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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 119

अनसूया तु धर्मज्ञा श्रुत्वा तां महतीं कथाम् । पर्यष्वजत बाहुभ्यां शिरस्याघ्राय मैथिलीम् ॥ १ ॥

भावार्थ

‘धर्मको जाननेवाली अनसूयाने उस लंबी कथाको सुनकर मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे अङ्कमें भर लिया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—॥ १ ॥

व्यक्ताक्षरपदं चित्रं भाषितं मधुरं त्वया । यथा स्वयंवरं वृत्तं तत् सर्वं च श्रुतं मया ॥ २ ॥

भावार्थ

‘बेटी ! तुमने सुस्पष्ट अक्षरवाले शब्दोंमें यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया । तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया ॥ २ ॥

रमेयं कथया ते तु दृढं मधुरभाषिणि । रविरस्तं गतः श्रीमानुपोह्य रजनीं शुभाम् ॥ ३ ॥ दिवसं परिकीर्णानामाहारार्थे पतत्त्रिणाम् । संध्याकाले निलीनानां निद्रार्थे श्रूयते ध्वनिः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘मधुरभाषिणी सीते ! तुम्हारी इस कथामें मेरा मन बहुत लग रहा है; तथापि तेजस्वी सूर्यदेव रजनीकी शुभ वेला-को निकट पहुँचाकर अस्त हो गये । जो दिनमें चारा चुगनेके लिये चारों ओर छिटके हुए थे, वे पक्षी अब संध्याकालमें नींद लेनेके लिये अपने घोंसलोंमें आकर छिप गये हैं; उनकी यह ध्वनि सुनायी दे रही है ॥ ३-४ ॥

एते चाप्यभिषेकार्द्रा मुनयः कलशोद्यताः । सहिता उपवर्तन्ते सलिलाप्लुतवल्कलाः ॥ ५ ॥ अग्निहोत्रे च ऋषिणा हुते च विधिपूर्वकम् । कपोताङ्गारुणो धूमो दृश्यते पवनोद्धतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘ये जलसे भीगे हुए वल्कल धारण करनेवाले मुनि, जिनके शरीर स्नानके कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जलसे भरे कलश उठाये एक साथ आश्रमकी ओर लौट रहे हैं ॥ ‘महर्षि ( अत्रि ) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र-सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अतः वायुके वेगसे ऊपरको उठा हुआ यह कबूतरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णका धूम दिखायी दे रहा है ॥ ६ ॥

अल्पपर्णा हि तरवो घनीभूताः समन्ततः । विप्रकृष्टेन्द्रिये देशे न प्रकाशन्ति वै दिशः ॥ ७ ॥ रजनीचरसत्त्वानि प्रचरन्ति समन्ततः । तपोवनमृगा ह्येते वेदितीर्थेषु शेरते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘अपनी इन्द्रियोंसे दूर देशमें चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होनेपर भी अन्धकारसे व्याप्त हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओंका भान नहीं हो रहा है॥ ‘रातको विचरनेवाले प्राणी ( उल्लू आदि ) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवनके मृग पुण्यक्षेत्रस्वरूप आश्रमके वेदी आदि विभिन्न प्रदेशोंमें सो रहे हैं ॥ ८ ॥

सम्प्रवृत्ता निशा सीते नक्षत्रसमलंकृता । ज्योत्स्नाप्रावरणश्चन्द्रो दृश्यतेऽभ्युदितोऽम्बरे ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘सीते ! अब रात हो गयी, वह नक्षत्रोंसे सज गयी है । आकाशमें चन्द्रदेव चाँदनीकी चादर ओढ़े उदित दिखायी देते हैं ॥ ९ ॥

गम्यतामनुजानामि रामस्यानुचरी भव। कथयन्त्या हि मधुरं त्वयाहमपि तोषिता ॥ १० ॥

भावार्थ

‘अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जानेकी आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातोंसे मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है ॥ १० ॥

अलंकुरु च तावत् त्वं प्रत्यक्षं मम मैथिलि। प्रीतिं जनय मे वत्से दिव्यालंकारशोभिनी ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘बेटी ! मिथिलेशकुमारी ! पहले मेरी आँखोंके सामने अपने आपको अलंकृत करो। इन दिव्य वस्त्र और आभूषणोंको धारण करके इनसे सुशोभित हो मुझे प्रसन्न करो’ ॥११॥

सा तदा समलंकृत्य सीता सुरसुतोपमा। प्रणम्य शिरसा पादौ रामं त्वभिमुखी ययौ ॥ १२ ॥

भावार्थ

यह सुनकर देवकन्याके समान सुन्दरी सीताने उस समय उन वस्त्राभूषणोंसे अपना शृङ्गार किया और अनसूयाके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करनेके अनन्तर वे श्रीरामके सम्मुख गयीं ॥ १२ ॥

तथा तु भूषितां सीतां ददर्श वदतां वरः। राघवः प्रीतिदानेन तपस्विन्या जहर्ष च ॥ १३ ॥ न्यवेदयत् ततः सर्वं सीता रामाय मैथिली। प्रीतिदानं तपस्विन्या वसनाभरणस्रजाम् ॥ १४ ॥ प्रहृष्टस्त्वभवद् रामो लक्ष्मणश्च महारथः। मैथिल्याः सत्क्रियां दृष्ट्वा मानुषेषु सुदुर्लभाम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

श्रीरामने जब इस प्रकार सीताको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूयाके उस प्रेमोपहारके दर्शनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ उस समय मिथिलेशकुमारी सीताने तपस्विनी अनसूयाके हाथसे जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदिका प्रेमो-पहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजीसे कह सुनाया ॥ भगवान् श्रीराम और महारथी लक्ष्मण सीताका वह सत्कार, जो मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है, देखकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥

ततः स शर्वरीं प्रीतः पुण्यां शशिनिभाननाम्। अर्चितस्तापसैः सर्वैरुवास रघुनन्दनः ॥ १६ ॥

भावार्थ

तदनन्तर समस्त तपस्विजनोंसे सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीरामने अनसूयाके दिये हुए पवित्र अलंकार आदिसे अलंकृत चन्द्रमुखी सीताको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया ॥ १६ ॥

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामभिषिच्य हुताग्निकान्। आपृच्छेतां नरव्याघ्रौ तापसान् वनगोचरान् ॥ १७ ॥

भावार्थ

वह रात बीतनेपर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणने उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी ॥ १७ ॥

तावूचुस्ते वनचरास्तापसा धर्मचारिणः। वनस्य तस्य संचारं राक्षसैः समभिप्लुतम् ॥ १८ ॥ रक्षांसि पुरुषादानि नानारूपाणि राघव। वसन्त्यस्मिन् महारण्ये व्यालाश्च रुधिराशनाः ॥ १९ ॥

भावार्थ

तब वे धर्मपरायण वनवासी तपस्वी उन दोनों भाइयोंसे इस प्रकार बोले—‘रघुनन्दन ! इस वनका मार्ग राक्षसोंसे आक्रान्त है—यहाँ उनका उपद्रव होता रहता है। इस विशाल वनमें नानारूपधारी नरभक्षी राक्षस तथा रक्तभोजी हिंसक पशु निवास करते हैं ॥ १८-१९ ॥

उच्छिष्टं वा प्रमत्तं वा तापसं ब्रह्मचारिणम्। अदन्त्यस्मिन् महारण्ये तान् निवारय राघव ॥ २० ॥

भावार्थ

‘राघवेन्द्र ! जो तपस्वी और ब्रह्मचारी यहाँ अपवित्र अथवा असावधान अवस्थामें मिल जाता है, उसे वे राक्षस और हिंसक जन्तु इस महान् वनमें खा जाते हैं; अतः आप उन्हें रोकिये—यहाँसे मार भगाइये ॥ २० ॥

एष पन्था महर्षीणां फलान्याहरतां वने। अनेन तु वनं दुर्गं गन्तुं राघव ते क्षमम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘रघुकुलभूषण ! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षिलोग वनके भीतर फल-मूल लेनेके लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्गसे इस दुर्गम वनमें प्रवेश करना चाहिये’ ॥ २१ ॥

इतीरितः प्राञ्जलिभिस्तपस्विभि- र्द्विजैः कृतस्वस्त्ययनः परंतपः। वनं सभार्यः प्रविवेश राघवः सलक्ष्मणः सूर्य इवाभ्रमण्डलम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

तपस्वी ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर जब ऐसी बातें कहीं और उनकी मङ्गलयात्राके लिये स्वस्तिवाचन किया, तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीरामने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ उस वनमें प्रवेश किया, मानो सूर्यदेव मेघोंकी घटाके भीतर घुस गये हों ॥ २२ ॥

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