अयोध्याकाण्ड, सर्ग 54
ते तु तस्मिन् महावृक्षे उषित्वा रजनीं शुभाम् । विमलेऽभ्युदिते सूर्ये तस्माद् देशात् प्रतस्थिरे ॥ १ ॥
भावार्थ
उस महान् वृक्षके नीचे वह सुन्दर रात बिताकर वे सब लोग निर्मल सूर्योदयकालमें उस स्थानसे आगेको प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
यत्र भागीरथीं गङ्गां यमुनाभिप्रवर्तते । जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य सुमहद् वनम् ॥ २ ॥
भावार्थ
जहाँ भागीरथी गङ्गासे यमुना मिलती हैं, उस स्थानपर जानेके लिये वे महान् वनके भीतरसे होकर यात्रा करने लगे ॥ २ ॥
ते भूमिभागान् विविधान् देशांश्चापि मनोहरान् । अदृष्टपूर्वान् पश्यन्तस्तत्र तत्र यशस्विनः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वे तीनों यशस्वी यात्री मार्गमें जहाँ-तहाँ जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, ऐसे अनेक प्रकारके भू-भाग तथा मनोहर प्रदेश देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ३ ॥
यथा क्षेमेण सम्पश्यन् पुष्पितान् विविधान् द्रुमान् । निर्वृत्तमात्रे दिवसे रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
सुखपूर्वक आरामसे उठते-बैठते यात्रा करते हुए उन तीनोंने फूलोंसे सुशोभित भाँति-भाँतिके वृक्षोंका दर्शन किया । इस प्रकार जब दिन प्रायः समाप्त हो चला, तब श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ ४ ॥
प्रयागमभितः पश्य सौमित्रे धूममुत्तमम् । अग्नेर्भगवतः केतुं मन्ये संनिहितो मुनिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! वह देखो, प्रयागके पास भगवान् अग्निदेवकी ध्वजारूप उत्तम धूम उठ रहा है । मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं ॥ ५ ॥
नूनं प्राप्ताः स्म सम्भेदं गङ्गायमुनयोर्वयम् । तथाहि श्रूयते शब्दो वारिणोर्वारिघर्षजः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही हमलोग गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके पास आ पहुँचे हैं; क्योंकि दो नदियोंके जलोंके परस्पर टकरानेसे जो शब्द प्रकट होता है, वह सुनायी दे रहा है ॥ ६ ॥
दारूणि परिभिन्नानि वनजैरुपजीविभिः । छिन्नाश्चाप्याश्रमे चैते दृश्यन्ते विविधा द्रुमाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘वनमें उत्पन्न हुए फल-मूल और काष्ठ आदिसे जीविका चलानेवाले लोगोंने जो लकड़ियाँ काटी हैं, वे दिखायी देती हैं तथा जिनकी लकड़ियाँ काटी गयी हैं, वे नाना प्रकारके वृक्ष भी आश्रमके समीप दृष्टिगोचर हो रहे हैं’ ॥ ७ ॥
धन्विनौ तौ सुखं गत्वा लम्बमाने दिवाकरे । गङ्गायमुनयोः संधौ प्रापतुर्निलयं मुनेः ॥ ८ ॥ रामस्त्वाश्रममासाद्य त्रासयन् मृगपक्षिणः । गत्वा मुहूर्तमध्वानं भरद्वाजमुपागमत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों धनुर्धर वीर श्रीराम और लक्ष्मण सूर्यास्त होते-होते गङ्गा-यमुनाके सङ्गमके समीप मुनिवर भरद्वाजके आश्रमपर जा पहुँचे ॥ श्रीरामचन्द्रजी आश्रमकी सीमामें पहुँचकर अपने धनुर्धर वेशके द्वारा वहाँके पशु-पक्षियोंको डराते हुए दो ही घड़ीमें तै करने योग्य मार्गसे चलकर भरद्वाज मुनिके समीप जा पहुँचे ॥ ९ ॥
ततस्त्वाश्रममासाद्य मुनेर्दर्शनकाङ्क्षिणौ । सीतयानुगतौ वीरौ दूरादेवावतस्थतुः ॥ १० ॥
भावार्थ
आश्रममें पहुँचकर महर्षिके दर्शनकी इच्छावाले सीतासहित वे दोनों वीर कुछ दूरपर ही खड़े हो गये ॥ १० ॥
स प्रविश्य महात्मानमृषिं शिष्यगणैर्वृतम् । संशितव्रतमेकाग्रं तपसा लब्धचक्षुषम् ॥ ११ ॥ हुताग्निहोत्रं दृष्ट्वैव महाभागः कृताञ्जलिः । रामः सौमित्रिणा सार्धं सीतया चाभ्यवादयत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
( दूर खड़े हो महर्षिके शिष्यसे अपने आगमनकी सूचना दिलवाकर भीतर आनेकी अनुमति प्राप्त कर लेनेके बाद ) पर्णशालामें प्रवेश करके उन्होंने तपस्याके प्रभावसे तीनों कालोंकी सारी बातें देखनेकी दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेनेवाले एकाग्रचित्त तथा तीक्ष्ण व्रतधारी महात्मा भरद्वाज ऋषिका दर्शन किया, जो अग्निहोत्र करके शिष्योंसे घिरे हुए आसनपर विराजमान थे । महर्षिको देखते ही लक्ष्मण और सीतासहित महाभाग श्रीरामने हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ११-१२ ॥
न्यवेदयत चात्मानं तस्मै लक्ष्मणपूर्वजः । पुत्रौ दशरथस्यावां भगवन् रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥ भार्या ममेयं कल्याणी वैदेही जनकात्मजा । मां चानुयाता विजनं तपोवनमनिन्दिता ॥ १४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरघुनाथजीने उनसे इस प्रकार अपना परिचय दिया—‘भगवन् ! हम दोनों राजा दशरथके पुत्र हैं । मेरा नाम राम और इनका लक्ष्मण है तथा ये विदेहराज जनककी पुत्री और मेरी कल्याणमयी पत्नी सती साध्वी सीता हैं, जो निर्जन तपोवनमें भी मेरा साथ देनेके लिये आयी हैं ॥ १३-१४ ॥
पित्रा प्रव्राज्यमानं मां सौमित्रिरनुजः प्रियः । अयमन्वगमद् भ्राता वनमेव धृतव्रतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘पिताकी आज्ञासे मुझे वनकी ओर आते देख ये मेरे प्रिय अनुज भाई सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी वनमें ही रहनेका व्रत लेकर मेरे पीछे-पीछे चले आये हैं ॥ १५ ॥
पित्रा नियुक्ता भगवन् प्रवेक्ष्यामस्तपोवनम् । धर्ममेवाचरिष्यामस्तत्र मूलफलाशनाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! इस प्रकार पिताकी आज्ञासे हम तीनों तपोवनमें जायँगे और वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए धर्मका ही आचरण करेंगे’ ॥ १६ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः । उपानयत धर्मात्मा गामर्घ्यमुदकं ततः ॥ १७ ॥
भावार्थ
परम बुद्धिमान् राजकुमार श्रीरामका वह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज मुनिने उनके लिये आतिथ्यसत्कारके रूपमें एक गौ तथा अर्घ्य-जल समर्पित किये ॥ १७ ॥
नानाविधानन्नरसान् वन्यमूलफलाश्रयान् । तेभ्यो ददौ तप्ततपा वासं चैवाभ्यकल्पयत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
उन तपस्वी महात्माने उन सबको नाना प्रकारके अन्न, रस और जंगली फल-मूल प्रदान किये । साथ ही उनके ठहरनेके लिये स्थानकी भी व्यवस्था की ॥ १८ ॥
मृगपक्षिभिरासीनो मुनिभिश्च समन्ततः । राममागतमभ्यर्च्य स्वागतेनागतं मुनिः ॥ १९ ॥ प्रतिगृह्य तु तामर्चामुपविष्टं स राघवम् । भरद्वाजोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा ॥ २० ॥
भावार्थ
महर्षिके चारों ओर मृग, पक्षी और ऋषि-मुनि बैठे थे और उनके बीचमें वे विराजमान थे । उन्होंने अपने आश्रमपर अतिथिरूपमें पधारे हुए श्रीरामका स्वागतपूर्वक सत्कार किया । उनके उस सत्कारको ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजी जब आसनपर विराजमान हुए, तब भरद्वाजजीने उनसे यह धर्मयुक्त वचन कहा—॥ १९-२० ॥
चिरस्य खलु काकुत्स्थ पश्याम्यहमुपागतम् । श्रुतं तव मया चैव विवासनमकारणम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! मैं इस आश्रमपर दीर्घकालसे तुम्हारे शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ ( आज मेरा मनोरथ सफल हुआ है ) । मैंने यह भी सुना है कि तुम्हें अकारण ही वनवास दे दिया गया है ॥ २१ ॥
अवकाशो विविक्तोऽयं महानद्योः समागमे । पुण्यश्च रमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘गङ्गा और यमुना—इन दोनों महानदियोंके संगमके पासका यह स्थान बड़ा ही पवित्र और एकान्त है । यहाँकी प्राकृतिक छटा भी मनोरम है, अतः तुम यहीं सुखपूर्वक निवास करो’ ॥ २२ ॥
एवमुक्तस्तु वचनं भरद्वाजेन राघवः । प्रत्युवाच शुभं वाक्यं रामः सर्वहिते रतः ॥ २३ ॥
भावार्थ
भरद्वाज मुनि के ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले रघुकुलनन्दन श्रीरामने इन शुभ वचनोंके द्वारा उन्हें उत्तर दिया—॥ २३ ॥
भगवन्नित आसन्नः पौरजानपदो जनः। सुदर्शमिह मां प्रेक्ष्य मन्येऽहमिममाश्रमम् ॥ २४ ॥ आगमिष्यति वैदेहीं मां चापि प्रेक्षको जनः। अनेन कारणेनाहमिह वासं न रोचये ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! मेरे नगर और जनपदके लोग यहाँसे बहुत निकट पड़ते हैं, अतः मैं समझता हूँ कि यहाँ मुझसे मिलना सुगम समझकर लोग इस आश्रमपर मुझे और सीताको देखनेके लिये प्रायः आते-जाते रहेंगे; इस कारण यहाँ निवास करना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता ॥ २४-२५ ॥
एकान्ते पश्य भगवन्नाश्रमस्थानमुत्तमम्। रमते यत्र वैदेही सुखार्हा जनकात्मजा ॥ २६ ॥ एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरद्वाजो महामुनिः। राघवस्य तु तद् वाक्यमर्थग्राहकमब्रवीत् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! किसी एकान्त प्रदेशमें आश्रमके योग्य उत्तम स्थान देखिये ( सोचकर बताइये ), जहाँ सुख भोगनेके योग्य विदेहराजकुमारी जानकी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें’ ॥ श्रीरामचन्द्रजीका यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाजजीने उनके उक्त उद्देश्यकी सिद्धिका बोध करानेवाली बात कही—॥ २७ ॥
दशक्रोश इतस्तात गिरिर्यस्मिन् निवत्स्यसि। महर्षिसेवितः पुण्यः पर्वतः शुभदर्शनः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘तात ! यहाँसे दस कोस ( अन्य व्याख्याके अनुसार ३० कोस ) * की दूरीपर एक सुन्दर और महर्षियोंद्वारा सेवित परम पवित्र पर्वत है, जिसपर तुम्हें निवास करना होगा ॥ २८ ॥
गोलाङ्गूलानुचरितो वानरर्क्षनिषेवितः। चित्रकूट इति ख्यातो गन्धमादनसंनिभः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘उसपर बहुत-से लंगूर विचरते रहते हैं। वहाँ वानर और रीछ भी निवास करते हैं। वह पर्वत चित्रकूट नामसे विख्यात है और गन्धमादनके समान मनोहर है॥ २९ ॥
यावता चित्रकूटस्य नरः शृङ्गाण्यवेक्षते। कल्याणानि समाधत्ते न पापे कुरुते मनः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘जब मनुष्य चित्रकूटके शिखरोंका दर्शन कर लेता है, तब कल्याणकारी पुण्य कर्मोंका फल पा लेता है और कभी पापमें मन नहीं लगाता है ॥ ३० ॥
ऋषयस्तत्र बहवो विहृत्य शरदां शतम्। तपसा दिवमारूढाः कपालशिरसा सह ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘वहाँ बहुत-से ऋषि, जिनके सिरके बाल वृद्धावस्थाके कारण खोपड़ीकी भाँति सफेद हो गये थे, तपस्याद्वारा सैकड़ों वर्षोंतक क्रीड़ा करके स्वर्गलोकको चले गये हैं ॥ ३१ ॥
प्रविविक्तमहं मन्ये तं वासं भवतः सुखम्। इह वा वनवासाय वस राम मया सह ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘उसी पर्वतको मैं तुम्हारे लिये एकान्तवासके योग्य और सुखद मानता हूँ अथवा श्रीराम ! तुम वनवासके उद्देश्यसे मेरे साथ इस आश्रमपर ही रहो’ ॥ ३२ ॥
स रामं सर्वकामैस्तं भरद्वाजः प्रियातिथिम्। सभार्यं सह च भ्रात्रा प्रतिजग्राह हर्षयन् ॥ ३३ ॥ तस्य प्रयागे रामस्य तं महर्षिमुपेयुषः। प्रपन्ना रजनी पुण्या चित्राः कथयतः कथाः ॥ ३४ ॥ सीतातृतीयः काकुत्स्थः परिश्रान्तः सुखोचितः। भरद्वाजाश्रमे रम्ये तां रात्रिमवसत् सुखम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर भरद्वाजजीने पत्नी और भ्रातासहित प्रिय अतिथि श्रीरामका हर्ष बढ़ाते हुए सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंद्वारा उन सबका आतिथ्यसत्कार किया ॥ प्रयागमें श्रीरामचन्द्रजी महर्षिके पास बैठकर विचित्र बातें करते रहे, इतनेमें ही पुण्यमयी रात्रिका आगमन हुआ ॥ वे सुख भोगने योग्य होनेपर भी परिश्रमसे बहुत थक गये थे, इसलिये भरद्वाज मुनिके उस मनोहर आश्रममें श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ सुखपूर्वक वह रात्रि व्यतीत की ॥ ३५ ॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां भरद्वाजमुपागमत्। उवाच नरशार्दूलो मुनिं ज्वलिततेजसम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब पुरुषसिंह श्रीराम प्रज्वलित तेजवाले भरद्वाज मुनिके पास गये और बोले—॥ ३६ ॥
शर्वरीं भगवन्नद्य सत्यशील तवाश्रमे। उषिताः स्मोऽह वसतिमनुजानातु नो भवान् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! आप स्वभावतः सत्य बोलनेवाले हैं। आज हमलोगोंने आपके आश्रममें बड़े आरामसे रात बितायी है, अब आप हमें आगेके गन्तव्य-स्थानपर जानेके लिये आज्ञा प्रदान करें’ ॥ ३७ ॥
रान्यां तु तस्यां व्युष्टायां भरद्वाजोऽब्रवीदिदम् । मधुमूलफलोपेतं चित्रकूटं व्रजेति ह ॥ ३८ ॥ वासमौपयिकं मन्ये तव राम महाबल ।
भावार्थ
रात बीतने और सबेरा होनेपर श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजजीने कहा—‘महाबली श्रीराम ! तुम मधुर फल-मूलसे सम्पन्न चित्रकूट पर्वतपर जाओ । मैं उसीको तुम्हारे लिये उपयुक्त निवासस्थान मानता हूँ ॥ ३८½ ॥
नानानगगणोपेतः किन्नरोरगसेवितः ॥ ३९ ॥ मयूरनादाभिरतो गजराजनिषेवितः । गम्यतां भवता शैलश्चित्रकूटः स विश्रुतः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘वह सुविख्यात चित्रकूट पर्वत नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरा-भरा है । वहाँ बहुत-से किन्नर और सर्प निवास करते हैं । मोरोंके कलरवोंसे वह और भी रमणीय प्रतीत होता है । बहुत-से गजराज उस पर्वतका सेवन करते हैं । तुम वहीं चले जाओ ॥ ३९-४० ॥
पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुतः । तत्र कुञ्जरयूथानि मृगयूथानि चैव हि ॥ ४१ ॥ विचरन्ति वनान्तेषु तानि द्रक्ष्यसि राघव । सरित्प्रस्रवणप्रस्थान् दरीकन्दरनिर्झरान् । चरतः सीतया सार्धं नन्दिष्यति मनस्तव ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘वह पर्वत परम पवित्र, रमणीय तथा बहुसंख्यक फल-मूलोंसे सम्पन्न है । वहाँ झुंड-के-झुंड हाथी और हिरन वनके भीतर विचरते रहते हैं । रघुनन्दन ! तुम उन सबको प्रत्यक्ष देखोगे । मन्दाकिनी नदी, अनेकानेक जलस्रोत, पर्वतशिखर, गुफा, कन्दरा और झरने भी तुम्हारे देखनेमें आयेंगे । वह पर्वत सीताके साथ विचरते हुए तुम्हारे मनको आनन्द प्रदान करेगा ॥ ४१-४२ ॥
प्रहृष्टकोयष्टिभकोकिलस्वनै- र्विनोदयन्तं च सुखं परं शिवम् । मृगैश्च मत्तैर्बहुभिश्च कुञ्जरैः सुरम्यमासाद्य समावसाथयम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘हर्षमें भरे हुए टिट्टिभ और कोकिलोंके कलरवोंद्वारा वह पर्वत यात्रियोंका मनोरञ्जन-सा करता है । वह परम सुखद एवं कल्याणकारी है, मदमत्त मृगों और बहुसंख्यक मतवाले हाथियोंने उसकी रमणीयताको और बढ़ा दिया है । तुम उसी पर्वतपर जाकर डेरा डालो और उसमें निवास करो’ ॥ ४३ ॥
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