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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 17

स रामो रथमास्थाय सम्प्रहृष्टसुहृज्जनः । पताकाध्वजसम्पन्नं महार्हागुरुधूपितम् ॥ १ ॥ अपश्यन्नगरं श्रीमान् नानाजनसमन्वितम् । स गृहैरभ्रसंकाशैः पाण्डुरैरुपशोभितम् ॥ २ ॥ राजमार्गं ययौ रामो मध्येनागुरुधूपितम् । चन्दनानां च मुख्यानामगुरूणां च संचयैः ॥ ३ ॥ उत्तमानां च गन्धानां क्षौमकौशाम्बरस्य च । अविद्धाभिश्च मुक्ताभिरुत्तमैः स्फाटिकैरपि ॥ ४ ॥ शोभमानमसम्बाधं तं राजपथमुत्तमम् । संवृतं विविधैः पुष्पैर्भक्ष्यैरुच्चावचैरपि ॥ ५ ॥ ददर्श तं राजपथं दिवि देवपतिर्यथा । दध्यक्षतहविर्लाजैर्धूपैरगुरुचन्दनैः ॥ ६ ॥ नानामाल्योपगन्धैश्च सदाभ्यर्चितचत्वरम् । आशीर्वादान् बहूञ्छृण्वन् सुहृद्भिः समुदीरितान् ॥ ७ ॥ यथार्हं चापि सम्पूज्य सर्वानेव नरान् ययौ ।

भावार्थ

इस प्रकार श्रीमान् रामचन्द्रजी अपने सुहृदोंको आनन्द प्रदान करते हुए रथपर बैठे राजमार्गके बीचसे चले जा रहे थे; उन्होंने देखा—सारा नगर ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित हो रहा है, चारों ओर बहुमूल्य अगुरुनामक धूपकी सुगन्ध छा रही है और सब ओर असंख्य मनुष्योंकी भीड़ दिखायी देती है । वह राजमार्ग श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल भव्य भवनोंसे सुशोभित तथा अगुरुकी सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था॥ अच्छी श्रेणीके चन्दनों, अगुरु नामक धूपों, उत्तम गन्ध-द्रव्यों, अलसी या सन आदिके रेशोंसे बने हुए कपड़ों तथा रेशमी वस्त्रोंके ढेर, अनबिंधे मोती और उत्तमोत्तम स्फटिक रत्न उस विस्तृत एवं उत्तम राजमार्गकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह नाना प्रकारके पुष्पों तथा भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थोंसे भरा हुआ था । उसके चौराहोंकी दही, अक्षत, हविष्य, लावा, धूप, अगर, चन्दन, नाना प्रकारके पुष्पहार और गन्ध-द्रव्योंसे सदा पूजा की जाती थी । स्वर्गलोकमें बैठे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति रथारूढ़ श्रीरामने उस राजमार्गको देखा ॥ वे अपने सुहृदोंके मुखसे कहे गये बहुत-से आशीर्वादोंको सुनते और यथायोग्य उन सब लोगोंका सम्मान करते हुए चले जा रहे थे ॥ ७½ ॥

पितामहैराचरितं तथैव प्रपितामहैः ॥ ८ ॥ अद्योपादाय तं मार्गमभिषिक्तोऽनुपालय । यथा स्म पोषिताः पित्रा यथा सर्वैः पितामहैः । ततः सुखतरं सर्वे रामे वत्स्याम राजनि ॥ ९ ॥

भावार्थ

( उनके हितैषी सुहृद् कहते थे—) ‘रघुनन्दन ! तुम्हारे पितामह और प्रपितामह ( दादे और परदादे ) जिसपर चलते आये हैं, आज उसी मार्गको ग्रहण करके युवराज-पदपर अभिषिक्त हो आप हम सब लोगोंका निरन्तर पालन करें’ ॥ ( फिर वे आपसमें कहने लगे–) ‘भाइयो ! श्रीरामके पिता तथा समस्त पितामहोंद्वारा जिस प्रकार हमलोगोंका पालन-पोषण हुआ है, श्रीरामके राजा होनेपर हम उससे भी अधिक सुखी रहेंगे ॥ ९ ॥

अलमद्य हि भुक्तेन परमार्थैरलं च नः । यदि पश्याम निर्यान्तं रामं राज्ये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘यदि हम राज्यपर प्रतिष्ठित हुए श्रीरामको पिताके घरसे निकलते हुए देख लें—यदि राजा रामका दर्शन कर लें तो अब हमें इहलोकके भोग और परमार्थस्वरूप मोक्ष लेकर क्या करना है ॥ १० ॥

ततो हि नः प्रियतरं नान्यत् किंचिद् भविष्यति। यथाभिषेको रामस्य राज्येनामिततेजसः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘अमित तेजस्वी श्रीरामका यदि राज्यपर अभिषेक हो जाय तो वह हमारे लिये जैसा प्रियतर कार्य होगा, उससे बढ़कर दूसरा कोई परम प्रिय कार्य नहीं होगा’ ॥ ११ ॥

एताश्चान्याश्च सुहृदामुदासीनः शुभाः कथाः । आत्मसम्पूजनीः शृण्वन् ययौ रामो महापथम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

सुहृदोंके मुँहसे निकली हुई ये तथा और भी कई तरहकी अपनी प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली सुन्दर बातें सुनते हुए श्रीरामचन्द्रजी राजपथपर बढ़े चले जा रहे थे ॥ १२ ॥

न हि तस्मान्मनः कश्चिच्चक्षुषी वा नरोत्तमात् । नरः शक्नोत्यपाक्रष्टुमतिक्रान्तेऽपि राघवे ॥ १३ ॥

भावार्थ

( जो श्रीरामकी ओर एक बार देख लेता, वह उन्हें देखता ही रह जाता था । ) श्रीरघुनाथजीके दूर चले जानेपर भी कोई उन पुरुषोत्तमकी ओरसे अपना मन या दृष्टि नहीं हटा पाता था ॥ १३ ॥

यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ १४ ॥

भावार्थ

उस समय जो श्रीरामको नहीं देखता और जिसे श्रीराम नहीं देख लेते थे, वह समस्त लोकोंमें निन्दित समझा जाता था तथा स्वयं उसकी अन्तरात्मा भी उसे धिक्कारती थी ॥ १४ ॥

सर्वेषु स हि धर्मात्मा वर्णानां कुरुते दयाम् । चतुर्णां हि वयःस्थानां तेन ते तमनुव्रताः ॥ १५ ॥

भावार्थ

धर्मात्मा श्रीराम चारों वर्णोंके सभी मनुष्योंपर उनकी अवस्थाके अनुरूप दया करते थे, इसलिये वे सभी उनके भक्त थे ॥ १५ ॥

चतुष्पथान् देवपथांश्चैत्यांश्चायतनानि च । प्रदक्षिणं परिहरञ्जगाम नृपतेः सुतः ॥ १६ ॥ स राजकुलमासाद्य मेघसङ्घोपमैः शुभैः । प्रासादशृङ्गैर्विविधैः कैलासशिखरोपमैः ॥ १७ ॥ आवारयद्भिर्गगनं विमानैरिव पाण्डुरैः । वर्धमानगृहैश्चापि रत्नजालपरिष्कृतैः ॥ १८ ॥ तत् पृथिव्यां गृहवरं महेन्द्रसदनोपमम् । राजपुत्रः पितुर्वेश्म प्रविवेश श्रिया ज्वलन् ॥ १९ ॥

भावार्थ

राजकुमार श्रीराम चौराहों, देवमार्गों, चैत्यवृक्षों तथा देवमन्दिरोंको अपने दाहिने छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ राजा दशरथका भवन मेघसमूहोंके समान शोभा पानेवाले, सुन्दर अनेक रूप-रंगवाले कैलासशिखरके समान उज्ज्वल प्रासादशिखरों ( अट्टालिकाओं ) से सुशोभित था । उसमें रत्नोंकी जालीसे विभूषित तथा विमानाकार क्रीड़ागृह भी बने हुए थे, जो अपनी श्वेत आभासे प्रकाशित होते थे । वे अपनी ऊँचाईसे आकाशको भी लाँघते हुए-से प्रतीत होते थे; ऐसे ग्रहोंसे युक्त वह श्रेष्ठ भवन इस भूतलपर इन्द्रसदनके समान शोभा पाता था। उस राजभवनके पास पहुँचकर अपनी शोभासे प्रकाशित होनेवाले राजकुमार श्रीरामने पिताके महलमें प्रवेश किया ॥ १७—१९ ॥

स कक्ष्या धन्विभिर्गुप्तास्तिस्रोऽतिकम्य वाजिभिः। पदातिरपरे कक्ष्ये द्वे जगाम नरोत्तमः ॥ २० ॥

भावार्थ

उन्होंने धनुर्धर वीरोंद्वारा सुरक्षित महलकी तीन ड्योढ़ियोंको तो घोड़े जुते हुए रथसे ही पार किया, फिर दो ड्योढ़ियोंमें वे पुरुषोत्तम राम पैदल ही गये ॥ २० ॥

स सर्वाः समतिक्रम्य कक्ष्या दशरथात्मजः । संनिवर्त्य जनं सर्वं शुद्धान्तःपुरमत्यगात् ॥ २१ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सारी ड्योढ़ियोंको पार करके दशरथनन्दन श्रीराम साथ आये हुए सब लोगोंको लौटाकर स्वयं अन्तःपुरमें गये ॥ २१ ॥

तस्मिन् प्रविष्टे पितुरन्तिकं तदा जनः स सर्वो मुदितो नृपात्मजे । प्रतीक्षते तस्य पुनः स्म निर्गमं यथोदयं चन्द्रमसः सरित्पतिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

जब राजकुमार श्रीराम पिताके पास जानेके लिये अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए, तब आनन्दमग्न हुए सब लोग बाहर खड़े होकर उनके पुनः निकलनेकी प्रतीक्षा करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र चन्द्रोदयकी प्रतीक्षा करता रहता है ॥ २२ ॥

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