अयोध्याकाण्ड, सर्ग 116
प्रतियाते तु भरते वसन् रामस्तदा वने। लक्षयामास सोद्वेगमथौत्सुक्यं तपस्विनाम् ॥ १ ॥
भावार्थ
भरतके लौट जानेपर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वनमें निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँके तपस्वी उद्विग्न हो वहाँसे अन्यत्र चले जानेके लिये उत्सुक हैं ॥ १ ॥
ये तत्र चित्रकूटस्य पुरस्तात् तापसाश्रमे। राममाश्रित्य निरतास्तानलक्षयदुत्सुकान् ॥ २ ॥
भावार्थ
पहले चित्रकूटके उस आश्रममें जो तपस्वी श्रीरामका आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हींको श्रीरामने उत्कण्ठित देखा ( मानो वे कहीं जानेके विषयमें कुछ कहना चाहते हों ) ॥ २ ॥
नयनैर्भ्रुकुटीभिश्च रामं निर्दिश्य शङ्किताः। अन्योन्यमुपजल्पन्तः शनैश्चक्रुर्मिथः कथाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
नेत्रोंसे, भौंहें टेढ़ी करके, श्रीरामकी ओर संकेत करके मन-ही-मन शङ्कित हो आपसमें कुछ सलाह करते हुए वे तपस्वी मुनि धीरे-धीरे परस्पर वार्तालाप कर रहे थे ॥ ३ ॥
तेषामौत्सुक्यमालक्ष्य रामस्त्वात्मनि शङ्कितः। कृताञ्जलिरुवाचेदमृषिं कुलपतिं ततः ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया । तब वे हाथ जोड़कर वहाँके कुलपति महर्षिसे इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
न कश्चिद्भगवन् किञ्चित् पूर्ववृत्तमिदं मयि। दृश्यते विकृतं येन विक्रियन्ते तपस्विनः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओंका-सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है, जिससे यहाँके तपस्वी मुनि विकारको प्राप्त हो रहे हैं ॥ ५ ॥
प्रमादाच्चरितं किंचित् कच्चिन्नावरजस्य मे। लक्ष्मणस्यर्षिभिर्दृष्टं नानुरूपं महात्मनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘क्या मेरे छोटे भाई महात्मा लक्ष्मणका प्रमादवश किया हुआ कोई ऐसा आचरण ऋषियोंने देखा है, जो उसके योग्य नहीं है ॥ ६ ॥
कच्चिच्छुश्रूषमाणा वः शुश्रूषणपरा मयि। प्रमदाभ्युचितां वृत्ति सीता युक्तां न वर्तते ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अथवा क्या जो अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा सदा आपलोगोंकी सेवा करती रही है, वह सीता इस समय मेरी सेवामें लग जानेके कारण एक गृहस्थकी सती नारीके अनुरूप ऋषियोंकी समुचित सेवा नहीं कर पाती है ?’ ॥ ७ ॥
अथर्षिर्जरया वृद्धस्तपसा च जरां गतः। वेपमान इवोवाच रामं भूतदयापरम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर एक महर्षि जो जरा-वस्थाके कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्याद्वारा भी वृद्ध हो गये थे, समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाले श्रीरामसे काँपते हुए-से बोले—॥ ८ ॥
कुतः कल्याणसत्त्वायाः कल्याणाभिरतेः सदा। चलनं तात वैदेह्यास्तपस्विषु विशेषतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तात ! जो स्वभावसे ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याणमें ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषतः तपस्वीजनोंके प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभावसे विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है ? ॥ ९ ॥
त्वन्निमित्तमिदं तावत् तापसान् प्रति वर्तते। रक्षोभ्यस्तेन संविग्नाः कथयन्ति मिथः कथाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘आपके ही कारण तापसोंपर यह राक्षसोंकी ओरसे भय उपस्थित होनेवाला है, उससे उद्विग्न हुए ऋषि आपसमें कुछ बातें ( कानाफूसी ) कर रहे हैं ॥ १० ॥
रावणावरजः कश्चित् खरो नामेह राक्षसः । उत्पाट्य तापसान् सर्वाञ्जनस्थाननिवासिनः ॥ ११॥ धृष्टश्च जितकाशी च नृशंसः पुरुषादकः । अवलिप्तश्च पापश्च त्वां च तात न मृष्यते ॥ १२॥
भावार्थ
‘तात ! यहाँ वनप्रान्तमें रावणका छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थानमें रहनेवाले समस्त तापसोंको उखाड़ फेंका है । वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है । वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है ॥ ११–१२ ॥
त्वं यदाप्रभृति ह्यस्मिन्नाश्रमे तात वर्तसे । तदाप्रभृति रक्षांसि विप्रकुर्वन्ति तापसान् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘तात ! जबसे आप इस आश्रममें रह रहे हैं, तबसे सब राक्षस तापसोंको विशेषरूपसे सताने लगे हैं ॥ १३ ॥
दर्शयन्ति हि बीभत्सैः क्रूरैर्भीषणकैरपि । नानारूपैर्विरूपैश्च रूपैरसुखदर्शनैः ॥ १४ ॥ अप्रशस्तैरशुचिभिः सम्प्रयुज्य च तापसान् । प्रतिघ्नन्त्यपरान् क्षिप्रमनार्याः पुरतः स्थितान् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वे अनार्य राक्षस बीभत्स ( घृणित ), क्रूर और भीषण, नाना प्रकारके विकृत एवं देखनेमें दुःखदायक रूप धारण करके सामने आते हैं और पापजनक अपवित्र पदार्थोंसे तपस्वियोंका स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियोंको भी पीड़ा देते हैं ॥ १४–१५ ॥
तेषु तेष्वाश्रमस्थानेष्ववुद्धमवलीय च । रमन्ते तापसांस्तत्र नाशयन्तोऽल्पचेतसः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘वे उन-उन आश्रमोंमें अज्ञातरूपसे आकर छिप जाते हैं और अल्पज्ञ अथवा असावधान तापसोंका विनाश करते हुए वहाँ सानन्द विचरते रहते हैं ॥ १६ ॥
अवक्षिपन्ति स्रुग्भाण्डानग्नीन् सिञ्चन्ति वारिणा । कलशांश्च प्रमर्दन्ति हवने समुपस्थिते ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘होमकर्म आरम्भ होनेपर वे स्रुक्-स्रुवा आदि यज्ञसामग्रियोंको इधर-उधर फेंक देते हैं । प्रज्वलित अग्निमें पानी डाल देते हैं और कलशोंको फोड़ डालते हैं ॥ १७ ॥
तैर्दुरात्मभिराविष्टानाश्रमान् प्रजिहासवः । गमनायान्यदेशस्य चोदयन्त्यृषयोऽद्य माम् ॥ १८॥
भावार्थ
‘उन दुरात्मा राक्षसोंसे आविष्ट हुए आश्रमोंको त्याग देनेकी इच्छा रखकर ये ऋषिलोग आज मुझे यहाँसे अन्य स्थानमें चलनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं ॥ १८ ॥
तत् पुरा राम शारीरीमुपहिंसां तपस्विषु । दर्शयन्ति हि दुष्टास्ते त्यक्ष्याम इममाश्रमम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! वे दुष्ट राक्षस तपस्वियोंकी शारीरिक हिंसाका प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रमको त्याग देंगे ॥ १९ ॥
बहुमूलफलं चित्रमविदूरादितो वनम् । अश्वस्याश्रममेवाहं श्रयिष्ये सगणः पुनः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूलकी अधिकता है । वहीं अश्वमुनिका आश्रम है, अतः ऋषियोंके समूहको साथ लेकर मैं पुनः उसी आश्रमका आश्रय लूँगा ॥ २० ॥
खरस्त्वय्यपि चायुक्तं पुरा राम प्रवर्तते । सहास्माभिरितो गच्छ यदि बुद्धिः प्रवर्तते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँसे चल दीजिये ॥ २१ ॥
सकलत्रस्य संदेहो नित्यं युक्तस्य राघव । समर्थस्यापि हि सतो वासो दुःखमिहाद्य ते ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! यद्यपि आप सदा सावधान रहनेवाले तथा राक्षसोंके दमनमें समर्थ हैं, तथापि पत्नीके साथ आजकल उस आश्रममें आपका रहना संदेहजनक एवं दुःखदायक है’ ॥ २२ ॥
इत्युक्तवन्तं रामस्तं राजपुत्रस्तपस्विनम् । न शशाकोत्तरैर्वाक्यैरवबद्धुं समुत्सुकम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
ऐसी बात कहकर अन्यत्र जानेके लिये उत्कण्ठित हुए उन तपस्वी मुनिको राजकुमार श्रीराम सान्त्वनाजनक उत्तर-वाक्योंद्वारा वहाँ रोक नहीं सके ॥ २३ ॥
अभिनन्द्य समापृच्छ्य समाधाय च राघवम् । स जगामाश्रमं त्यक्त्वा कुलैः कुलपतिः सह ॥ २४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजीका अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रमको छोड़ वहाँसे अपने दलके ऋषियोंके साथ चले गये ॥ २४ ॥
रामः संसाध्य ऋषिगणमनुगमनाद् देशात् तस्मात् कुलपतिमभिवाद्य ऋषिम् । सम्यक्प्रीतैस्तैरनुमत उपदिष्टार्थः पुण्यं वासाय स्वनिलयमुपसम्पेदे ॥२५॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे जानेवाले ऋषियोंके पीछे-पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषिको प्रणाम करके परम प्रसन्न हुए उन ऋषियोंकी अनुमति ले उनके दिये हुए कर्तव्यविषयक उपदेशको सुनकर लौटे और निवास करनेके लिये अपने पवित्र आश्रममें आये ॥ २५ ॥
आश्रममृषिविरहितं प्रभुः क्षणमपि न जहौ स राघवः। राघवं हि सततमनुगता- स्तापसाश्चार्षचरिते धृतगुणाः ॥ २६ ॥
भावार्थ
उन ऋषियोंसे रहित हुए आश्रमको भगवान् श्रीरामने एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ा। जिनका ऋषियोंके समान ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजीमें निश्चय ही ऋषियोंकी रक्षाकी शक्तिरूप गुण विद्यमान है। ऐसा विश्वास रखनेवाले कुछ तपस्वीजनोंने सदा श्रीरामका ही अनुसरण किया। वे दूसरे किसी आश्रममें नहीं गये ॥ २६ ॥
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