अयोध्याकाण्ड, सर्ग 11
तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम् । उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
भूपाल दशरथ कामदेवके बाणोंसे पीड़ित तथा कामवेगके वशीभूत हो उसीका अनुसरण कर रहे थे । उनसे कैकेयीने यह कठोर वचन कहा—॥ १ ॥
नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता । अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तमिच्छामि त्वया कृतम् ॥२॥
भावार्थ
‘देव ! न तो किसीने मेरा अपकार किया है और न किसीके द्वारा मैं अपमानित या निन्दित ही हुई हूँ । मेरा कोई एक अभिप्राय ( मनोरथ ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ ॥ २ ॥
प्रतिज्ञां प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि । अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये । इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी’ ॥ ३ ॥
तामुवाच महाराजः कैकेयीमीषदुत्स्मयः । कामी हस्तेन संगृह्य मूर्धजेषु भुवि स्थिताम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
महाराज दशरथ कामके अधीन हो रहे थे । वे कैकेयीकी बात सुनकर किंचित् मुस्कराये और पृथ्वीपर पड़ी हुई उस देवीके केशोंको हाथसे पकड़कर—उसके सिरको अपनी गोदमें रखकर उससे इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
अवलिप्ते न जानासि त्वत्तः प्रियतरो मम । मनुजो मनुजव्याघ्राद् रामादन्यो न विद्यते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘अपने सौभाग्यपर गर्व करनेवाली कैकेयी ! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि नरश्रेष्ठ श्रीरामके अतिरिक्त दूसरा कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो ॥ ५ ॥
तेनाजय्येन मुख्येन राघवेण महात्मना । शपे ते जीवनार्हेण ब्रूहि यन्मनसेप्सितम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जो प्राणोंके द्वारा भी आराधनीय हैं और जिन्हें जीतना किसीके लिये भी असम्भव है, उन प्रमुख वीर महात्मा श्रीरामकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कामना पूर्ण होगी; अतः तुम्हारे मनकी जो इच्छा हो उसे बताओ ॥ ६ ॥
यं मुहूर्तमपश्यंस्तु न जीवे तमहं ध्रुवम् । तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘कैकेयि ! जिन्हें दो घड़ी भी न देखनेपर निश्चय ही मैं जीवित नहीं रह सकता, उन श्रीरामकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम जो कहोगी, उसे पूर्ण करूँगा ॥ ७ ॥
आत्मना चात्मजैश्चान्यैर्वृणे यं मनुजर्षभम् । तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘केकयनन्दिनि ! अपने तथा अपने दूसरे पुत्रोंको निछावर करके भी मैं जिन नरश्रेष्ठ श्रीरामका वरण करनेको उद्यत हूँ, उन्हींकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कही हुई बात पूरी करूँगा ॥ ८ ॥
भद्रे हृदयमप्येतदनुमृश्योद्धरस्व मे । एतत् समीक्ष्य कैकेयि ब्रूहि यत् साधु मन्यसे ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘भद्रे ! केकयराजकुमारी ! मेरा यह हृदय भी तुम्हारे वचनोंकी पूर्तिके लिये तत्पर है । ऐसा सोचकर तुम अपनी इच्छा व्यक्त करके इस दुःखसे मेरा उद्धार करो । श्रीराम सबको अधिक प्रिय हैं—इस बातपर दृष्टिपात करके तुम्हें जो अच्छा जान पड़े, वह कहो ॥ ९ ॥
बलमात्मनि पश्यन्ती न विशङ्कितुमर्हसि । करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे ॥ १० ॥
भावार्थ
‘अपने बलको देखते हुए भी तुम्हें मुझपर शङ्का नहीं करनी चाहिये । मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा’ ॥१०॥
सा तदर्थमना देवी तमभिप्रायमागतम् । निर्माध्यस्थ्याच्च हर्षाच्च बभाषे दुर्वचं वचः ॥ ११ ॥
भावार्थ
रानी कैकेयीका मन स्वार्थकी सिद्धिमें ही लगा हुआ था । उसके हृदयमें भरतके प्रति पक्षपात था और राजाको अपने वशमें देखकर हर्ष हो रहा था; अतः यह सोचकर कि अब मेरे लिये अपना मतलब साधनेका अवसर आ गया है, वह राजासे ऐसी बात बोली, जिसे मुँहसे निकालना ( शत्रुके लिये भी ) कठिन है ॥ ११ ॥
तेन वाक्येन संहृष्टा तमभिप्रायमात्मनः । व्याजहार महाघोरमभ्यागतमिवान्तकम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
राजाके उस शपथयुक्त वचनसे उसको बड़ा हर्ष हुआ था । उसने अपने उस अभिप्रायको जो पास आये हुए यमराजके समान अत्यन्त भयंकर था, इन शब्दोंमें व्यक्त किया—॥ १२ ॥
यथा क्रमेण शपसे वरं मम ददासि च । तच्छृण्वन्तु त्रयस्त्रिंशद् देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आप जिस तरह क्रमशः शपथ खाकर मुझे वर देनेको उद्यत हुए हैं, उसे इन्द्र आदि तैंतीस देवता सुन लें ॥ १३ ॥
चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा राज्यहनी दिशः । जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वाः सराक्षसाः ॥ १४ ॥ निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवताः । यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात, दिन, दिशा, जगत्, यह पृथ्वी, गन्धर्व, राक्षस, रातमें विचरनेवाले प्राणी, घरोंमें रहनेवाले गृहदेवता तथा इनके अतिरिक्त भी जितने प्राणी हों, वे सब आपके कथनको जान लें—आपकी बातोंके साक्षी बनें ॥ १४-१५ ॥
सत्यसंधो महातेजा धर्मज्ञः सत्यवाक्शुचिः । वरं मम ददात्येष सर्वे शृण्वन्तु दैवताः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सब देवता सुनें ! महातेजस्वी, सत्यप्रतिज्ञ, धर्मके ज्ञाता, सत्यवादी तथा शुद्ध आचार-विचारवाले ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं’ ॥ १६ ॥
इति देवी महेष्वासं परिगृह्याभिशस्य च । ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार काममोहित होकर वर देनेको उद्यत हुए महाधनुर्धर राजा दशरथको अपनी मुट्ठीमें करके देवी कैकेयीने पहले उनकी प्रशंसा की; फिर इस प्रकार कहा—॥ १७ ॥
स्मर राजन् पुरा वृत्तं तस्मिन् देवासुरे रणे । तत्र त्वां च्यावयच्छत्रुस्तव जीवितमन्तरा ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! उस पुरानी बातको याद कीजिये, जब कि देवासुरसंग्राम हो रहा था । वहाँ शत्रुने आपको घायल करके गिरा दिया था; केवल प्राण नहीं लिये थे ॥ १८ ॥
तत्र चापि मया देव यत् त्वं समभिरक्षितः । जाग्रत्या यतमानायास्ततो मे प्रददौ वरौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘देव ! उस युद्धस्थलमें सारी रात जागकर अनेक प्रकारके प्रयत्न करके जो मैंने आपके जीवनकी रक्षा की थी उससे संतुष्ट होकर आपने मुझे दो वर दिये थे ॥ १९ ॥
तौ दत्तौ च वरौ देव निक्षेपौ मृगयाम्यहम् । तवैव पृथिवीपाल सकाशे रघुनन्दन ॥ २० ॥
भावार्थ
‘देव ! पृथ्वीपाल रघुनन्दन ! आपके दिये हुए वे दोनों वर मैंने धरोहरके रूपमें आपके ही पास रख दिये थे । आज इस समय उन्हींकी मैं खोज करती हूँ ॥ २० ॥
तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण न चेद् दास्यसि मे वरम् । अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार धर्मतः प्रतिज्ञा करके यदि आप मेरे उन वरोंको नहीं देंगे तो मैं अपनेको आपके द्वारा अपमानित हुई समझकर आज ही प्राणोंका परित्याग कर दूँगी’ ॥ २१ ॥
वाङ्मात्रेण तदा राजा कैकेय्या स्ववशे कृतः । प्रचस्कन्द विनाशाय पाशं मृग इवात्मनः ॥ २२ ॥
भावार्थ
जैसे मृग बहेलियेकी वाणीमात्रसे अपने ही विनाशके लिये उसके जालमें फँस जाता है, उसी प्रकार कैकेयीके वशीभूत हुए राजा दशरथ उस समय पूर्वकालके वरदान-वाक्यका स्मरण करानेमात्रसे अपने ही विनाशके लिये प्रतिज्ञाके बन्धनमें बँध गये ॥ २२ ॥
ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम् । वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते ॥ २३ ॥ तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वचः । अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पितः ॥ २४ ॥ अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम् ।
भावार्थ
तदनन्तर कैकेयीने काममोहित होकर वर देनेके लिये उद्यत हुए राजासे इस प्रकार कहा—‘देव ! पृथ्वीनाथ ! उन दिनों आपने जो दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उन्हें अब मुझे देना चाहिये । उन दोनों वरोंको मैं अभी बताऊँगी–आप मेरी बात सुनिये—यह जो श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी की गयी है, इसी अभिषेक-सामग्रीद्वारा मेरे पुत्र भरतका अभिषेक किया जाय ॥ २३-२४½ ॥
यो द्वितीयो वरो देव दत्तः प्रीतेन मे त्वया ॥ २५ ॥ तदा देवासुरे युद्धे तस्य कालोऽयमागतः ।
भावार्थ
‘देव ! आपने उस समय देवासुरसंग्राममें प्रसन्न होकर मेरे लिये जो दूसरा वर दिया था, उसे प्राप्त करनेका यह समय भी अभी आया है ॥ २५½ ॥
नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः ॥ २६ ॥ चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापसः । भरतो भजतामद्य यौवराज्यमकण्टकम् ॥ २७ ॥ एष मे परमः कामो दत्तमेव वरं वृणे । अद्य चैव हि पश्येयं प्रयान्तं राघवं वने ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘धीर स्वभाववाले श्रीराम तपस्वीके वेशमें वल्कल तथा मृगचर्म धारण करके चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्यमें जाकर रहें । भरतको आज निष्कण्टक युवराजपद प्राप्त हो जाय ॥ ‘यही मेरी सर्वश्रेष्ठ कामना है । मैं आपसे पहलेका दिया हुआ वर ही माँगती हूँ । आप ऐसी व्यवस्था करें, जिससे मैं आज ही श्रीरामको वनकी ओर जाते देखूँ ॥ २८ ॥
स राजराजो भव सत्यसंगरः कुलं च शीलं च हि जन्म रक्ष च । परत्र वासे हि वदन्त्यनुत्तमं तपोधनाः सत्यवचो हितं नृणाम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘आप राजाओंके राजा हैं; अतः सत्यप्रतिज्ञ बनिये और उस सत्यके द्वारा अपने कुल, शील तथा जन्मकी रक्षा कीजिये। तपस्वी पुरुष कहते हैं कि सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वह परलोकमें निवास होनेपर मनुष्योंके लिये परम कल्याणकारी होता है ॥ २९ ॥
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