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अरण्यकाण्ड, सर्ग 45

आर्तस्वरं तु तं भर्तुर्विज्ञाय सदृशं वने । उवाच लक्ष्मणं सीता गच्छ जानीहि राघवम् ॥ १ ॥

भावार्थ

उस समय वनमें जो आर्तनाद हुआ, उसे अपने पतिके स्वरसे मिलता-जुलता जान श्रीसीताजी लक्ष्मणसे बोलीं—‘भैया ! जाओ, श्रीरघुनाथजीकी सुधि लो—उनका समाचार जानो ॥ १ ॥

नहि मे जीवितं स्थाने हृदयं वावतिष्ठते । क्रोशतः परमार्तस्य श्रुतः शब्दो मया भृशम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘उन्होंने बड़े आर्तस्वरसे हमलोगोंको पुकारा है । मैंने उनका वह शब्द सुना है । वह बहुत उच्चस्वरसे बोला गया था । उसे सुनकर मेरे प्राण और मन अपने स्थानपर नहीं रह गये हैं—मैं घबरा उठी हूँ ॥ २ ॥

आक्रन्दमानं तु वने भ्रातरं त्रातुमर्हसि । तं क्षिप्रमभिधाव त्वं भ्रातरं शरणैषिणम् ॥ ३ ॥ रक्षसां वशमापन्नं सिंहानामिव गोवृषम् । न जगाम तथोक्तस्तु भ्रातुराज्ञाय शासनम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘तुम्हारे भाई वनमें आर्तनाद कर रहे हैं । वे कोई शरण—रक्षाका सहारा चाहते हैं । तुम उन्हें बचाओ । जल्दी ही अपने भाईके पास दौड़े हुए जाओ । जैसे कोई साँड़ सिंहोंके पंजेमें फँस गया हो, उसी प्रकार वे राक्षसोंके वशमें पड़ गये हैं, अतः जाओ ।’ सीताके ऐसा कहनेपर भी भाईके आदेशका विचार करके लक्ष्मण नहीं गये ॥ ३–४ ॥

तमुवाच ततस्तत्र क्षुभिता जनकात्मजा । सौमित्रे मित्ररूपेण भ्रातुस्त्वमसि शत्रुवत् ॥ ५ ॥ यस्त्वमस्यामवस्थायां भ्रातरं नाभिपद्यसे । इच्छसि त्वं विनश्यन्तं रामं लक्ष्मण मत्कृते ॥ ६ ॥

भावार्थ

उनके इस व्यवहारसे वहाँ जनककिशोरी सीता क्षुब्ध हो उठीं और उनसे इस प्रकार बोलीं—‘सुमित्राकुमार ! तुम मित्ररूपमें अपने भाईके शत्रु ही जान पड़ते हो, इसीलिये तुम इस संकटकी अवस्थामें भी भाईके पास नहीं पहुँच रहे हो । लक्ष्मण ! मैं जानती हूँ, तुम मुझपर अधिकार करनेके लिये इस समय श्रीरामका विनाश ही चाहते हो ॥ ५-६ ॥

लोभात्तु मत्कृते नूनं नानुगच्छसि राघवम् । व्यसनंते प्रियं मन्ये स्नेहो भ्रातरि नास्ति ते ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘मेरे लिये तुम्हारे मनमें लोभ हो गया है, निश्चय ही इसीलिये तुम श्रीरघुनाथजीके पीछे नहीं जा रहे हो । मैं समझती हूँ, श्रीरामका संकटमें पड़ना ही तुम्हें प्रिय है। तुम्हारे मनमें अपने भाईके प्रति स्नेह नहीं है ॥ ७ ॥

तेन तिष्ठसि विस्रब्धं तमपश्यन् महाद्युतिम् । किं हि संशयमापन्ने तस्मिन्निह मया भवेत् ॥ ८ ॥ कर्तव्यमिह तिष्ठन्त्या यत्प्रधानस्त्वमागतः ।

भावार्थ

‘यही कारण है कि तुम उन महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीको देखने न जाकर यहाँ निश्चिन्त खड़े हो । हाय ! जो मुख्यतः तुम्हारे सेव्य हैं, जिनकी रक्षा और सेवाके लिये तुम यहाँ आये हो, यदि उन्हींके प्राण संकटमें पड़ गये तो यहाँ मेरी रक्षासे क्या होगा ?’ ॥ ८½ ॥

एवं ब्रुवाणां वैदेहीं बाष्पशोकसमन्विताम् ॥ ९ ॥ अब्रवील्लक्ष्मणस्त्रस्तां सीतां मृगवधूमिव ।

भावार्थ

‘विदेहकुमारी सीताजीकी दशा भयभीत हुई हरिणीके समान हो रही थी । उन्होंने शोकमग्न होकर आँसू बहाते हुए जब उपर्युक्त बातें कहीं, तब लक्ष्मण उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९½ ॥

पन्नगासुरगन्धर्वदेवदानवराक्षसैः ॥ १० ॥ अशक्यस्तव वैदेहि भर्ता जेतुं न संशयः ।

भावार्थ

‘विदेहनन्दिनि ! आप विश्वास करें, नाग, असुर, गन्धर्व, देवता, दानव तथा राक्षस—ये सब मिलकर भी आपके पतिको परास्त नहीं कर सकते, मेरे इस कथनमें संशय नहीं है ॥ १०½ ॥

देवि देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु पतत्रिषु ॥ ११ ॥ राक्षसेषु पिशाचेषु किन्नरेषु मृगेषु च । दानवेषु च घोरेषु न स विद्येत शोभने ॥ १२ ॥ यो रामं प्रतियुध्येत समरे वासवोपमम् । अवध्यः समरे रामो नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘देवि ! शोभने ! देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, पक्षियों, राक्षसों, पिशाचों, किन्नरों, मृगों तथा घोर दानवोंमें भी ऐसा कोई वीर नहीं है, जो समराङ्गणमें इन्द्रके समान पराक्रमी श्रीरामका सामना कर सके । भगवान् श्रीराम युद्धमें अवध्य हैं, अतएव आपको ऐसी बात ही नहीं कहनी चाहिये ॥ ११–१३ ॥

न त्वामस्मिन् वने हातुमुत्सहे राघवं विना । अनिवार्यं बलं तस्य बलैर्बलवतामपि ॥ १४ ॥ त्रिभिर्लोकैः समुदितैः सेश्वरैः सामरैरपि । हृदयं निर्वृतं तेऽस्तु संतापस्त्यज्यतां तव ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें इस वनके भीतर मैं आपको अकेली नहीं छोड़ सकता । सैनिक-बलसे सम्पन्न बड़े-बड़े राजा अपनी सारी सेनाओंके द्वारा भी श्रीरामके बलको कुण्ठित नहीं कर सकते । देवताओं तथा इन्द्र आदिके साथ मिले हुए तीनों लोक भी यदि आक्रमण करें तो वे श्रीरामके बलका वेग नहीं रोक सकते; अतः आपका हृदय शान्त हो । आप संताप छोड़ दें ॥ १४-१५ ॥

आगमिष्यति ते भर्ता शीघ्रं हत्वा मृगोत्तमम् । न स तस्य स्वरो व्यक्तं न कश्चिदपि दैवतः ॥ १६ ॥ गन्धर्वनगरप्रख्या माया तस्य च रक्षसः ।

भावार्थ

‘आपके पतिदेव उस सुन्दर मृगको मारकर शीघ्र ही लौट आयँगे । वह शब्द जो आपने सुना था, अवश्य ही उनका नहीं था । किसी देवताने कोई शब्द प्रकट किया हो, ऐसी बात भी नहीं है । वह तो उस राक्षसकी गन्धर्वनगरके समान झूठी माया ही थी ॥ १६½ ॥

न्यासभूतासि वैदेहि न्यस्ता मयि महात्मना ॥ १७ ॥ रामेण त्वं वरारोहे न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे ।

भावार्थ

‘सुन्दरि ! विदेहनन्दिनि ! महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने मुझपर आपकी रक्षाका भार सौंपा है । इस समय आप मेरे पास उनकी धरोहरके रूपमें हैं, अतः आपको मैं यहाँ अकेली नहीं छोड़ सकता ॥ १७½ ॥

कृतवैराश्च कल्याणि वयमेतैर्निशाचरैः ॥ १८ ॥ खरस्य निधने देवि जनस्थानवधं प्रति ।

भावार्थ

‘कल्याणमयी देवि ! जिस समय खरका वध किया गया, उस समय जनस्थाननिवासी दूसरे बहुत-से राक्षस भी मारे गये थे, इस कारण इन निशाचरोंने हमारे साथ वैर बाँध लिया है ॥ १८½ ॥

राक्षसा विविधा वाचो व्याहरन्ति महावने ॥ १९ ॥ हिंसाविहारा वैदेहि न चिन्तयितुमर्हसि ।

भावार्थ

‘विदेहनन्दिनि ! प्राणियोंकी हिंसा ही जिनका क्रीड़ा-विहार या मनोरञ्जन है, वे राक्षस ही इस विशाल वनमें नाना प्रकारकी बोलियाँ बोला करते हैं; अतः आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये’ ॥ १९½ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु क्रुद्धा संरक्तलोचना ॥ २० ॥ अब्रवीत् परुषं वाक्यं लक्ष्मणं सत्यवादिनम् ।

भावार्थ

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर सीताको बड़ा क्रोध हुआ, उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे सत्यवादी लक्ष्मणसे कठोर बातें कहने लगीं—॥ २०½ ॥

अनार्य करुणारम्भ नृशंस कुलपांसन ॥ २१ ॥ अहं तव प्रियं मन्ये रामस्य व्यसनं महत् । रामस्य व्यसनं दृष्ट्वा तेनैतानि प्रभाषसे ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘अनार्य ! निर्दयी ! क्रूरकर्मा ! कुलाङ्गार ! मैं तुझे खूब समझती हूँ। श्रीराम किसी भारी विपत्तिमें पड़ जायँ, यही तुझे प्रिय है । इसीलिये तू रामपर संकट आया देखकर भी ऐसी बातें बना रहा है ॥ २१-२२ ॥

नैव चित्रं सपत्नेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत् । त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तेरे-जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओंके मनमें इस तरहका पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है॥ २३ ॥

सुदुष्टस्त्वं वने राममेकमेकोऽनुगच्छसि । मम हेतोः प्रतिच्छन्नः प्रयुक्तो भरतेन वा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘तू बड़ा दुष्ट है, श्रीरामको अकेले वनमें आते देख मुझे प्राप्त करनेके लिये ही अपने भावको छिपाकर तू भी अकेला ही उनके पीछे-पीछे चला आया है, अथवा यह भी सम्भव है कि भरतने ही तुझे भेजा हो ॥ २४ ॥

तन्न सिध्यति सौमित्रे तवापि भरतस्य वा । कथमिन्दीवरश्यामं रामं पद्मनिभेक्षणम् ॥ २५ ॥ उपसंश्रित्य भर्तारं कामयेयं पृथग्जनम् ।

भावार्थ

‘परंतु सुमित्राकुमार ! तेरा या भरतका वह मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता । नीलकमलके समान श्यामसुन्दर कमलनयन श्रीरामको पतिरूपमें पाकर मैं दूसरे किसी क्षुद्र पुरुषकी कामना कैसे कर सकती हूँ ? ॥ २५½ ॥

समक्षं तव सौमित्रे प्राणांस्त्यक्ष्याम्यसंशयम् ॥ २६ ॥ रामं विना क्षणमपि नैव जीवामि भूतले ।

भावार्थ

‘सुमित्राकुमार ! मैं तेरे सामने ही निःसंदेह अपने प्राण त्याग दूँगी, किंतु श्रीरामके बिना एक क्षण भी इस भूतलपर जीवित नहीं रह सकूँगी’ ॥ २६½ ॥

इत्युक्तः परुषं वाक्यं सीतया रोमहर्षणम् ॥ २७ ॥ अब्रवील्लक्ष्मणः सीतां प्राञ्जलिः स जितेन्द्रियः । उत्तरं नोत्सहे वक्तुं दैवतं भवती मम ॥ २८ ॥

भावार्थ

सीताने जब इस प्रकार कठोर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाली बात कही, तब जितेन्द्रिय लक्ष्मण हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘देवि ! मैं आपकी बातका जवाब नहीं दे सकता; क्योंकि आप मेरे लिये आराधनीया देवीके समान हैं ॥ २७-२८ ॥

वाक्यमप्रतिरूपं तु न चित्रं स्त्रीषु मैथिलि । स्वभावस्त्वेष नारीणामेषु लोकेषु दृश्यते ॥ २९ ॥ विमुक्तधर्माश्चपलास्तीक्ष्णा भेदकराः स्त्रियः । न सहे हीदृशं वाक्यं वैदेहि जनकात्मजे ॥ ३० ॥ श्रोत्रयोरुभयोर्मध्ये तप्तनाराचसंनिभम् ।

भावार्थ

‘मिथिलेशकुमारी ! ऐसी अनुचित और प्रतिकूल बातें मुँहसे निकालना स्त्रियोंके लिये आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि इस संसारमें नारियोंका ऐसा स्वभाव बहुधा देखा जाता है ॥ ‘स्त्रियाँ प्रायः विनय आदि धर्मोंसे रहित, चञ्चल, कठोर तथा घरमें फूट डालनेवाली होती हैं । विदेहकुमारी जानकी ! आपकी यह बात मेरे दोनों कानोंमें तपाये हुए लोहेके समान लगी है । मैं ऐसी बात सह नहीं सकता ॥ ३०½ ॥

उपशृण्वन्तु मे सर्वे साक्षिणो हि वनेचराः ॥ ३१ ॥ न्यायवादी यथा वाक्यमुक्तोऽहं परुषं त्वया । धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे ॥ ३२ ॥ स्त्रीत्वाद् दुष्टस्वभावेन गुरुवाक्ये व्यवस्थितम् । गच्छामि यत्र काकुत्स्थः स्वस्ति तेऽस्तु वरानने ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘इस वनमें विचरनेवाले सभी प्राणी साक्षी होकर मेरा कथन सुनें । मैंने न्याययुक्त बात कही है तो भी आपने मेरे प्रति ऐसी कठोर बात अपने मुँहसे निकाली है । निश्चय ही आज आपकी बुद्धि मारी गयी है । आप नष्ट होना चाहती हैं । धिक्कार है आपको, जो आप मुझपर ऐसा संदेह करती हैं । मैं बड़े भाईकी आज्ञाका पालन करनेमें दृढ़तापूर्वक तत्पर हूँ और आप केवल नारी होनेके कारण साधारण स्त्रियोंके दुष्ट स्वभावको अपनाकर मेरे प्रति ऐसी आशङ्का करती हैं । अच्छा अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ भैया श्रीराम गये हैं । सुमुखि ! आपका कल्याण हो ॥ ३१–३३ ॥

रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः । निमित्तानि हि घोराणि यानि प्रादुर्भवन्ति मे । अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘विशाललोचने ! वनके सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें; क्योंकि इस समय मेरे सामने जो बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उन्होंने मुझे संशयमें डाल दिया है । क्या मैं श्रीरामचन्द्रजीके साथ लौटकर पुनः आपको सकुशल देख सकूँगा ?’ ॥ ३४ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्ता तु रुदती जनकात्मजा । प्रत्युवाच ततो वाक्यं तीव्रबाष्पपरिप्लुता ॥ ३५ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर जनककिशोरी सीता रोने लगीं । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी तीव्र धारा बह चली । वे उन्हें इस प्रकार उत्तर देती हुई बोलीं—॥ ३५ ॥

गोदावरीं प्रवेक्ष्यामि हीना रामेण लक्ष्मण । आबन्धिष्येऽथवा त्यक्ष्ये विषमे देहमात्मनः ॥ ३६ ॥ पिबामि वा विषं तीक्ष्णं प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् । न त्वहं राघवादन्यं कदापि पुरुषं स्पृशे ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! मैं श्रीरामसे बिछुड़ जानेपर गोदावरी नदीमें समा जाऊँगी अथवा गलेमें फाँसी लगा लूँगी अथवा पर्वतके दुर्गम शिखरपर चढ़कर वहाँसे अपने शरीरको नीचे डाल दूँगी या तीव्र विष पान कर लूँगी अथवा जलती आगमें प्रवेश कर जाऊँगी, परंतु श्रीरघुनाथजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका कदापि स्पर्श नहीं करूँगी’ ॥ ३६-३७ ॥

इति लक्ष्मणमाश्रुत्य सीता शोकसमन्विता । पाणिभ्यां रुदती दुःखादुदरं प्रजघान ह ॥ ३८ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके सामने यह प्रतिज्ञा करके शोकमग्न होकर रोती हुई सीता अधिक दुःखके कारण दोनों हाथोंसे अपने उदरपर आघात करने लगीं--छाती पीटने लगीं ॥ ३८ ॥

तामार्तरूपां विमना रुदन्तीं सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम् । आश्वासयामास न चैव भर्तु- स्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता ॥ ३९ ॥

भावार्थ

विशाललोचना सीताको आर्त होकर रोती देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मन-ही-मन उन्हें सान्त्वना दी, परंतु सीता उस समय अपने देवरसे कुछ नहीं बोलीं ॥ ३९ ॥

ततस्तु सीतामभिवाद्य लक्ष्मणः कृताञ्जलिः किंचिदभिप्रणम्य । अवेक्षमाणो बहुशः स मैथिलीं जगाम रामस्य समीपमात्मवान् ॥ ४० ॥

भावार्थ

तब मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने दोनों हाथ जोड़ कुछ झुककर मिथिलेशकुमारी सीताको प्रणाम किया और बारंबार उनकी ओर देखते हुए वे श्रीरामचन्द्रजीके पास चल दिये ॥ ४० ॥

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