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अरण्यकाण्ड, सर्ग 9

सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम् । हृदयया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

सुतीक्ष्णकी आज्ञा लेकर वनकी ओर प्रस्थित हुए अपने स्वामी रघुकुलनन्दन श्रीरामसे सीताने स्नेहभरी मनोहर वाणीमें इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

अधर्मं तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान् । निवृत्तेन च शक्योऽयं व्यसनात् कामजादिह ॥ २ ॥

भावार्थ

‘आर्यपुत्र ! यद्यपि आप महान् पुरुष हैं तथापि अत्यन्त सूक्ष्म विधिमें विचार करनेपर आप अधर्मको प्राप्त हो रहे हैं । जब कामजनित व्यसनसे आप सर्वथा निवृत्त हैं, तब यहाँ इस अधर्मसे भी बच सकते हैं ॥ २ ॥

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत । मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥ ३ ॥ परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता । मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘इस जगत्में कामसे उत्पन्न होनेवाले तीन ही व्यसन होते हैं । मिथ्याभाषण बहुत बड़ा व्यसन है, किंतु उससे भी भारी दो व्यसन और हैं—परस्त्रीगमन और बिना वैरके ही दूसरोंके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव । रघुनन्दन ! इनमेंसे मिथ्या-भाषणरूप व्यसन तो न आपमें कभी हुआ है और न आगे होगा ही ॥ ३-४ ॥

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम् । तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन ॥ ५ ॥ मनस्यपि तथा राम न चैनद् विद्यते क्वचित् । स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज ॥ ६ ॥ धर्मिष्ठः सत्यसंधश्च पितुर्निर्देशकारकः । त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ७ ॥ तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः । तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘परस्त्रीविषयक अभिलाषा तो आपको हो ही कैसे सकती है ? नरेन्द्र ! धर्मका नाश करनेवाली यह कुत्सित इच्छा न आपके मनमें कभी हुई थी, न है और न भविष्यमें कभी होनेकी सम्भावना ही है । राजकुमार श्रीराम ! यह दोष तो आपके मनमें भी कभी उदित नहीं हुआ है । ( फिर वाणी और क्रियामें कैसे आ सकता है ? ) आप सदा ही अपनी धर्मपत्नीमें अनुरक्त रहनेवाले, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ तथा पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं । आपमें धर्म और सत्य दोनोंकी स्थिति है । आपमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ‘महाबाहो ! जो लोग जितेन्द्रिय हैं, वे सदा सत्य और धर्मको पूर्णरूपसे धारण कर सकते हैं । शुभदर्शी महापुरुष ! आपकी जितेन्द्रियताको मैं अच्छी तरह जानती हूँ ( इसीलिये मुझे विश्वास है कि आपमें पूर्वोक्त दोनों दोष कदापि नहीं रह सकते ) ॥ ८ ॥

तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम् । निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘परंतु दूसरोंके प्राणोंकी हिंसारूप जो यह तीसरा भयंकर दोष है, उसे लोग मोहवश बिना वैर-विरोधके भी किया करते हैं । वही दोष आपके सामने भी उपस्थित है ॥ ९ ॥

प्रतिज्ञातस्त्वया वीर दण्डकारण्यवासिनाम् । ऋषीणां रक्षणार्थाय वधः संयति रक्षसाम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘वीर ! आपने दण्डकारण्यनिवासी ऋषियोंकी रक्षाके लिये युद्धमें राक्षसोंका वध करनेकी प्रतिज्ञा की है ॥ १० ॥

एतन्निमित्तं च वनं दण्डका इति विश्रुतम् । प्रस्थितस्त्वं सह भ्रात्रा धृतबाणशरासनः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘इसीके लिये आप भाईके साथ धनुष-बाण लेकर दण्डकारण्यके नामसे विख्यात वनकी ओर प्रस्थित हुए हैं ॥११॥

ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः । त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ।१२।

भावार्थ

‘अतः आपको इस घोर कर्मके लिये प्रस्थित हुआ देख मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल हो उठा है । आपके प्रतिज्ञा-पालनरूप व्रतका विचार करके मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि कैसे आपका कल्याण हो ? ॥ १२ ॥

नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति । कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘वीर ! मुझे इस समय आपका दण्डकारण्यमें जाना अच्छा नहीं लगता है । इसका क्या कारण है—यह बता रही हूँ; आप मेरे मुँहसे सुनिये ॥ १३ ॥

त्वं हि बाणधनुष्पाणिर्भ्रात्रा सह वनं गतः । दृष्ट्वा वनचरान् सर्वान् कच्चित् कुर्याः शरव्ययम् ॥ क्षत्रियाणामिह धनुर्हुताशस्येन्धनानि च । समीपतः स्थितं तेजोबलमुच्छ्रयते भृशम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘आप हाथमें धनुष-बाण लेकर अपने भाईके साथ वनमें आये हैं । सम्भव है, समस्त वनचारी राक्षसोंको देखकर कदाचित् आप उनके प्रति अपने बाणोंका प्रयोग कर बैठें ॥ ‘जैसे आगके समीप रखे हुए ईंधन उसके तेजरूप बलको अत्यन्त उद्दीप्त कर देते हैं, उसी प्रकार जहाँ क्षत्रियोंके पास धनुष हो तो वह उनके बल और प्रतापको उद्बोधित कर देता है ॥ १५ ॥

पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवाञ्छुचिः । कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! पूर्वकालकी बात है, किसी पवित्र वनमें, जहाँ मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे रहते थे, एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे ॥ १६ ॥

तस्यैव तपसो विघ्नं कर्तुमिन्द्रः शचीपतिः । खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘उन्हींकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये शचीपति इन्द्र किसी योद्धाका रूप धारण करके हाथमें तलवार लिये एक दिन उनके आश्रमपर आये ॥ १७ ॥

तस्मिंस्तदाश्रमपदे निहितः खड्ग उत्तमः । स न्यासविधिना दत्तः पुण्ये तपसि तिष्ठतः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘उन्होंने मुनिके आश्रममें अपना उत्तम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्यामें लगे हुए मुनिको धरोहरके रूपमें वह खड्ग दे दिया ॥ १८ ॥

स तच्छस्त्रमनुप्राप्य न्यासरक्षणतत्परः । वने तु विचरत्येव रक्षन् प्रत्ययमात्मनः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘उस शस्त्रको पाकर मुनि उस धरोहरकी रक्षामें लग गये । वे अपने विश्वासकी रक्षाके लिये वनमें विचरते समय भी उसे साथ रखते थे ॥ १९ ॥

यत्र गच्छन्युपादातुं मूलानि च फलानि च । न विना याति तं खड्गं न्यासरक्षणतत्परः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘धरोहरकी रक्षामें तत्पर रहनेवाले वे मुनि फल-मूल लानेके लिये जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्गको साथ लिये बिना नहीं जाते थे ॥ २० ॥

नित्यं शस्त्रं परिवहन् क्रमेण स तपोधनः । चकार रौद्रीं स्वां बुद्धिं त्यक्त्वा तपसि निश्चयम् ॥

भावार्थ

‘तप ही जिनका धन था, उन मुनिने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहनेके कारण क्रमशः तपस्याका निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धिको क्रूरतापूर्ण बना लिया ॥ २१ ॥

ततः स रौद्राभिरतः प्रमत्तोऽधर्मकर्षितः । तस्य शस्त्रस्य संवासाज्जगाम नरकं मुनिः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘फिर तो अधर्मने उन्हें आकृष्ट कर लिया । वे मुनि प्रमादवश रौद्र-कर्ममें तत्पर हो गये और उस शस्त्रके सहवास-से उन्हें नरकमें जाना पड़ा ॥ २२ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम् । अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते ॥ २३ ॥ स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये । न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया ॥ २४ ॥ बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान् । अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार शस्त्रका संयोग होनेके कारण पूर्वकालमें उन तपस्वी मुनिको ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी । जैसे आगका संयोग ईंधनोंको जलानेका कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रोंका संयोग शस्त्रधारीके हृदयमें विकारका उत्पादक कहा गया है ॥ ‘मेरे मनमें आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटनाकी याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैरके ही दण्डकारण्यवासी राक्षसोंके वधका विचार नहीं करना चाहिये । वीरवर ! बिना अपराधके ही किसीको मारना संसारके लोग अच्छा नहीं समझेंगे ॥२४-२५॥

क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम् । धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम् ॥ २६ ॥ क्क च शास्त्रं क्क च वनं क्क च क्षात्रं तपः क्क च । व्याविद्धमिदमस्माभिर्देशधर्मस्तु पूज्यताम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले क्षत्रिय वीरोंके लिये वनमें, धनुष धारण करनेका इतना ही प्रयोजन है कि वे संकटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करें ॥ ‘कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास ! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप—ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं । अतः हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये ( इस समय हम तपोवन-रूप देशमें निवास करते हैं, अतः यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है ) ॥ २७ ॥

कदर्यकलुषा बुद्धिर्जायते शस्त्रसेवनात् । पुनर्गत्वा त्वयोध्यायां क्षत्रधर्मं चरिष्यसि ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘केवल शस्त्रका सेवन करनेसे मनुष्यकी बुद्धि कृपण पुरुषोंके समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्यामें चलनेपर ही पुनः क्षात्रधर्मका अनुष्ठान कीजियेगा ॥ २८ ॥

अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम । यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः ॥२९॥

भावार्थ

‘राज्य त्यागकर वनमें आ जानेपर यदि आप मुनि-वृत्तिसे ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुरको अक्षय प्रसन्नता होगी ॥ २९ ॥

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् । धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘धर्मसे अर्थ प्राप्त होता है, धर्मसे सुखका उदय होता है और धर्मसे ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसारमें धर्म ही सार है ॥ ३० ॥

आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः । प्राप्यते निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभते सुखम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है ॥ ३१ ॥

नित्यं शुचिमतिः सौम्य चर धर्मं तपोवने । सर्वं तु विदितं तुभ्यं त्रैलोक्यामपि तत्त्वतः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवनमें धर्मका अनुष्ठान कीजिये । त्रिलोकीमें जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थरूपसे विदित ही है ॥ ३२ ॥

स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः । विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘मैंने नारीजातिकी स्वाभाविक चपलताके कारण ही आपकी सेवामें ये बातें निवेदन कर दी हैं । वास्तवमें आपको धर्मका उपदेश करनेमें कौन समर्थ है ! आप इस विषयमें अपने छोटे भाईके साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें । फिर आपको जो ठीक जँचे, उसे ही शीघ्रतापूर्वक करें’ ॥ ३३ ॥

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