अयोध्याकाण्ड, सर्ग 20
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ । आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा ॥ १ ॥
भावार्थ
उधर पुरुषसिंह श्रीराम हाथ जोड़े हुए ज्यों ही कैकेयीके महलसे बाहर निकलने लगे, त्यों ही अन्तःपुरमें रहनेवाली राजमहिलाओंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ ॥ १ ॥
कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च । गतिश्च शरणं चासीत् स रामोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ २ ॥
भावार्थ
वे कह रही थीं—‘हाय ! जो पिताके आज्ञा न देनेपर भी समस्त अन्तःपुरके आवश्यक कार्योंमें स्वतः संलग्न रहते थे, जो हमलोगोंके सहारे और रक्षक थे, वे श्रीराम आज वनको चले जायँगे ॥ २ ॥
कौसल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा । तथैव वर्तते ऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वे रघुनाथजी जन्मसे ही अपनी माता कौसल्याके प्रति सदा जैसा वर्ताव करते थे, वैसा ही हमारे साथ भी करते थे ॥ ३ ॥
न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् । क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जो कठोर बात कह देनेपर भी कुपित नहीं होते थे, दूसरोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करनेवाली बातें नहीं बोलते थे तथा जो सभी रूठे हुए व्यक्तियोंको मना लिया करते थे, वे ही श्रीराम आज यहाँसे बनको चले जायँगे ॥ ४ ॥
अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम् । यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘बड़े खेदकी बात है कि हमारे महाराजकी बुद्धि मारी गयी । ये इस समय सम्पूर्ण जीव-जगत्का विनाश करनेपर तुले हुए हैं, तभी तो ये समस्त प्राणियोंके जीवनाधार श्रीरामका परित्याग कर रहे हैं’ ॥ ५ ॥
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः । पतिमाचुक्रुशुश्चापि सखलनं चापि चुक्रुशुः ॥ ६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार समस्त रानियाँ अपने पतिको कोसने लगीं और बछड़ोंसे बिछुड़ी हुई गौओंकी तरह उच्च स्वरसे क्रन्दन करने लगीं ॥ ६ ॥
स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः । पुत्रशोकाभिसंतप्तः श्रुत्वा व्यालीयतासने ॥ ७ ॥
भावार्थ
अन्तःपुरका वह भयङ्कर आर्तनाद सुनकर महाराज दशरथने पुत्रशोकसे संतप्त हो लज्जाके मारे बिछौनेमें ही अपनेको छिपा लिया ॥ ७ ॥
रामस्तु भृशमायस्तो निःश्वसन्निव कुञ्जरः । जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं वशी ॥ ८ ॥
भावार्थ
इधर जितेन्द्रिय श्रीरामचन्द्रजी स्वजनोंके दुःखसे अधिक खिन्न होकर हाथीके समान लंबी साँस खींचते हुए भाई लक्ष्मणके साथ माताके अन्तःपुरमें गये ॥ ८ ॥
सोऽपश्यत् पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम् । उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान् बहून् ॥ ९ ॥
भावार्थ
वहाँ उन्होंने उस घरके दरवाजेपर एक परम पूजित वृद्ध पुरुषको बैठा हुआ देखा और दूसरे भी बहुत-से मनुष्य वहाँ खड़े दिखायी दिये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे समुपस्थिताः । जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम् ॥ १० ॥
भावार्थ
वे सब-के-सब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन श्रीरामको देखते ही जय-जयकार करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए और उन्हें बधाई देने लगे ॥ १० ॥
प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः । ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् वृद्धान् राज्ञाभिसत्कृतान् ॥
भावार्थ
पहली ड्योढ़ी पार करके जब वे दूसरीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें राजाके द्वारा सम्मानित बहुत-से वेदज्ञ ब्राह्मण दिखायी दिये ॥ ११ ॥
प्रणम्य रामस्तान् वृद्धांस्तृतीयायां ददर्श सः । स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च द्वाररक्षणतत्पराः ॥ १२ ॥
भावार्थ
उन वृद्ध ब्राह्मणोंको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी जब तीसरी ड्योढ़ीमें पहुँचे, तब वहाँ उन्हें द्वाररक्षाके कार्यमें लगी हुई बहुत-सी नववयस्का एवं वृद्ध अवस्थावाली स्त्रियाँ दिखायी दीं ॥ १२ ॥
वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः । न्यवेदयन्त त्वरितं राममातुः प्रियं तदा ॥ १३ ॥
भावार्थ
उन्हें देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा हर्ष हुआ । श्रीरामको बधाई देकर उन स्त्रियोंने तत्काल महलके भीतर प्रवेश किया और तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीकी माताको उनके आगमनका प्रिय समाचार सुनाया ॥ १३ ॥
कौसल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता । प्रभाते चाकरोत् पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिणी ॥ १४ ॥
भावार्थ
उस समय देवी कौसल्या पुत्रकी मङ्गलकामनासे रातभर जागकर सवेरे एकाग्रचित्त हो भगवान् विष्णुकी पूजा कर रही थीं ॥१४ ॥
सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा । अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत् कृतमङ्गला ॥ १५ ॥
भावार्थ
वे रेशमी वस्त्र पहनकर बड़ी प्रसन्नताके साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गलकृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक उस समय अग्निमें आहुति दे रही थीं ॥ १५ ॥
प्रविश्य तु तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् । ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
उसी समय श्रीरामने माताके शुभ अन्तःपुरमें प्रवेश करके वहाँ माताको देखा । वे अग्निमें हवन करा रही थीं ॥ १६ ॥
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम् । दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा ॥ १७ ॥ लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा । समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः ॥ १८ ॥
भावार्थ
रघुनन्दनने देखा तो वहाँ देव-कार्यके लिये बहुत-सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई है । दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धानका लावा, सफेद माला, खीर, खिचड़ी, समिधा और भरे हुए कलश—ये सब वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ १७-१८ ॥
तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम् । तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां वरवर्णिनीम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
उत्तम कान्तिवाली माता कौसल्या सफेद रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए थीं । वे व्रतके अनुष्ठानसे दुर्बल हो गयी थीं और इष्टदेवताका तर्पण कर रही थीं । इस अवस्थामें श्रीरामने उन्हें देखा ॥ १९ ॥
सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम् । अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं वडवा यथा ॥ २० ॥
भावार्थ
माताका आनन्द बढ़ानेवाले प्रिय पुत्रको बहुत देरके बाद सामने उपस्थित देख कौसल्यादेवी बड़े हर्षमें भरकर उसकी ओर चलीं, मानो कोई घोड़ी अपने बछेड़ेको देखकर बड़े हर्षसे उसके पास आयी हो ॥ २० ॥
स मातरमुपक्रान्तामुपसंगृह्य राघवः । परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामवघ्रातश्च मूर्धनि ॥ २१ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीने निकट आयी हुई माताके चरणोंमें प्रणाम किया और माता कौसल्याने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया तथा बड़े प्यारसे उनका मस्तक सूँघा ॥ २१ ॥
तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः । कौसल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस समय कौसल्यादेवीने अपने दुर्जय पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे पुत्रस्नेहवश यह प्रिय एवं हितकर बात कही—॥ २२ ॥
वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम् । प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चाप्युचितं कुले ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! तुम धर्मशील, वृद्ध एवं महात्मा राजर्षियोंके समान आयु, कीर्ति और कुलोचित धर्म प्राप्त करो ॥ २३ ॥
सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव । अद्यैव त्वां स धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! अब तुम जाकर अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजाका दर्शन करो । वे धर्मात्मा नरेश आज ही तुम्हारा युवराजके पदपर अभिषेक करेंगे’ ॥ २४ ॥
दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः । मातरं राघवः किंचित् प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
यह कहकर माताने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया और भोजन करनेको कहा । भोजनके लिये निमन्त्रित होकर श्रीरामने उस आसनका स्पर्शमात्र कर लिया । फिर वे अञ्जलि फैलाकर मातासे कुछ कहनेको उद्यत हुए ॥ २५ ॥
स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तथानतः । प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २६ ॥
भावार्थ
वे स्वभावसे ही विनयशील थे तथा माताके गौरवसे भी उनके सामने नत-मस्तक हो गये थे । उन्हें दण्डकारण्यको प्रस्थान करना था; अतः वे उसके लिये आज्ञा लेनेका उपक्रम करने लगे ॥ २६ ॥
देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम् । इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च ॥ २७ ॥
भावार्थ
उन्होंने कहा—‘देवि ! निश्चय ही तुम्हें मालूम नहीं है, तुम्हारे ऊपर महान् भय उपस्थित हो गया है । इस समय मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुमको, सीताको और लक्ष्मणको भी दुःख होगा; तथापि कहूँगा ॥ २७ ॥
गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे । विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘अब तो मैं दण्डकारण्यमें जाऊँगा, अतः ऐसे बहुमूल्य आसनकी मुझे क्या आवश्यकता है ! अब मेरे लिये यह कुशकी चटाईपर बैठनेका समय आया है ॥ २८ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने । कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘मैं राजभोग्य वस्तुका त्याग करके मुनिकी भाँति कन्द, मूल और फलोंसे जीवन-निर्वाह करता हुआ चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करूँगा ॥ २९ ॥
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति । मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘महाराज युवराजका पद भरतको दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्यमें भेज रहे हैं ॥ ३० ॥
सपट् चाष्टौ चवर्षाणि वत्स्यामि विजने वने । आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘अतः चौदह वर्षोंतक निर्जन वनमें रहूँगा और जंगलमें सुलभ होनेवाले वल्कल आदिको धारण करके फल-मूलके आहारसे ही जीवन-निर्वाह करता रहूँगा’ ॥ ३१ ॥
सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने । पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता ॥ ३२ ॥
भावार्थ
यह अप्रिय बात सुनकर वनमें फरसेसे काटी हुई शालवृक्षकी शाखाके समान कौसल्या देवी सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं, मानो स्वर्गसे कोई देवाङ्गना भूतलपर आ गिरी हो ॥ ३२ ॥
तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव । रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
जिन्होंने जीवनमें कभी दुःख नहीं देखा था—जो दुःख भोगनेके योग्य थीं ही नहीं, उन्हीं माता कौसल्याको कटी हुई कदलीकी भाँति अचेत अवस्थामें भूमिपर पड़ी देख श्रीरामने हाथका सहारा देकर उठाया ॥ ३३ ॥
उपावृत्योत्थितां दीनां वडवामिव वाहिताम् । पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना ॥ ३४ ॥
भावार्थ
जैसे कोई घोड़ी पहले बड़ा भारी बोझ ढो चुकी हो और थकावट दूर करनेके लिये धरतीपर लोट-पोटकर उठी हो, उसी तरह उठी हुई कौसल्याजीके समस्त अङ्गोंमें धूल लिपट गयी थी और वे अत्यन्त दीन दशाको पहुँच गयी थीं । उस अवस्थामें श्रीरामने अपने हाथसे उनके अङ्गोंकी धूल पोंछी ॥ ३४ ॥
सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता । उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे ॥ ३५ ॥
भावार्थ
कौसल्याजीने जीवनमें पहले सदा सुख ही देखा था और उसीके योग्य थीं, परंतु उस समय वे दुःखसे कातर हो उठी थीं । उन्होंने लक्ष्मणके सुनते हुए अपने पास बैठे पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ ३५ ॥
यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव । न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘बेटा रघुनन्दन ! यदि तुम्हारा जन्म न हुआ होता तो मुझे इस एक ही बातका शोक रहता । आज जो मुझपर इतना भारी दुःख आ पड़ा है, इसे वन्ध्या होनेपर मुझे नहीं देखना पड़ता ॥ ३६ ॥
एक एव हि वन्ध्यायाः शोको भवति मानसः । अप्रजास्मीति संतापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! वन्ध्याको एक मानसिक शोक होता है । उसके मनमें यह संताप बना रहता है कि मुझे कोई संतान नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई दुःख उसे नहीं होता ॥ ३७ ॥
न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे । अपि पुत्रे विपश्येयमिति रामास्थितं मया ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘बेटा राम ! पतिके प्रभुत्वकालमें एक ज्येष्ठ पत्नीको जो कल्याण या सुख प्राप्त होना चाहिये, वह मुझे पहले कभी नहीं देखनेको मिला । सोचती थी, पुत्रके राज्यमें मैं सब सुख देख लूँगी और इसी आशासे मैं अबतक जीती रही ॥ ३८ ॥
सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम् । अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां परा सती ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘बड़ी रानी होकर भी मुझे अपनी बातोंसे हृदयको विदीर्ण कर देनेवाली छोटी सौतोंके बहुत-से अप्रिय वचन सुनने पड़ेंगे ॥ ३९ ॥
अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति । मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘स्त्रियोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा; अतः मेरा शोक और विलाप जैसा है, उसका कभी अन्त नहीं है ॥ ४० ॥
त्वयि संनिहितेऽप्येवमहमासं निराकृता । किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव हि ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘तात ! तुम्हारे निकट रहनेपर भी मैं इस प्रकार सौतोंसे तिरस्कृत रही हूँ, फिर तुम्हारे परदेश चले जानेपर मेरी क्या दशा होगी ? उस दशामें तो मेरा मरण ही निश्चित है ॥ ४१ ॥
अत्यन्तं निगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमसम्मता । परिवारेण कैकेय्याः समा वाप्यथवावरा ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘पतिकी ओरसे मुझे सदा अत्यन्त तिरस्कार अथवा कड़ी फटकार ही मिली है, कभी प्यार और सम्मान नहीं प्राप्त हुआ है । मैं कैकेयीकी दासियोंके बराबर अथवा उनसे भी गयी-बीती समझी जाती हूँ ॥ ४२ ॥
यो हि मां सेवते कश्चिदपि वाप्यनुवर्तते । कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स जनो नाभिभाषते ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘जो कोई मेरी सेवामें रहता या मेरा अनुसरण करता है, वह भी कैकेयीके बेटेको देखकर चुप हो जाता है, मुझसे बात नहीं करता है ॥ ४३ ॥
नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादि तत् । कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! इस दुर्गतिमें पड़कर मैं सदा क्रोधी स्वभावके कारण कटुवचन बोलनेवाले उस कैकेयीके मुखको कैसे देख सकूँगी ॥ ४४ ॥
दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव । अतीतानि प्रकाङ्क्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! तुम्हारे उपनयनरूप द्वितीय जन्म लिये सत्रह वर्ष बीत गये ( अर्थात् तुम अब सत्ताईस वर्षके हो गये ) । अबतक मैं यही आशा लगाये चली आ रही थी कि अब मेरा दुःख दूर हो जायगा ॥ ४५ ॥
तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात् । विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णापि राघव ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘राघव ! अब इस बुढ़ापेमें इस तरह सौतोंका तिरस्कार और उससे होनेवाले महान् अक्षय दुःखको मैं अधिक कालतक नहीं सह सकती ॥ ४६ ॥
अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम् । कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविका ॥ ४७ ॥ उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमैः । दुःखसंवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘पूर्ण चन्द्रमाके समान तुम्हारे मनोहर मुखको देखे बिना मैं दुःखिनी दयनीय जीवनवृत्तिसे रहकर कैसे निर्वाह करूँगी ॥ ‘बेटा ! ( यदि तुझे इस देशसे निकल ही जाना है तो ) मुझ भाग्यहीनाने बारंबार उपवास, देवताओंका ध्यान तथा बहुत-से परिश्रमजनक उपाय करके व्यर्थ ही तुम्हारा इतने कष्टसे पालन-पोषण किया है ॥ ४८ ॥
स्थिरं नु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते । प्रावृषीव महानद्याः स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘मैं समझती हूँ कि निश्चय ही यह मेरा हृदय बड़ा कठोर है, जो तुम्हारे बिछोहकी बात सुनकर भी वर्षाकालके नूतन जलके प्रवाहसे टकराये हुए महानदीके कगारकी भाँति फट नहीं जाता है ॥ ४९ ॥
ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाशोऽस्ति यमक्षये मम । यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही मेरे लिये कहीं मौत नहीं है, यमराजके घरमें भी मेरे लिये जगह नहीं है, तभी तो जैसे किसी रोती हुई मृगीको सिंह जबरदस्ती उठा ले जाता है, उसी प्रकार यमराज मुझे आज ही उठा ले जाना नहीं चाहता है ॥ ५० ॥
स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद् भुवि नो विदीर्यते । अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘अवश्य ही मेरा कठोर हृदय लोहेका बना हुआ है, जो पृथिवीपर पड़नेपर भी न तो फटता है और न टूक-टूक हो जाता है । इसी दुःखसे व्याप्त हुए इस शरीरके भी टुकड़े-टुकड़े नहीं हो जाते हैं । निश्चय ही, मृत्युकाल आये बिना किसीका मरण नहीं होता है ॥ ५१ ॥
इदं तु दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि । तपश्च तप्तं यदपत्यकाम्यया सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘सबसे अधिक दुःखकी बात तो यह है कि पुत्रके सुखके लिये मेरे द्वारा किये गये व्रत, दान और संयम सब व्यर्थ हो गये । मैंने संतानकी हित-कामनासे जो तप किया है, वह भी ऊसरमें बोये हुए बीजकी भाँति निष्फल हो गया ॥ ५२ ॥
यदि ह्यकाले मरणं यदृच्छया लभेत कश्चिद् गुरुदुःखकर्शितः । गताहमद्यैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘यदि कोई मनुष्य भारी दुःखसे पीड़ित हो असमयमें भी अपनी इच्छाके अनुसार मृत्यु पा सके तो मैं तुम्हारे बिना अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गायकी भाँति आज ही यमराजकी सभामें चली जाऊँ ॥ ५३ ॥
अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ । अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौः सुदुर्बला वत्समिवाभिकाङ्क्षया ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘चन्द्रमाके समान मनोहर मुख-कान्तिवाले श्रीराम ! यदि मेरी मृत्यु नहीं होती है तो तुम्हारे बिना यहाँ व्यर्थ कुत्सित जीवन क्यों बिताऊँ ? बेटा ! जैसे गौ दुर्बल होनेपर भी अपने बछड़ेके लोभसे उसके पीछे-पीछे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ ही वनको चली चलूँगी’ ॥ ५४ ॥
भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम् । व्यसनमुपनिशाम्य सा महत् सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किंनरी ॥ ५५ ॥
भावार्थ
आनेवाले भारी दुःखको सहनेमें असमर्थ हो महान् संकटका विचार करके सत्यके ध्यानमें बँधे हुए अपने पुत्र श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर माता कौसल्या उस समय बहुत विलाप करने लगीं, मानो कोई किन्नरी अपने पुत्रको बन्धनमें पड़ा हुआ देखकर बिलख रही हो ॥ ५५ ॥
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