अरण्यकाण्ड, सर्ग 46
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः । स विकाङ्क्षन् भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव ॥ १ ॥
भावार्थ
सीताके कठोर वचन कहनेपर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीरामसे मिलनेकी विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः । अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक् ॥ २ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणके चले जानेपर रावणको मौका मिल गया, अतः वह संन्यासीका वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीताके समीप गया ॥ २ ॥
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही । वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू ॥ ३ ॥
भावार्थ
वह शरीरपर साफ-सुथरा गेरुए रंगका वस्त्र लपेटे हुए था । उसके मस्तकपर शिखा, हाथमें छाता और पैरोंमें जूते थे । उसने बायें कंधेपर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था ॥ ३ ॥
परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत । तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने ॥ ४ ॥
भावार्थ
अत्यन्त बलवान् रावण उस वनमें परिव्राजकका रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओंसे रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीताके पास गया ॥ ४ ॥
रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः । तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम् ॥ ५ ॥ रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुणः ।
भावार्थ
जैसे सूर्य और चन्द्रमासे हीन हुई संध्याके पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीताके निकट गया । तदनन्तर जैसे चन्द्रमासे रहित हुई रोहिणीपर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चरकी दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावणने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारीकी ओर देखा ॥ ५½ ॥
तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमाः ॥ ६ ॥ संदृश्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः । शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम् ॥ ७ ॥ स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी ।
भावार्थ
उस भयंकर पापाचारीको आया देख जनस्थानके वृक्षोंने हिलना बंद कर दिया और हवाका वेग रुक गया । लाल नेत्रोंवाले रावणको अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गतिसे बहनेवाली गोदावरी नदी भयके मारे धीरे-धीरे बहने लगी ॥ ६–७½ ॥
रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे ॥ ८ ॥ उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः ।
भावार्थ
रामसे बदला लेनेका अवसर ढूँढ़नेवाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूपसे विदेहकुमारी सीताके पास पहुँचा ॥ ८½ ॥
अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम् ॥ ९ ॥ अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः । सहसा भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः ॥ १० ॥ अतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेहीं रामपत्नीं यशस्विनीम् ।
भावार्थ
उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पतिके लिये शोक और चिन्तामें डूबी हुई थीं । उसी अवस्थामें अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्राके सामने जा पहुँचा हो ॥ जैसे कुआँ तिनकोंसे ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूपसे अपनी अभव्यताको छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुँचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेहीको देखकर खड़ा हो गया ॥ १०३ ॥
तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य च तदा पत्नीं रामस्य रावणः ॥ ११ ॥ शुभां रुचिरदन्तोष्ठीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीताको देखने लगा । वे बड़ी सुन्दरी थीं । उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको छीने लेता था । वे पर्णशालामें बैठी हुई शोकसे पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं ॥ ११-१२ ॥
स तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम् । अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः ॥ १३ ॥
भावार्थ
वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बरसे सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारीके सामने गया ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन् । अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उन्हें देखते ही कामदेवके बाणोंसे घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्रका उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थानमें विनीतभावसे उनसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ १४ ॥
तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम् । विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह ॥ १५ ॥
भावार्थ
त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीरसे कमलसे रहित कमलालया लक्ष्मीकी भाँति शोभा पा रही थीं । रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला–॥ १५ ॥
रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि । कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव च बिभ्रती ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उत्तम सुवर्णकी-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाली सुन्दरी ! ( तुम कौन हो ? ) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलोंके समान हैं, अतः तुम पद्मिनी ( पुष्करिणी ) की भाँति कमलोंकी सुन्दर-सी माला धारण करती हो ॥ १६ ॥
ह्रीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने । भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘शुभानने ! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो ? अथवा वरारोहे ! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाली कामदेवकी पत्नी रति तो नहीं हो ? ॥ १७ ॥
समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव । विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके ॥ १८ ॥ विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ ।
भावार्थ
तुम्हारे दाँत बराबर हैं । उनके अग्रभाग कुन्दकी कलियोंके समान शोभा पाते हैं । वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं । तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं । उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं । कटिका अग्रभाग विशाल एवं मांसल है । दोनों जाँघें हाथीकी सूँड़के समान शोभा पाती हैं ॥ १८३ ॥
एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ ॥ १९ ॥ पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ । मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फलके समान आकारवाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥ १९-२० ॥
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि । मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी ! तुम अपने रूप-सौन्दर्यसे मेरे मनको वैसे ही हरे लेती हो; जैसे नदी जलके द्वारा अपने तटका अपहरण करती है ॥ २१ ॥
करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि । नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किंनरी ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठीमें आ जाय । केश चिकने और मनोहर हैं । दोनों स्तन एक-दूसरेसे सटे हुए हैं । सुन्दरी ! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जातिकी स्त्रियोंमें भी कोई तुम-जैसी नहीं है ॥ २२ ॥
नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले । रूपमग्र्यं च लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते ॥ २३ ॥ इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे । सा प्रतिक्राम भद्रं ते न त्वं वस्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘पृथ्वीपर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आजसे पहले कभी देखी ही नहीं थी । कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकोंमें सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वनमें निवास ! ये सब बातें ध्यानमें आते ही मेरे मनको मथे डालती हैं । तुम्हारा कल्याण हो । यहाँसे चली जाओ । तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो ॥ २३-२४ ॥
राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम् । प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च ॥ २५ ॥ सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया ।
भावार्थ
‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भयंकर राक्षसोंके रहनेकी जगह है । तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनोंमें निवास करना और विचरना चाहिये ॥ २५½ ॥
वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं च शोभने ॥ २६ ॥ भर्तारं च वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे ।
भावार्थ
‘शोभने ! वही पुष्प श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोगमें आये । कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरी ! मैं उसीको श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो ॥ २६½ ॥
का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते ॥ २७ ॥ वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे ।
भावार्थ
‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि ! तुम कौन हो ? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओंसे सम्बन्ध रखनेवाली देवी जान पड़ती हो ॥ २७½ ॥
नेह गच्छन्ति गन्धर्वा न देवा न च किन्नराः ॥ २८ ॥ राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता ।
भावार्थ
‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं । यह राक्षसोंका निवासस्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयीं ? ॥ २८½ ॥
इह शाखामृगाः सिंहा द्वीपिव्याघ्रमृगा वृकाः ॥ २९ ॥ ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो न बिभ्यसे ।
भावार्थ
‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक ( गीध आदि पक्षी ) रहते हैं । तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है ? ॥ २९½ ॥
मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ३० ॥ कथमेका महारण्ये न बिभेषि वरानने ।
भावार्थ
‘वरानने ! इस विशाल वनके भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजोंके बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो ? ॥ ३०½ ॥
कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं च दण्डकान् ॥ ३१ ॥ एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान् ।
भावार्थ
‘कल्याणमयी देवि ! बताओ, तुम कौन हो ? किसकी हो ? और कहाँसे आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्यमें अकेली विचरण करती हो ?’ ॥ ३१½ ॥
इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना ॥ ३२ ॥ द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम् । सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वेषभूषासे महात्मा बनकर आये हुए रावणने जब विदेहकुमारी सीताकी इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मणवेषमें वहाँ पधारे हुए रावणको देखकर मैथिलीने अतिथि-सत्कारके लिये उपयोगी सभी सामग्रियोंद्वारा उसका पूजन किया ॥ ३२-३३ ॥
उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च । अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
पहले बैठनेके लिये आसन दे, पाद्य ( पैर धोनेके लिये जल ) निवेदन किया । तदनन्तर ऊपरसे सौम्य दिखायी देनेवाले उस अतिथिको भोजनके लिये निमन्त्रण देते हुए कहा–‘ब्रह्मन् ! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये’ ॥ ३४ ॥
द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम् । अशक्यमुद् द्वेष्टुमुपायदर्शना- न्न्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
वह ब्राह्मणके वेषमें आया था; कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था । ब्राह्मण-वेषमें आये हुए अतिथिकी उपेक्षा असम्भव थी । उसकी वेषभूषामें ब्राह्मणत्वका निश्चय करानेवाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूपमें आये हुए उस रावणको देखकर मैथिलीने ब्राह्मणके योग्य सत्कार करनेके लिये ही उसे निमन्त्रित किया ॥ ३५ ॥
इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यता- मिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति । इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वे बोलीं—‘ब्राह्मण ! यह चटाई है, इसपर इच्छानुसार बैठ जाइये । यह पैर धोनेके लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वनमें ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभावसे उसका उपभोग कीजिये’ ॥ ३६ ॥
निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं· नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम् । प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः समर्पयामास वधाय रावणः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘अतिथिके लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर सीताने जब उसे भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब रावणने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहनेवाली राजरानी मैथिलीकी ओर देखा और अपने ही वधके लिये उसने हठपूर्वक सीताका हरण करनेके निमित्त मनमें दृढ़ निश्चय कर लिया ॥ ३७ ॥
ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा। निरीक्षमाणा हरितं ददर्श त- न्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥ ३८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सीता शिकार खेलनेके लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतीक्षा करने लगीं । उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े ॥ ३८ ॥
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