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अरण्यकाण्ड, सर्ग 36

मारीच श्रूयतां तात वचनं मम भाषतः। आर्तोऽस्मि मम चार्तस्य भवान् हि परमा गतिः ॥ १ ॥

भावार्थ

‘तात मारीच ! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो। इस समय मैं बहुत दुखी हूँ और इस दुःखकी अवस्थामें तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले हो ॥ १ ॥

जानीषे त्वं जनस्थानं भ्राता यत्र खरो मम। दूषणश्च महाबाहुः स्वसा शूर्पणखा च मे ॥ २ ॥ त्रिशिराश्च महाबाहू राक्षसः पिशिताशनः। अन्ये च बहवः शूरा लब्धलक्षा निशाचराः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘तुम जनस्थानको जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्यवेधमें कुशल शूरवीर निशाचर रहा करते थे ॥ २-३ ॥

वसन्ति मन्नियोगेन अधिवासं च राक्षसाः। बाधमाना महारण्ये मुनीन् ये धर्मचारिणः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वे सभी राक्षस मेरी आज्ञासे वहाँ घर बनाकर रहते थे और उस विशाल वनमें जो धर्माचरण करनेवाले मुनि थे, उन्हें सताया करते थे ॥ ४ ॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्। शूराणां लब्धलक्षाणां खरचित्तानुवर्तिनाम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘वहाँ खरके मनका अनुसरण करनेवाले तथा युद्धविषयक उत्साहसे सम्पन्न चौदह हजार शूरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करनेवाले थे ॥ ५ ॥

ते त्विदानीं जनस्थाने वसमाना महाबलाः। सङ्गताः परमायत्ता रामेण सह संयुगे ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जनस्थानमें निवास करनेवाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब-के-सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षेत्रमें रामके साथ जा भिड़े थे ॥ ६ ॥

नानाशस्त्रप्रहरणाः खरप्रमुखराक्षसाः। तेन संजातरोषेण रामेण रणमूर्धनि ॥ ७ ॥ अनुक्त्वा परुषं किंचिच्छरैर्व्यापारितं धनुः।

भावार्थ

‘वे खर आदि राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करनेमें कुशल थे, परंतु युद्धके मुहानेपर रोषमें भरे हुए श्रीरामने अपने मुँहसे कोई कड़वी बात न कहकर बाणोंके साथ धनुषका ही व्यापार आरम्भ किया ॥ ७½ ॥

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसामुग्रतेजसाम् ॥ ८ ॥ निहतानि शरैर्दीप्तैर्मानुषेण पदातिना। खरश्च निहतः संख्ये दूषणश्च निपातितः ॥ ९ ॥ हत्वा त्रिशिरसं चापि निर्भया दण्डकाः कृताः।

भावार्थ

‘पैदल और मनुष्य होकर भी रामने अपने दमकते हुए बाणोंसे भयंकर तेजवाले चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला और उसी युद्धमें खरको भी मौतके घाट उतारकर दूषणको भी मार गिराया। साथ ही त्रिशिराका। वध करके उसने दण्डकारण्यको दूसरोंके लिये निर्भय बना दिया ॥ ८-९½ ॥

पित्रा निरस्तः क्रुद्धेन सभार्यः क्षीणजीवितः ॥ १० ॥ स हन्ता तस्य सैन्यस्य रामः क्षत्रियपांसनः ।

भावार्थ

‘उसके पिताने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घरसे निकाल दिया है । उसका जीवन क्षीण हो चला है । यह क्षत्रियकुलकलङ्क राम ही उस राक्षस-सेनाका घातक है ॥ १०½ ॥

अशीलः कर्कशस्तीक्ष्णो मूर्खो लुब्धोऽजितेन्द्रियः॥११॥ त्यक्तधर्मा त्वधर्मात्मा भूतानामहिते रतः । येन वैरं विनारण्ये सत्त्वमास्थाय केवलम् ॥ १२ ॥ कर्णनासापहारेण भगिनी मे विरूपिता । अस्य भार्यां जनस्थानात् सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ १३ ॥ आनयिष्यामि विक्रम्य सहायस्तत्र मे भव ।

भावार्थ

‘वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाववाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियोंके अहितमें तत्पर रहनेवाला है । जिसने बिना किसी वैर-विरोधके केवल बलका आश्रय ले मेरी बहिनके नाक-कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेनेके लिये मैं भी उसकी देवकन्याके समान सुन्दरी पत्नी सीताको जनस्थानसे बलपूर्वक हर लाऊँगा । तुम उस कार्यमें मेरी सहायता करो ॥ ११-१३½ ॥

त्वया ह्यहं सहायेन पार्श्वस्थेन महाबल ॥ १४ ॥ भ्रातृभिश्च सुरान् सर्वान् नाहमत्राभिचिन्तये । तत्सहायो भव त्वं मे समर्थो ह्यसि राक्षस ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘महाबली राक्षस ! तुम-जैसे पार्श्ववर्ती सहायकके और अपने भाइयोंके बलपर ही मैं समस्त देवताओंकी यहाँ कोई परवा नहीं करता, अतः तुम मेरे सहायक हो जाओ; क्योंकि तुम मेरी सहायता करनेमें समर्थ हो ॥ १४-१५ ॥

वीर्ये युद्धे च दर्पे च न ह्यस्ति सदृशस्तव । उपायतो महाशूरो महामायाविशारदः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘पराक्रममें, युद्धमें और वीरोचित अभिमानमें तुम्हारे समान कोई नहीं है । नाना प्रकारके उपाय बतानेमें भी तुम बड़े बहादुर हो । बड़ी-बड़ी मायाओंका प्रयोग करनेमें भी विशेष कुशल हो ॥ १६ ॥

पतदर्थमहं प्राप्तस्त्वत्समीपं निशाचर । शृणु तत् कर्म साहाय्ये यत् कार्यं वचनान्मम ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘निशाचर ! इसीलिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ । सहायताके लिये मेरे कथनानुसार तुम्हें कौन-सा काम करना है, वह भी सुनो ॥ १७ ॥

सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः । आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘तुम सोनेके बने हुए मृग-जैसा रूप धारण करके रजतमय बिन्दुओंसे युक्त चितकबरे हो जाओ और रामके आश्रममें सीताके सामने विचरो ॥ १८ ॥

त्वां तु निःसंशयं सीता दृष्ट्वा तु मृगरूपिणम् । गृह्यतामिति भर्तारं लक्ष्मणं चाभिधास्यति ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘विचित्र मृगके रूपमें तुम्हें देखकर सीता अवश्य ही अपने पति रामसे तथा लक्ष्मणसे भी कहेगी कि आपलोग इसे पकड़ लावें ॥ १९ ॥

ततस्तयोरपाये तु शून्ये सीतां यथासुखम् । निराबाधो हरिष्यामि राहुश्चन्द्रप्रभामिव ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जब वे दोनों तुम्हें पकड़नेके लिये दूर निकल जायँगे, तब मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके सूने आश्रमसे सीताको उसी तरह सुखपूर्वक हर लाऊँगा, जैसे राहु चन्द्रमाकी प्रभाका अपहरण कर लेता है ॥ २० ॥

ततः पश्चात् सुखं रामे भार्याहरणकर्शिते । विश्रब्धं प्रहरिष्यामि कृतार्थेनान्तरात्मना ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘उसके बाद स्त्रीका अपहरण हो जानेसे जब राम अत्यन्त दुखी और दुर्बल हो जायगा, उस समय मैं निर्भय हो सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थचित्तसे प्रहार करूँगा’ ॥ २१ ॥

तस्य रामकथां श्रुत्वा मारीचस्य महात्मनः । शुष्कं समभवद् वक्त्रं परित्रस्तो बभूव च ॥ २२ ॥

भावार्थ

रावणके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी चर्चा सुनकर महात्मा मारीचका मुँह सूख गया । वह भयसे थर्रा उठा ॥ २२ ॥

ओष्ठौ परिलिहञ्शुष्कौ नेत्रैरनिमिषैरिव । मृतभूत इवार्तस्तु रावणं समुदैक्षत ॥ २३ ॥

भावार्थ

वह अपलक नेत्रोंसे देखता हुआ अपने सूखे ओठोंको चाटने लगा । उसे इतना दुःख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने लगा । उसी अवस्थामें उसने रावणकी ओर देखा ॥ २३ ॥

स रावणं त्रस्तविषण्णचेता महावने रामपराक्रमज्ञः । कृताञ्जलिस्तत्त्वमुवाच वाक्यं हितं च तस्मै हितमात्मनश्च ॥ २४ ॥

भावार्थ

उसे महान् वनमें श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-ही-मन अत्यन्त भयभीत और दुखी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावणसे यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावणके तथा अपने लिये भी हितकर थी ॥ २४ ॥

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