अरण्यकाण्ड, सर्ग 10
वाक्यमेतत् तु वैदेह्या व्याहृतं भर्तृभक्तया । श्रुत्वा धर्मे स्थितो रामः प्रत्युवाचाथ जानकीम् ॥१॥
भावार्थ
अपने स्वामीके प्रति भक्ति रखनेवाली विदेहकुमारी सीताकी कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने जानकीको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥
हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः । कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे ॥ २ ॥
भावार्थ
‘देवि ! धर्मको जाननेवाली जनककिशोरी ! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हितकी बात कही है । क्षत्रियोंके कुलधर्मका उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है ॥ २ ॥
किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः । क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘देवि ! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रियलोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसीको दुखी होकर हाहाकार न करना पड़े ( यदि कोई दुःख या संकटमें पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय ) ॥ ३ ॥
ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः । मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सीते ! दण्डकारण्यमें रहकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे मुनि बहुत दुखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए ॥ ४ ॥
वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः । न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः ॥ ५ ॥ भक्ष्यन्ते राक्षसैर्भीमैर्नरमांसोपजीविभिः ।
भावार्थ
‘भीरु ! सदा ही वनमें रहकर फल-मूलका आहार करनेवाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसोंके कारण कभी सुख नहीं पाते हैं । मनुष्योंके मांससे जीवननिर्वाह करनेवाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं ॥ ५½ ॥
ते भक्ष्यमाणा मुनयो दण्डकारण्यवासिनः ॥ ६ ॥ अस्मानभ्यवपद्येति मामूचुर्द्विजसत्तमाः ।
भावार्थ
‘उन राक्षसोंके ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगोंके पास आकर मुझसे बोले—‘प्रभो ! हमपर अनुग्रह कीजिये’ ॥ ६½ ॥
मया तु वचनं श्रुत्वा तेषामेवं मुखाच्च्युतम् ॥ ७ ॥ कृत्वा वचनशुश्रूषां वाक्यमेतदुदाहृतम् ।
भावार्थ
‘उनके मुखसे निकली हुई इस प्रकार रक्षाकी पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालनरूपी सेवाका विचार मनमें लेकर मैंने उनसे यह बात कही ॥ ७½ ॥
प्रसीदन्तु भवन्तो मे ह्रीरेषा तु ममातुला ॥ ८ ॥ यदीदृशैरहं विप्रैरुपस्थेयैरुपस्थितः । किं करोमीति च मया व्याहृतं द्विजसन्निधौ ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘महर्षियो ! आप-जैसे ब्राह्मणोंकी सेवामें मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षाके लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जाकी बात है; अतः आप प्रसन्न हों । बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ ?’ यह बात मैंने उन ब्राह्मणोंके सामने कही ॥ ८–९ ॥
सर्वैरेव समागम्य वागियं समुदाहृता । राक्षसैर्दण्डकारण्ये बहुभिः कामरूपिभिः ॥ १० ॥ अर्दिताः स्म भृशं राम भवान् नस्तत्र रक्षतु ।
भावार्थ
‘तब उन सभीने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनोंमें प्रकट किया—‘श्रीराम ! दण्डकारण्यमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत-से राक्षस रहते हैं । उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अतः वहाँ उनके भयसे आप हमारी रक्षा करें ॥ १०½ ॥
होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ ॥ ११ ॥ धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसाः पिशिताशनाः ।
भावार्थ
‘निष्पाप रघुनन्दन ! अग्निहोत्रका समय आनेपर तथा पर्वके अवसरोंपर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें घर दबाते हैं ॥ ११½ ॥
राक्षसैर्धर्षितानां च तापसानां तपस्विनाम् ॥ १२ ॥ गतिं मृगयमाणानां भवान् नः परमा गतिः ।
भावार्थ
‘राक्षसोंद्वारा आक्रान्त होनेवाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अतः आप ही हमारे परम आश्रय हों ॥ १२½ ॥
कामं तपःप्रभावेण शक्ता हन्तुं निशाचरान् ॥ १३ ॥ चिरार्जितं न चेच्छामस्तपः खण्डयितुं वयम् । बहुविघ्नं तपो नित्यं दुश्चरं चैव राघव ॥ १४ ॥ तेन शापं न मुञ्चामो भक्ष्यमाणाश्च राक्षसैः । तदर्द्यमानान् रक्षोभिर्दण्डकारण्यवासिभिः ॥ १५ ॥ रक्ष नस्त्वं सह भ्रात्रा त्वन्नाथा हि वयं वने ।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! यद्यपि हम तपस्याके प्रभावसे इच्छानुसार इन राक्षसोंका वध करनेमें समर्थ हैं तथापि चिरकालसे उपार्जित किये हुए तपको खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तपमें सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है ॥ ‘यही कारण है कि राक्षसोंके ग्रास बन जानेपर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरोंसे पीड़ित हुए हम तापसोंकी भाईसहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वनमें अब आप ही हमारे रक्षक हैं’ ॥ १५½ ॥
मया चैतद्वचः श्रुत्वा कात्स्न्र्येन परिपालनम् ॥ १६ ॥ ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे ।
भावार्थ
‘जनकनन्दिनि ! दण्डकारण्यमें ऋषियोंकी यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूपसे उनकी रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की है ॥ १६½ ॥
संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥ १७ ॥ मुनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा ।
भावार्थ
‘मुनियोंके सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी इस प्रतिज्ञाको मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्यका पालन मुझे सदा ही प्रिय है ॥ १७½ ॥
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ॥ १८ ॥ न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ।
भावार्थ
‘सीते ! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मणका भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञाको, विशेषतः ब्राह्मणोंके लिये की गयी प्रतिज्ञाको मैं कदापि नहीं तोड़ सकता ॥ १८½ ॥
तद्वश्यं मया कार्यमृषीणां परिपालनम् ॥ १९ ॥ अनुक्तेनापि वैदेहि प्रतिज्ञाय कथं पुनः।
भावार्थ
‘इसलिये ऋषियोंकी रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है । विदेहनन्दिनि ! ऋषियोंके बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षासे कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ ॥ १९½ ॥
मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वचः ॥ २० ॥ परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते ।
भावार्थ
‘सीते ! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता ॥ २०½ ॥
सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने । सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘शोभने ! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुलके भी सर्वथा अनुरूप है । तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो’ ॥ २१ ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा सीतां प्रियां मैथिलराजपुत्रीम् । रामो धनुष्मान् सह लक्ष्मणेन जगाम रम्याणि तपोवनानि ॥ २२ ॥
भावार्थ
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीतासे ऐसा वचन कहकर हाथमें धनुष ले लक्ष्मणके साथ रमणीय तपोवनोंमें विचरण करने लगे ॥२२॥
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