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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 19

तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम् । श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

वह अप्रिय तथा मृत्युके समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्रीराम व्यथित नहीं हुए । उन्होंने कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः । जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘मा ! बहुत अच्छा ! ऐसा ही हो । मैं महाराजकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जटा और चीर धारण करके वनमें रहनेके निमित्त अवश्य यहाँसे चला जाऊँगा ॥ २ ॥

इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपतिः । नाभिनन्दति दुर्धर्षो यथापूर्वमरिंदमः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आज दुर्जय तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज मुझसे पहलेकी तरह प्रसन्नतापूर्वक बोलते क्यों नहीं हैं ? ॥ ३ ॥

मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रतः । यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधरः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘देवि ! मैं तुम्हारे सामने ऐसी बात पूछ रहा हूँ, इसलिये तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिये । निश्चय चीर और जटा धारण करके मैं वनको चला जाऊँगा, तुम प्रसन्न रहो ॥ ४ ॥

हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च । नियुज्यमानो विस्रब्धः किं न कुर्यामहं प्रियम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘राजा मेरे हितैषी, गुरु, पिता और कृतज्ञ हैं । इनकी आज्ञा होनेपर मैं इनका कौन-सा ऐसा प्रिय कार्य है, जिसे निःशङ्क होकर न कर सकूँ ? ॥ ५ ॥

अलीकं मानसं त्वेकं हृदयं दहते मम । स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचनम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘किंतु मेरे मनको एक ही हार्दिक दुःख अधिक जला रहा है कि स्वयं महाराजने मुझसे भरतके अभिषेककी बात नहीं कही ॥ ६ ॥

अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च । हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘मैं केवल तुम्हारे कहनेसे भी अपने भाई भरतके लिये इस राज्यको, सीताको, प्यारे प्राणोंको तथा सारी सम्पत्तिको भी प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही दे सकता हूँ ॥ ७ ॥

किं पुनर्मनुजेन्द्रेण स्वयं पित्रा प्रचोदितः । तव च प्रियकामार्थं प्रतिज्ञामनुपालयन् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘फिर यदि स्वयं महाराज—मेरे पिताजी आज्ञा दें और वह भी तुम्हारा प्रिय कार्य करनेके लिये, तो मैं प्रतिज्ञाका पालन करते हुए उस कार्यको क्यों नहीं करूँगा ? ॥ ८ ॥

तथाश्वासय हीमन्तं किंत्विदं यन्महीपतिः । वसुधासक्तनयनो मन्दमश्रूणि मुञ्चति ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तुम मेरी ओरसे विश्वास दिलाकर इन लज्जाशील महाराजको आश्वासन दो । ये पृथ्वीनाथ पृथ्वीकी ओर दृष्टि किये धीरे-धीरे आँसू क्यों बहा रहे हैं ! ॥ ९ ॥

गच्छन्तु चैवानयितुं दूताः शीघ्रजवैर्हयैः । भरतं मातुलकुलादद्यैव नृपशासनात् ॥ १० ॥ दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वरः । अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘आज ही महाराजकी आज्ञासे दूत शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर भरतको मामाके यहाँसे बुलानेके लिये चले जायँ ॥ ‘मैं अभी पिताकी बातपर कोई विचार न करके चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेके लिये तुरंत दण्डकारण्यको चला ही जाता हूँ ॥ ११ ॥

सा हृष्टा तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा रामस्य कैकयी। प्रस्थानं श्रद्दधाना सा त्वरयामास राघवम् ॥१२॥

भावार्थ

श्रीरामकी वह बात सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई। उसे विश्वास हो गया कि ये वनको चले जायँगे । अतः श्रीरामको जल्दी जानेकी प्रेरणा देती हुई वह बोली—॥ १२ ॥

एवं भवतु यास्यन्ति दूताः शीघ्रजवैर्हयैः। भरतं मातुलकुलादिहावर्तयितुं नराः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘तुम ठीक कहते हो, ऐसा ही होना चाहिये । भरतको मामाके यहाँसे बुला लानेके लिये दूतलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर अवश्य जायँगे ॥ १३ ॥

तव त्वहं क्षमं मन्ये नोत्सुकस्य विलम्बनम् । राम तस्मादितः शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘परंतु राम ! तुम वनमें जानेके लिये स्वयं ही उत्सुक जान पड़ते हो; अतः तुम्हारा विलम्ब करना मैं ठीक नहीं समझती । जितना शीघ्र सम्भव हो, तुम्हें यहाँसे वनको चल देना चाहिये ॥ १४ ॥

व्रीडान्वितः स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते। नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! राजा लज्जित होनेके कारण जो स्वयं तुमसे नहीं कहते हैं, यह कोई विचारणीय बात नहीं है । अतः इसका दुःख तुम अपने मनसे निकाल दो ॥ १५ ॥

यावत्त्वं न वनं यातः पुरादस्मादतित्वरम् । पिता तावन्न ते राम स्नास्यते भोक्ष्यतेऽपि वा॥ १६ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! तुम जबतक अत्यन्त उतावलीके साथ इस नगरसे वनको नहीं चले जाते, तबतक तुम्हारे पिता स्नान अथवा भोजन नहीं करेंगे’ ॥ १६ ॥

धिक्कष्टमिति निःश्वस्य राजा शोकपरिप्लुतः। मूर्च्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते ॥ १७ ॥

भावार्थ

कैकेयीकी यह बात सुनकर शोकमें डूबे हुए राजा दशरथ लंबी साँस खींचकर बोले—‘धिक्कार है ! हाय ! बड़ा कष्ट हुआ !’ इतना कहकर वे मूर्च्छित हो उस सुवर्णभूषित पलंगपर गिर पड़े ॥ १७ ॥

रामोऽप्युत्थाप्य राजानं कैकेय्याभिप्रचोदितः। कशयेव हतो वाजी वनं गन्तुं कृतत्वरः ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामने राजाको उठाकर बैठा दिया और कैकेयीसे प्रेरित हो कोड़ेकी चोट खाये हुए घोड़ेकी भाँति वे शीघ्रतापूर्वक वनको जानेके लिये उतावले हो उठे ॥ १८ ॥

तदप्रियमनार्याया वचनं दारुणोदयम् । श्रुत्वा गतव्यथो रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

अनार्या कैकेयीके उस अप्रिय एवं दारुण वचनको सुनकर भी श्रीरामके मनमें व्यथा नहीं हुई । वे कैकेयीसे बोले—॥ १९ ॥

नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे । विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘देवि ! मैं धनका उपासक होकर संसारमें नहीं रहना चाहता । तुम विश्वास रखो ! मैंने भी ऋषियोंकी ही भाँति निर्मल धर्मका आश्रय ले रखा है ॥ २० ॥

यत् तत्रभवतः किंचिच्छक्यं कर्तुं प्रियं मया । प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘पूज्य पिताजीका जो भी प्रिय कार्य मैं कर सकता हूँ, उसे प्राण देकर भी करूँगा । तुम उसे सर्वथा मेरे द्वारा हुआ ही समझो ॥ २१ ॥

न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम् । यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘पिताकी सेवा अथवा उनकी आज्ञाका पालन करना, जैसा महत्त्वपूर्ण धर्म है, उससे बढ़कर संसारमें दूसरा कोई धर्माचरण नहीं है ॥ २२ ॥

अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम् । वने वत्स्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘यद्यपि पूज्य पिताजीने स्वयं मुझसे नहीं कहा है, तथापि मैं तुम्हारे ही कहनेसे चौदह वर्षोंतक इस भूतलपर निर्जन वनमें निवास करूँगा ॥ २३ ॥

न न्यूनं मयि कैकेयि किंचिदाशंससे गुणान् । यद् राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘कैकेयि ! तुम्हारा मुझपर पूरा अधिकार है । मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन कर सकता हूँ; फिर भी तुमने स्वयं मुझसे न कहकर इस कार्यके लिये महाराजसे कहा—इनको कष्ट दिया । इससे जान पड़ता है कि तुम मुझमें कोई गुण नहीं देखती हो ॥ २४ ॥

यावन्मातरमापृच्छे सीतां चानुनयाम्यहम् । ततोऽद्यैव गमिष्यामि दण्डकानां महद् वनम् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘अच्छा ! अब मैं माता कौसल्यासे आज्ञा ले लूँ और सीताको भी समझा-बुझा लूँ, इसके बाद आज ही विशाल दण्डकवनकी यात्रा करूँगा ॥ २५ ॥

भरतः पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा । तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्मः सनातनः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘तुम ऐसा प्रयत्न करना, जिससे भरत इस राज्यका पालन और पिताजीकी सेवा करते रहें; क्योंकि यही सनातन धर्म है’ ॥ २६ ॥

रामस्य तु वचः श्रुत्वा भृशं दुःखगतः पिता । शोकादशक्नुवन् वक्तुं प्ररुरोद महास्वनम् ॥ २७ ॥ वन्दित्वा चरणौ राज्ञो विसंज्ञस्य पितुस्तदा । कैकेय्याश्चाप्यनार्याया निष्पपात महाद्युतिः ॥ २८ ॥

भावार्थ

श्रीरामका यह वचन सुनकर पिताको बहुत दुःख हुआ । वे शोकके आवेगसे कुछ बोल न सके, केवल फूट-फूटकर रोने लगे॥ महातेजस्वी श्रीराम उस समय अचेत पड़े हुए पिता महाराज दशरथ तथा अनार्या कैकेयीके भी चरणोंमें प्रणाम करके उस भवनसे निकले ॥ २८ ॥

स रामः पितरं कृत्वा कैकेयीं च प्रदक्षिणम् । निष्क्रम्यान्तःपुरात्तस्मात् स्वं ददर्श सुहृज्जनम्॥२९॥ तं बाष्पपरिपूर्णाक्षः पृष्ठतोऽनुजगाम ह । लक्ष्मणः परमक्रुद्धः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ३० ॥ आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा रामः प्रदक्षिणम् । शनैर्जगाम सापेक्षो दृष्टिं तत्राविचालयन् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

पिता दशरथ और माता कैकेयीकी परिक्रमा करके उस अन्तःपुरसे बाहर निकलकर श्रीराम अपने सुहृदोंसे मिले ॥ सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण उस अन्यायको देखकर अत्यन्त कुपित हो उठे थे, तथापि दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर वे चुपचाप श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले गये ॥ श्रीरामचन्द्रजीके मनमें अब वन जानेकी आकाङ्क्षाका उदय हो गया था, अतः अभिषेकके लिये एकत्र की हुई सामग्रियोंकी प्रदक्षिणा करते हुए वे धीरे-धीरे आगे बढ़ गये । उनकी ओर उन्होंने दृष्टिपात नहीं किया ॥ ३१ ॥

न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति । लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

श्रीराम अविनाशी कान्तिसे युक्त थे, इसलिये उस समय राज्यका न मिलना उन लोककमनीय श्रीरामकी महती शोभामें कोई अन्तर न डाल सका; जैसे चन्द्रमाका क्षीण होना उसकी सहज शोभाका अपकर्ष नहीं कर पाता है ॥ ३२ ॥

न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ३३ ॥

भावार्थ

वे वनमें जानेको उत्सुक थे और सारी पृथ्वीका राज्य छोड़ रहे थे; फिर भी उनके चित्तमें सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्माकी भाँति कोई विकार नहीं देखा गया ॥ ३३ ॥

प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते । विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान् ॥ ३४ ॥ धारयन् मनसा दुःखमिन्द्रियाणि निगृह्य च । प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

श्रीरामने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगानेकी मनाही कर दी । डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये । वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्योंको भी विदा करके ( आत्मीय जनोंके दुःखसे होनेवाले ) दुःखको मनमें ही दबाकर इन्द्रियोंको काबूमें करके यह अप्रिय समाचार सुनानेके लिये माता कौसल्याके महलमें गये । उस समय उन्होंने मनको पूर्णतः वशमें कर रखा था ॥ ३४-३५ ॥

सर्वोऽप्यभिजनः श्रीमाञ्श्रीमतः सत्यवादिनः । नालक्षयत रामस्य कंचिदाकारमानने ॥ ३६ ॥

भावार्थ

जो शोभाशाली मनुष्य सदा सत्यवादी श्रीमान् रामके निकट रहा करते थे, उन्होंने भी उनके मुखपर कोई विकार नहीं देखा ॥ ३६ ॥

उचितं च महाबाहुर्न जहौ हर्षमात्मवान् । शारदः समुदीर्णांशुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

मनको वशमें रखनेवाले महाबाहु श्रीरामने अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता उसी तरह नहीं छोड़ी थी, जैसे शरद्-कालका उद्दीत किरणोंवाला चन्द्रमा अपने सहज तेजका परित्याग नहीं करता है ॥ ३७ ॥

वाचा मधुरया रामः सर्वं सम्मानयञ्जनम् । मातुः समीपं धर्मात्मा प्रविवेश महायशाः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

महायशस्वी धर्मात्मा श्रीराम मधुर वाणीसे सब लोगोंका सम्मान करते हुए अपनी माताके समीप गये ॥ ३८ ॥

तं गुणैः समतां प्राप्तो भ्राता विपुलविक्रमः । सौमित्रिरनुवव्राज धारयन् दुःखमात्मजम् ॥ ३९ ॥ प्रविश्य वेश्मातिभृशं मुदा युतं समीक्ष्य तां चार्थविपत्तिमागताम् । न चैव रामोऽत्र जगाम विक्रियां सुहृज्जनस्यात्मविपत्तिशङ्कया ॥ ४० ॥

भावार्थ

उस समय गुणोंमें श्रीरामकी ही समानता करनेवाले महापराक्रमी भ्राता सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी अपने मानसिक दुःखको मनमें ही धारण किये हुए श्रीरामके पीछे-पीछे गये ॥ अत्यन्त आनन्दसे भरे हुए उस भवनमें प्रवेश करके लौकिक दृष्टिसे अपने अमीष्ट अर्थका विनाश हुआ देखकर भी हितैषी सुहृदोंके प्राणोंपर संकट आ जानेकी आशङ्कासे श्रीरामने यहाँ अपने मुखपर कोई विकार नहीं प्रकट होने दिया ॥ ४० ॥

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