समतल तटपर आ गये और रातमें उन्होंने वहीं निवास किया॥
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