अयोध्याकाण्ड, सर्ग 10
विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम् । तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किन्नरी ॥ १ ॥
भावार्थ
पापिनी कुब्जाने जब देवी कैकेयीको बहुत उलटी बातें समझा दीं, तब वह विषाक्त बाणसे विद्ध हुई किन्नरीके समान धरतीपर लोटने लगी ॥ १ ॥
निश्चित्य मनसा कृत्यं सा सम्यगिति भामिनी । मन्थरायै शनैः सर्वमाचचक्षे विचक्षणा ॥ २ ॥ सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता । नागकन्येव निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च भामिनी ॥ ३ ॥ मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम् ।
भावार्थ
मन्थराके बताये हुए समस्त कार्यको यह बहुत उत्तम है—ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके बात-चीतमें कुशल भामिनी कैकेयीने मन्थरासे धीरे-धीरे अपना सारा मन्तव्य बता दिया ॥ मन्थराके वचनोंसे मोहित एवं दीन हुई भामिनी कैकेयी पूर्वोक्त निश्चय करके नागकन्याकी भाँति गरम और लंबी साँस खींचने लगी और दो घड़ीतक अपने लिये सुखदायक मार्गका विचार करती रही ॥ ३½ ॥
सा सुहृच्चार्थकामा च तं निशम्य विनिश्चयम् ॥ ४ ॥ बभूव परमप्रीता सिद्धिं प्राप्येव मन्थरा ।
भावार्थ
और वह मन्थरा जो कैकेयीका हित चाहनेवाली सुहृद् थी और उसीके मनोरथको सिद्ध करनेकी अभिलाषा रखती थी, कैकेयीके उस निश्चयको सुनकर बहुत प्रसन्न हुई; मानो उसे कोई बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी हो ॥ ४½ ॥
अथ सा रुषिता देवी सम्यक्कृत्वा विनिश्चयम् ॥ ५ ॥ संविवेशाबला भूमौ निवेश्य भ्रुकुटिं मुखे ।
भावार्थ
तदनन्तर रोषमें भरी हुई देवी कैकेयी अपने कर्तव्यका भलीभाँति निश्चय कर मुखमण्डलमें स्थित भौंहोंको टेढ़ी करके धरतीपर सो गयी । और क्या करती अबला ही तो थी ॥ ५½ ॥
ततश्चित्राणि माल्यानि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ६ ॥ अपविद्धानि कैकेय्या तानि भूमिं प्रपेदिरे ।
भावार्थ
तदनन्तर उस केकयराजकुमारीने अपने विचित्र पुष्पहारों और दिव्य आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया । वे सारे आभूषण धरतीपर यत्र-तत्र पड़े थे ॥ ६½ ॥
तया तान्यपविद्धानि माल्यान्याभरणानि च ॥ ७ ॥ अशोभयन्त वसुधां नक्षत्राणि यथा नभः ।
भावार्थ
जैसे छिटके हुए तारे आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार फेंके हुए वे पुष्पहार और आभूषण वहाँ भूमिकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ७½ ॥
क्रोधागारे च पतिता सा बभौ मलिनाम्बरा ॥ ८ ॥ एकवेणीं दृढां बद्ध्वा गतसत्त्वेव किन्नरी ।
भावार्थ
मलिन वस्त्र पहनकर और सारे केशोंको दृढ़तापूर्वक एक ही वेणीमें बाँधकर कोपभवनमें पड़ी हुई कैकेयी बलहीन अथवा अचेत हुई किन्नरीके समान जान पड़ती थी ॥ ८½ ॥
आज्ञाप्य तु महाराजो राघवस्याभिषेचनम् ॥ ९ ॥ उपस्थानमनुज्ञाप्य प्रविवेश निवेशनम् ।
भावार्थ
उधर महाराज दशरथ मन्त्री आदिको श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारीके लिये आज्ञा दे सबको यथासमय उपस्थित होनेके लिये कहकर रनिवासमें गये ॥ ९½ ॥
अद्य रामाभिषेको वै प्रसिद्ध इति जज्ञिवान् ॥ १० ॥ प्रियार्हां प्रियमाख्यातुं विवेशान्तःपुरं वशी ।
भावार्थ
उन्होंने सोचा—आज ही श्रीरामके अभिषेककी बात प्रसिद्ध की गयी है, इसलिये यह समाचार अभी किसी रानीको नहीं मालूम हुआ होगा; ऐसा विचारकर जितेन्द्रिय राजा दशरथने अपनी प्यारी रानीको यह प्रिय संवाद सुनानेके लिये अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ १०½ ॥
स कैकेय्या गृहं श्रेष्ठं प्रविवेश महायशाः ॥ ११ ॥ पाण्डुराभ्रमिवाकाशं राहुयुक्तं निशाकरः ।
भावार्थ
उन महायशस्वी नरेशने पहले कैकेयीके श्रेष्ठ भवनमें प्रवेश किया, मानो श्वेत बादलोंसे युक्त राहुयुक्त आकाशमें चन्द्रमाने पदार्पण किया हो ॥ ११½ ॥
शुकबर्हिसमायुक्तं क्रौञ्चहंसरुतायुतम् ॥ १२ ॥ वादित्ररवसंघुष्टं कुब्जावामनिकायुतम् । लतागृहैश्चित्रगृहैश्चम्पकाशोकशोभितैः ॥ १३ ॥
भावार्थ
उस भवनमें तोते, मोर, क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी कलरव कर रहे थे, वहाँ वाद्योंका मधुर घोष गूँज रहा था, बहुत-सी कुब्जा और बौनी दासियाँ भरी हुई थीं, चम्पा और अशोकसे सुशोभित बहुत-से लताभवन और चित्रमन्दिर उस महलकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
दान्तराजतसौवर्णवेदिकाभिः समायुतम् । नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्वापीभिरुपशोभितम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
हाथीदाँत, चाँदी और सोनेकी बनी हुई वेदियोंसे संयुक्त उस भवनको नित्य फूलने-फलनेवाले वृक्ष और बहुत-सी बावड़ियाँ सुशोभित कर रही थीं ॥ १४ ॥
दान्तराजतसौवर्णैः संवृतं परमासनैः । विविधैरन्नपानैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि ॥ १५ ॥ उपपन्नं महार्हैश्च भूषणैस्त्रिदिवोपमम् ।
भावार्थ
उसमें हाथीदाँत, चाँदी और सोनेके बने हुए उत्तम सिंहासन रखे गये थे । नाना प्रकारके अन्न, पान और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे वह भवन भरा-पूरा था । बहुमूल्य आभूषणोंसे सम्पन्न कैकेयीका वह भवन स्वर्गके समान शोभा पा रहा था ॥ १५½ ॥
स प्रविश्य महाराजः स्वमन्तःपुरमृद्धिमत् ॥ १६ ॥ न ददर्श स्त्रियं राजा कैकेयीं शयनोत्तमे ।
भावार्थ
अपने उस समृद्धिशाली अन्तःपुरमें प्रवेश करके महाराज राजा दशरथने वहाँकी उत्तम शय्यापर रानी कैकेयीको नहीं देखा ॥ १६½ ॥
स कामबलसंयुक्तो रत्यर्थी मनुजाधिपः ॥ १७ ॥ अपश्यन् दयितां भार्यां पप्रच्छ विषसाद च ।
भावार्थ
कामबलसे संयुक्त वे नरेश रानीकी प्रसन्नता बढ़ानेकी अभिलाषासे भीतर गये थे । वहाँ अपनी प्यारी पत्नीको न देखकर उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ और वे उनके विषयमें पूछ-ताछ करने लगे ॥ १७½ ॥
नहि तस्य पुरा देवी तां वेलामत्यवर्तत ॥ १८ ॥ न च राजा गृहं शून्यं प्रविवेश कदाचन । ततो गृहगतो राजा कैकेयीं पर्यपृच्छत ॥ १९ ॥ यथापुरमविज्ञाय स्वार्थलिप्सुमपण्डिताम् ।
भावार्थ
इससे पहले रानी कैकेयी राजाके आगमनकी उस वेलामें कहीं अन्यत्र नहीं जाती थीं, राजाने कभी सूने भवनमें प्रवेश नहीं किया था, इसीलिये वे घरमें आकर कैकेयीके बारेमें पूछने लगे । उन्हें यह मालूम नहीं था कि वह मूर्खा कोई स्वार्थ सिद्ध करना चाहती है, अतः उन्होंने पहलेकी ही भाँति प्रति-हारीसे उसके विषयमें पूछा ॥ १८-१९½ ॥
प्रतिहारी त्वथोवाच संत्रस्ता तु कृताञ्जलिः ॥ २० ॥ देव देवी भृशं क्रुद्धा क्रोधागारमभिद्रुता ।
भावार्थ
प्रतिहारी बहुत डरी हुई थी । उसने हाथ जोड़कर कहा—‘देव ! देवी कैकेयी अत्यन्त कुपित हो कोपभवनकी ओर दौड़ी गयी हैं’ ॥ २०½ ॥
प्रतीहार्या वचः श्रुत्वा राजा परमदुर्मनाः ॥ २१ ॥ विषसाद पुनर्भूयो लुलितव्याकुलेन्द्रियः ।
भावार्थ
प्रतिहारीकी यह बात सुनकर राजाका मन बहुत उदास हो गया, उनकी इन्द्रियाँ चञ्चल एवं व्याकुल हो उठीं और वे पुनः अधिक विषाद करने लगे ॥ २१½ ॥
तत्र तां पतितां भूमौ शयानामतथोचिताम् ॥ २२ ॥ प्रतप्त इव दुःखेन सोऽपश्यज्जगतीपतिः ।
भावार्थ
कोपभवनमें वह भूमिपर पड़ी थी और इस तरह लेटी हुई थी, जो उसके लिये योग्य नहीं था । राजाने दुःखके कारण संतप्त-से होकर उसे इस अवस्थामें देखा ॥ २२½ ॥
स वृद्धस्तरुणीं भार्यां प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् ॥ २३ ॥ अपापः पापसंकल्पां ददर्श धरणीतले । लतामिव विनिष्कृत्तां पतितां देवतामिव ॥ २४ ॥
भावार्थ
राजा बूढ़े थे और उनकी वह पत्नी तरुणी थी, अतः वे उसे अपने प्राणोंसे भी बढ़कर मानते थे । राजाके मनमें कोई पाप नहीं था; परंतु कैकेयी अपने मनमें पापपूर्ण संकल्प लिये हुए थी । उन्होंने उसे कटी हुई लताकी भाँति पृथ्वीपर पड़ी देखा—मानो कोई देवाङ्गना स्वर्गसे भूतलपर गिर पड़ी हो ॥ २३-२४ ॥
किन्नरीमिव निर्धूतां च्युतामप्सरसं यथा । मायामिव परिभ्रष्टां हरिणीमिव संयताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
वह स्वर्गभ्रष्ट किन्नरी, देवलोकसे च्युत हुई अप्सरा, लक्ष्यभ्रष्ट माया और जालमें बँधी हुई हरिणीके समान जान पड़ती थी ॥ २५ ॥
करेणुमिव दिग्धेन विद्धां मृगयुना वने । महागज इवारण्ये स्नेहात् परमदुःखिताम् ॥ २६ ॥ परिमृज्य च पाणिभ्यामभिसंत्रस्तचेतनः । कामी कमलपत्राक्षीमुवाच वनितामिदम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
जैसे कोई महान् गजराज वनमें व्याधके द्वारा विषलिप्त बाणसे विद्ध होकर गिरी हुई अत्यन्त दुःखित हथिनीका स्नेहवश स्पर्श करता है, उसी प्रकार कामी राजा दशरथने महान् दुःखमें पड़ी हुई कमलनयनी भार्या कैकेयीका स्नेहपूर्वक दोनों हाथोंसे स्पर्श किया । उस समय उनके मनमें सब ओरसे यह भय समा गया था कि न जाने यह क्या कहेगी और क्या करेंगी ? वे उसके अङ्गोंपर हाथ फेरते हुए उससे इस प्रकार बोले—॥ २६-२७ ॥
न तेऽहमभिजानामि क्रोधमात्मनि संश्रितम् । देवि केनाभियुक्तासि केन वासि विमानिता ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘देवि ! तुम्हारा क्रोध मुझपर है, ऐसा तो मुझे विश्वास नहीं होता । फिर किसने तुम्हारा तिरस्कार किया है ? किसके द्वारा तुम्हारी निन्दा की गयी है ?॥ २८ ॥
यदिदं मम दुःखाय शेषे कल्याणि पांसुषु । भूमौ शेषे किमर्थं त्वं मयि कल्याणचेतसि ॥ २९ ॥ भूतोपहतचित्तेव मम चित्तप्रमाथिनि ।
भावार्थ
‘कल्याणि ! तुम जो इस तरह मुझे दुःख देनेके लिये धूलमें लोट रही हो, इसका क्या कारण है ? मेरे चित्तको मथ डालनेवाली सुन्दरी ! मेरे मनमें तो सदा तुम्हारे कल्याणकी ही भावना रहती है । फिर मेरे रहते हुए तुम किस लिये धरतीपर सो रही हो ? जान पड़ता है तुम्हारे चित्तपर किसी पिशाचने अधिकार कर लिया है ॥ २९½ ॥
सन्ति मे कुशला वैद्यास्त्वभितुष्टाश्च सर्वशः ॥ ३० ॥ सुखितां त्वां करिष्यन्ति व्याधिमाचक्ष्व भामिनि ।
भावार्थ
‘भामिनि ! तुम अपना रोग बताओ । मेरे यहाँ बहुत-से चिकित्साकुशल वैद्य हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकारसे संतुष्ट कर रक्खा है, वे तुम्हें सुखी कर देंगे ॥ ३०½ ॥
कस्य वापि प्रियं कार्यं केन वा विप्रियं कृतम् ॥ ३१ ॥ कः प्रियं लभतामद्य को वा सुमहदप्रियम् ।
भावार्थ
‘अथवा कहो, आज किसका प्रिय करना है ? या किसने तुम्हारा अप्रिय किया है ? तुम्हारे किस उपकारीको आज प्रिय मनोरथ प्राप्त हो अथवा किस अपकारीको अत्यन्त अप्रिय— कठोर दण्ड दिया जाय ? ॥ ३१½ ॥
मा रौत्सीर्मा च कार्षीस्त्वं देवि सम्परिशोषणम् ॥ ३२॥ अवध्यो वध्यतां को वा वध्यः को वा विमुच्यताम् । दरिद्रः को भवेदाढ्यो द्रव्यवान् वाप्यकिंचनः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! तुम न रोओ, अपनी देहको न सुखाओ; आज तुम्हारी इच्छाके अनुसार किस अवध्यका वध किया जाय ? अथवा किस प्राणदण्ड पाने योग्य अपराधीको भी मुक्त कर दिया जाय ? किस दरिद्रको धनवान् और किस धनवान्को कंगाल बना दिया जाय ? ॥ ३२-३३ ॥
अहं च हि मदीयाश्च सर्वे तव वशानुगाः । न ते कंचिद्भिप्रायं व्याहन्तुमहमुत्सहे ॥ ३४ ॥ आत्मनो जीवितेनापि ब्रूहि यन्मनसि स्थितम् ।
भावार्थ
‘मैं और मेरे सभी सेवक तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं । तुम्हारे किसी भी मनोरथको मैं भंग नहीं कर सकता—उसे पूरा करके ही रहूँगा, चाहे उसके लिये मुझे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें; अतः तुम्हारे मनमें जो कुछ हो, उसे स्पष्ट कहो ॥ ३४½ ॥
बलमात्मनि जानन्ती न मां शङ्कितुमर्हसि ॥ ३५ ॥ करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे ।
भावार्थ
‘अपने बलको जानते हुए भी तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये । मैं अपने सत्कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ, जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो, वही करूँगा ॥ ३५½ ॥
यावदावर्तते चक्रं तावती मे वसुंधरा ॥ ३६ ॥ द्राविडाः सिन्धुसौवीराः सौराष्ट्रा दक्षिणापथाः । वङ्गाङ्गमगधा मत्स्याः समृद्धाः काशिकोसलाः ॥ ३७॥ तत्र जातं बहु द्रव्यं धनधान्यमजाविकम् । ततो वृणीष्व कैकेयि यद् यत् त्वं मनसेच्छसि ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘जहाँतक सूर्यका चक्र घूमता है, वहाँतक सारी पृथ्वी मेरे अधिकारमें है । द्रविड, सिन्धु-सौवीर, सौराष्ट्र, दक्षिण भारतके सारे प्रदेश तथा अङ्ग, वङ्ग, मगध, मत्स्य, काशी और कोसल—इन सभी समृद्धिशाली देशोंपर मेरा आधिपत्य है ॥ ‘केकयराजनन्दिनि ! उनमें पैदा होनेवाले भाँति-भाँतिके द्रव्य, धन-धान्य और बकरी—भेड़ आदि जो भी तुम मनसे लेना चाहती हो, वह मुझसे माँग लो ॥ ३८ ॥
किमायासेन ते भीरु उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शोभने । तत्त्वं मे ब्रूहि कैकेयि यतस्ते भयमागतम् । तत् ते व्यपनयिष्यामि नीहारमिव रश्मिवान् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! इतना क्लेश उठाने—प्रयास करनेकी क्या आवश्यकता है ? शोभने ! उठो, उठो । कैकेयि ! ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किससे कौन-सा भय प्राप्त हुआ है ? जैसे अंशुमाली सूर्य कुहरा दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारे भयका सर्वथा निवारण कर दूँगा’ ॥ ३९ ॥
तथोक्ता सा समाश्वस्ता वक्तुकामा तदप्रियम् । परिपीडयितुं भूयो भर्तारमुपचक्रमे ॥ ४० ॥
भावार्थ
राजाके ऐसा कहनेपर कैकेयीको कुछ सान्त्वना मिली । अब उसे अपने स्वामीसे वह अप्रिय बात कहनेकी इच्छा हुई । उसने पतिको और अधिक पीड़ा देनेकी तैयारी की ॥
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