अयोध्याकाण्ड, सर्ग 117
राघवस्त्वपयातेषु सर्वेष्वनुविचिन्तयन्। न तत्रारोचयद् वासं कारणैर्बहुभिस्तदा ॥ १ ॥
भावार्थ
उन सब ऋषियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने जब बारंबार विचार किया, तब उन्हें बहुत-से ऐसे कारण ज्ञात हुए, जिनसे उन्होंने स्वयं भी वहाँ रहना उचित न समझा ॥ १ ॥
इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागराः। सा च मे स्मृतिरन्वेति तान् नित्यमनुशोचतः ॥ २ ॥
भावार्थ
उन्होंने मन-ही-मन सोचा, ‘इस आश्रममें मैं भरतसे, माताओंसे तथा पुरवासी मनुष्योंसे मिल चुका हूँ। वह स्मृति मुझे बराबर बनी रहती है और मैं प्रतिदिन उन सब लोगोंका चिन्तन करके शोकमग्न हो जाता हूँ ॥ २ ॥
स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मनः। हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्दः कृतो भृशम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महात्मा भरतकी सेनाका पड़ाव पड़नेके कारण हाथी और घोड़ोंकी लीदोंसे यहाँकी भूमि अधिक अपवित्र कर दी गयी है ॥ ३ ॥
तस्मादन्यत्र गच्छाम इति संचिन्त्य राघवः। प्रातिष्ठत स वैदेह्या लक्ष्मणेन च संगतः ॥ ४ ॥ सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः। तं चापि भगवानत्रिः पुत्रवत् प्रत्यपद्यत ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘अतः हमलोग भी अन्यत्र चले जायँ’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँसे चल दिये ॥ वहाँसे अत्रिके आश्रमपर पहुँचकर महायशस्वी श्रीरामने उन्हें प्रणाम किया तथा भगवान् अत्रिने भी उन्हें अपने पुत्रकी भाँति स्नेहपूर्वक अपनाया ॥ ५ ॥
स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमस्य सुसत्कृतम्। सौमित्रिं च महाभागं सीतां च समसान्त्वयत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
उन्होंने स्वयं ही श्रीरामका सम्पूर्ण आतिथ्य-सत्कार करके महाभाग लक्ष्मण और सीताको भी सत्कारपूर्वक संतुष्ट किया ॥ ६ ॥
पत्नीं च तमनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम्। सान्त्वयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः ॥ ७ ॥ अनसूयां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्। प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तमः ॥ ८ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञ मुनिश्रेष्ठ अत्रिने अपने समीप आयी हुई सबके द्वारा सम्मानित तापसी एवं धर्मपरायणा बूढ़ी पत्नी महाभागा अनसूयाको सम्बोधित करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा संतुष्ट किया और कहा--‘देवि ! विदेहराजनन्दिनी सीताको सत्कारपूर्वक हृदयसे लगाओ’ ॥ ७-८ ॥
रामाय चाचचक्षे तां तापसीं धर्मचारिणीम्। दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम् ॥ ९ ॥ यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता। उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलंकृता ॥ १० ॥ दश वर्षसहस्राणि यया तप्तं महत् तपः। अनसूयाव्रतैस्तात प्रत्यूहाश्च निबर्हिताः ॥ ११ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको धर्मपरायणा तपस्विनी अनसूयाका परिचय देते हुए कहा—‘एक समय दस वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई, उस समय जब सारा जगत् निरन्तर दग्ध होने लगा, तब जिन्होंने उग्र तपस्यासे युक्त तथा कठोर नियमोंसे अलंकृत होकर अपने तपके प्रभावसे यहाँ फल-मूल उत्पन्न किये और मन्दाकिनीकी पवित्र धारा बहायी तथा तात ! जिन्होंने दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करके अपने उत्तम व्रतोंके प्रभावसे ऋषियोंके समस्त विघ्नोंका निवारण किया था, वे ही यह अनसूया देवी हैं ॥ ९–११ ॥
देवकार्यनिमित्तं च यया संत्वरमाणया । दशरात्रं कृता रात्रिः सेयं मातेव तेऽनघ ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप श्रीराम ! इन्होंने देवताओंके कार्यके लिये अत्यन्त उतावली होकर दस रातके बराबर एक ही रात बनायी थी; वे ही ये अनसूया देवी तुम्हारे लिये माताकी भाँति पूजनीया हैं ॥ १२ ॥
तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यां तपस्विनीम् । अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘ये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये वन्दनीया तपस्विनी हैं । क्रोध तो इन्हें कभी छू भी नहीं सका है । विदेहनन्दिनी सीता इन वृद्धा अनसूया देवीके पास जायँ’ ॥ १३ ॥
एवं ब्रुवाणं तमृर्षि तथेत्युक्त्वा स राघवः । सीतामालोक्य धर्मज्ञामिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसी बात कहते हुए अत्रि मुनिसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीने धर्मज्ञा सीताकी ओर देखकर यह बात कही–॥ १४ ॥
राजपुत्रि श्रुतं त्वेतन्मुनेरस्य समीरितम् । श्रेयोऽर्थमात्मनः शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘राजकुमारी ! महर्षि अत्रिके वचन तो तुमने सुन ही लिये; अब अपने कल्याणके लिये तुम शीघ्र ही इन तपस्विनी देवीके पास जाओ ॥ १५ ॥
अनसूयेति या लोके कर्मभिः ख्यातिमागता । तां शीघ्रमभिगच्छ त्वमभिगम्यां तपस्विनीम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जो अपने सत्कर्मोंसे संसारमें अनसूयाके नामसे विख्यात हुई हैं, वे तपस्विनी देवी तुम्हारे आश्रय लेने योग्य हैं; तुम शीघ्र उनके पास जाओ’ ॥ १६ ॥
सीता त्वेतद् वचः श्रुत्वा राघवस्य यशस्विनी । तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली ॥ १७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीता धर्मको जाननेवाली अत्रिपत्नी अनसूयाके पास गयीं ॥ १७ ॥
शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम् । सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीमिव ॥ १८ ॥
भावार्थ
अनसूया वृद्धावस्थाके कारण शिथिल हो गयी थीं; उनके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं तथा सिरके बाल सफेद हो गये थे । अधिक हवा चलनेपर हिलते हुए कदली-वृक्षके समान उनके सारे अङ्ग निरन्तर काँप रहे थे ॥ १८ ॥
तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम् । अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
सीताने निकट जाकर शान्तभावसे अपना नाम बताया और उन महाभागा पतिव्रता अनसूयाको प्रणाम किया ॥१९॥
अभिवाद्य च वैदेही तापसीं तां दमान्विताम् । बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ २० ॥ ततः सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम् । सान्त्वयन्त्यब्रवीद् वृद्धा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे ॥ २१ ॥
भावार्थ
उन संयमशीला तपस्विनीको प्रणाम करके हर्षसे भरी हुई सीताने दोनों हाथ जोड़कर उनका कुशल-समाचार पूछा॥ धर्मका आचरण करनेवाली महाभागा सीताको देखकर बूढ़ी अनसूया देवी उन्हें सान्त्वना देती हुई बोलीं––‘सीते ! सौभाग्यकी बात है कि तुम धर्मपर ही दृष्टि रखती हो ॥२१॥
त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानवृद्धिं च मानिनि । अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मानिनी सीते ! बन्धु-बान्धवोंको छोड़कर और उनसे प्राप्त होनेवाली मान-प्रतिष्ठाका परित्याग करके तुम वनमें भेजे हुए श्रीरामका अनुसरण कर रही हो—यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ २२ ॥
नगरस्थो वनस्थो वा शुभो वा यदि वाशुभः । यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः ।२३।
भावार्थ
‘अपने स्वामी नगरमें रहें या वनमें, भले हों या बुरे, जिन स्त्रियोंको वे प्रिय होते हैं, उन्हें महान् अभ्युदयशाली लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥
दुःशीलः कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जितः । स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पतिः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘पति बुरे स्वभावका, मनमाना बर्ताव करनेवाला अथवा धनहीन ही क्यों न हो, वह उत्तम स्वभाववाली नारियोंके लिये श्रेष्ठ देवताके समान है ॥ २४ ॥
नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशान्त्यहम् । सर्वत्र योग्यं वैदेहि तपःकृतमिवाव्ययम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘विदेहराजनन्दिनि ! मैं बहुत विचार करनेपर भी पतिसे बढ़कर कोई हितकारी बन्धु नहीं देखती । अपनी की हुई तपस्याके अविनाशी फलकी भाँति वह इस लोकमें और परलोकमें सर्वत्र सुख पहुँचानेमें समर्थ होता है ॥ २५ ॥
न त्वेवमनुगच्छन्ति गुणदोषमसत्स्त्रियः । कामवक्तव्यहृदया भर्तृनाथाश्चरन्ति याः ॥२६॥
भावार्थ
‘जो अपने पतिपर भी शासन करती हैं, वे कामके अधीन चित्तवाली असाध्वी स्त्रियाँ इस प्रकार पतिका अनुसरण नहीं करतीं । उन्हें गुण-दोषोंका ज्ञान नहीं होता; अतः वे इच्छानुसार इधर-उधर विचरती रहती हैं ॥ २६ ॥
प्राप्नुवन्त्ययशश्चैव धर्मभ्रंशं च मैथिलि । अकार्यवशमापन्नाः स्त्रियो याः खलु तद्विधाः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! ऐसी नारियाँ अवश्य ही अनुचित कर्ममें फँसकर धर्मसे भ्रष्ट हो जाती हैं और संसारमें उन्हें अपयशकी प्राप्ति होती है ॥ २७ ॥
त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्टलोकपरावराः । स्त्रियः स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा पुण्यकृतस्तथा ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘किंतु जो तुम्हारे समान लोक-परलोकको जाननेवाली साध्वी स्त्रियाँ हैं, वे उत्तम गुणोंसे युक्त होकर पुण्यकर्मोंमें संलग्न रहती हैं; अतः वे दूसरे पुण्यात्माओंकी भाँति स्वर्गलोकमें विचरण करेंगी ॥ २८ ॥
तदेवमेतं त्वमनुव्रता सती पतिप्रधाना समयानुवर्तिनी । भव स्वभर्तुः सहधर्मचारिणी यशश्च धर्मं च ततः समाप्स्यसि ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘अतः तुम इसी प्रकार अपने इन पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें लगी रहो—सतीधर्मका पालन करो, पतिको प्रधान देवता समझो और प्रत्येक समय उनका अनुसरण करती हुई अपने स्वामीकी सहधर्मिणी बनो, इससे तुम्हें सुयश और धर्म दोनोंकी प्राप्ति होगी’ ॥ २९ ॥
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