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अरण्यकाण्ड, सर्ग 1

प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान् । रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ १ ॥

भावार्थ

दण्डकारण्य नामक महान् वनमें प्रवेश करके मनको वशमें रखनेवाले दुर्जय वीर श्रीरामने तपस्वी मुनियोंके बहुत-से आश्रम देखे ॥ १ ॥

कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम् । यथा प्रदीप्तं दुर्दर्शं गगने सूर्यमण्डलम् ॥ २ ॥

भावार्थ

वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रममण्डल ऋषियोंकी ब्रह्मविद्याके अभ्याससे प्रकट हुए विलक्षण तेजसे व्याप्त था, इसलिये आकाशमें प्रकाशित होनेवाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डलकी भाँति वह भूतलपर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदिके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था ॥ २ ॥

शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा । मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारनेसे स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियोंके समुदाय भी उसे सब ओरसे घेरे रहते थे ॥ ३ ॥

पूजितं चोपनृत्तं च नित्यमप्सरसां गणैः । विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैरजिनैः कुशैः ॥ ४ ॥ समिद्भिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम् । आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

वहाँका प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थानके प्रति उनके मनमें बड़े आदरका भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ठ फल देनेवाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षोंसे वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था ॥ ४-५ ॥

बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम् । पुष्पैश्चान्यैः परिक्षिप्तं पद्मिन्या च सपद्मया ॥ ६ ॥

भावार्थ

बलिवैश्वदेव और होमसे पूजित वह पवित्र आश्रमसमूह वेदमन्त्रोंके पाठकी ध्वनिसे गूँजता रहता था। कमलपुष्पोंसे सुशोभित पुष्करिणी उस स्थानकी शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत-से फूल सब ओर बिखरे हुए थे ॥ ६ ॥

फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरैः । सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

उन आश्रमोंमें चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले तथा फल-मूलका आहार करके रहनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्निके तुल्य तेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे ॥ ७ ॥

पुण्यैश्च नियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः । तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

नियमित आहार करनेवाले पवित्र महर्षियोंसे सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजीके धामकी भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनिसे निनादित था ॥ ८ ॥

ब्रह्मविद्भिर्महाभागैर्ब्राह्मणैरुपशोभितम् । तद् दृष्ट्वा राघवः श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ ९ ॥ अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनुः ।

भावार्थ

अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमोंकी शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीरामने उस आश्रममण्डलको देखकर अपने महान् धनुषकी प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रमके भीतर गये ॥ ९½ ॥

दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षयः ॥ १० ॥ अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं च यशस्विनीम् ।

भावार्थ

श्रीराम तथा यशस्विनी सीताको देखकर वे दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके पास गये ॥ १०½ ॥

ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम् ॥ ११ ॥ लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं च यशस्विनीम् । मङ्गलानि प्रयुञ्जानाः प्रत्यगृह्णन् दृढव्रताः ॥ १२ ॥

भावार्थ

दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महर्षि उदयकालके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीरामको, लक्ष्मणको और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीताको भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे । उन्होंने उन तीनोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें ग्रहण किया ॥ ११-१२ ॥

रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् । ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥१३॥

भावार्थ

श्रीरामके रूप, शरीरकी गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेषको उन वनवासी मुनियोंने आश्चर्यचकित होकर देखा ॥ १३ ॥

वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव । आश्चर्यभूतान् ददृशुः सर्वे ते वनवासिनः ॥१४॥

भावार्थ

वनमें निवास करनेवाले वे सभी मुनि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता—तीनोंको एकटक नेत्रोंसे देखने लगे । उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था ॥ १४ ॥

अत्रैनं हि महाभागाः सर्वभूतहिते रताः । अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन् ॥१५॥

भावार्थ

समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले उन महाभाग महर्षियोंने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीरामको पर्णशालामें ले जाकर ठहराया ॥ १५ ॥

ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमाः । आजह्रुस्ते महाभागाः सलिलं धर्मचारिणः ॥१६॥

भावार्थ

अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियोंने श्रीरामको विधिवत् सत्कारके साथ जल समर्पित किया ॥ १६ ॥

मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युताः । मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं च महात्मनः ॥१७॥

भावार्थ

फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीरामको उन्होंने फल-मूल और फूल आदिके साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया ॥ १७ ॥

निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन् । धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशाः ॥१८॥ पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरुः । इन्द्रस्यैव चतुर्भागः प्रजा रक्षति राघव ॥ १९ ॥ राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृतः। ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिनः । नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः ॥ २० ॥

भावार्थ

सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले—‘रघुनन्दन ! दण्ड धारण करनेवाला राजा धर्मका पालक, महायशस्वी, इस जन-समुदायको शरण देनेवाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है । इस भूतलपर इन्द्र ( आदि लोकपालों ) का ही चौथा अंश होनेके कारण वह प्रजाकी रक्षा करता है, अतः राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगोंका उपभोग करता है । ( जब साधारण राजाकी यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है । आप तो साक्षात् भगवान् हैं ) ॥ १८–१९॥ ॥ ‘हम आपके राज्यमें निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये । आप नगरमें रहें या वनमें, हमलोगोंके राजा ही हैं । आप समस्त जनसमुदायके शासक एवं पालक हैं ॥ २० ॥

न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! हमने जीवमात्रको दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लिया है । अब तपस्या ही हमारा धन है । जैसे माता गर्भस्थ बालककी रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरहसे हमारी रक्षा करनी चाहिये’ ॥ २१ ॥

एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैरन्यैश्च राघवम् । वन्यैश्च विविधाहारैः सलक्ष्मणमपूजयन् ॥ २२ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियोंने वनमें उत्पन्न होनेवाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकारके आहारोंसे लक्ष्मण ( और सीता ) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका सत्कार किया ॥ २२ ॥

तथान्ये तापसाः सिद्धा रामं वैश्वानरोपमाः । न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्तावबाले सिद्ध तापसोंने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीरामको यथोचित रूपसे तृप्त किया ॥ २३ ॥

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