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अरण्यकाण्ड, सर्ग 35

ततः शूर्पणखावाक्यं तच्छ्रुत्वा रोमहर्षणम् । सचिवानभ्यनुज्ञाय कार्यं बुद्ध्वा जगाम ह ॥ १ ॥

भावार्थ

शूर्पणखाकी ये रोंगटें खड़ी कर देनेवाली बातें सुनकर रावण मन्त्रियोंसे सलाह ले अपने कर्तव्यका निश्चय करके वहाँसे चल दिया ॥ १ ॥

तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च । दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम् ॥ २ ॥ इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मनः । स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह ॥ ३ ॥

भावार्थ

उसने पहले सीताहरणरूपी कार्यपर मन-ही-मन विचार किया । फिर उसके दोषों और गुणोंका यथावत् ज्ञान प्राप्त करके बलाबलका निश्चय किया । अन्तमें यह स्थिर किया कि इस कामको करना ही चाहिये । जब इस बातपर उसकी बुद्धि जम गयी, तब वह रमणीय रथशालामें गया ॥ २-३ ॥

यानशालां ततो गत्वा प्रच्छन्नं राक्षसाधिपः । सूतं संचोदयामास रथः संयुज्यतामिति ॥ ४ ॥ एवमुक्तः क्षणेनैव सारथिर्लघुविक्रमः । रथं संयोजयामास तस्याभिमतमुत्तमम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

गुप्तरूपसे रथशालामें जाकर राक्षसराज रावणने अपने सारथिको यह आज्ञा दी कि ‘मेरा रथ जोतकर तैयार करो’ ॥ सारथि शीघ्रतापूर्वक कार्य करनेमें कुशल था । रावणकी उपर्युक्त आज्ञा पाकर उसने एक ही क्षणमें उसके मनके अनुकूल उत्तम रथ जोतकर तैयार कर दिया ॥ ५ ॥

कामगं रथमास्थाय काञ्चनं रत्नभूषितम् । पिशाचवदनैर्युक्तं खरैः कनकभूषणैः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वह रथ इच्छानुसार चलनेवाला तथा सुवर्णमय था । उसे रत्नोंसे विभूषित किया गया था। उसमें सोनेके साज-बाजोंसे सजे हुए गधे जुते थे, जिनका मुख पिशाचोंके समान था । रावण उसपर आरूढ़ होकर चला ॥ ६ ॥

मेघप्रतिमनादेन स तेन धनदानुजः । राक्षसाधिपतिः श्रीमान् ययौ नदनदीपतिम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

वह रथ मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घरघर ध्वनि फैलाता हुआ चलता था । उसके द्वारा वह कुबेरका छोटा भाई श्रीमान् राक्षसराज रावण समुद्रके तटपर गया ॥ ७ ॥

स श्वेतवालव्यजनः श्वेतच्छत्रो दशाननः । स्निग्धवैदूर्यसंकाशस्तप्तकाञ्चनभूषणः ॥ ८ ॥ दशग्रीवो विंशतिभुजो दर्शनीयपरिच्छदः । त्रिदशारिर्मुनीन्द्रघ्नो दशशीर्ष इवाद्रिराट् ॥ ९ ॥

भावार्थ

उस समय उसके लिये सफेद चँवरसे हवा की जा रही थी । सिरके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था । उसकी अङ्गकान्ति स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान नीली या काली थी । वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे विभूषित था । उसके दस मुख, दस कण्ठ और बीस भुजाएँ थीं । उसके वस्त्राभूषण आदि अन्य उपकरण भी देखने ही योग्य थे । देवताओंका शत्रु और मुनीश्वरोंका हत्यारा वह निशाचर दस शिखरोंवाले पर्वतराजके समान प्रतीत होता था ॥ ८-९ ॥

कामगं रथमास्थाय शुशुभे राक्षसाधिपः । विद्युन्मण्डलवान् मेघः सबलाक इवाम्बरे ॥ १० ॥

भावार्थ

इच्छानुसार चलनेवाले उस रथपर आरूढ़ हो राक्षसराज रावण आकाशमें विद्युन्मण्डलसे घिरे हुए तथा वकपंक्तियोंसे सुशोभित मेघके समान शोभा पा रहा था ॥ १० ॥

सशैलसागरानूपं वीर्यवानवलोकयन् । नानापुष्पफलैर्वृक्षैरनुकीर्णं सहस्रशः ॥ ११ ॥ शीतमङ्गलतोयाभिः पद्मिनीभिः समन्ततः । विशालैराश्रमपदैर्वेदिमद्भिरलंकृतम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

पराक्रमी रावण पर्वतयुक्त समुद्रके तटपर पहुँचकर उसकी शोभा देखने लगा । सागरका वह किनारा नाना प्रकारके फल-फूलवाले सहस्रों वृक्षोंसे व्याप्त था । चारों ओर मङ्गलकारी शीतल जलसे भरी हुई पुष्करिणियाँ और वेदिकाओंसे मण्डित विशाल आश्रम उस सिन्धुतटकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥११-१२॥

कदलयटविसंशोभं नारिकेलोपशोभितम् । सालैस्तालैस्तमालैश्च तरुभिश्च सुपुष्पितैः ॥ १३ ॥

भावार्थ

कहीं कदलीवन और कहीं नारियलके कुञ्ज शोभा दे रहे थे । साल, ताल, तमाल तथा सुन्दर फूलोंसे भरे हुए दूसरे-दूसरे वृक्ष उस तटप्रान्तको अलंकृत कर रहे थे ॥ १३ ॥

अत्यन्तनियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः । नागैः सुपर्णैर्गन्धर्वैः किन्नरैश्च सहस्रशः ॥ १४ ॥

भावार्थ

अत्यन्त नियमित आहार करनेवाले बड़े-बड़े महर्षियों, नागों, सुपर्णों ( गरुड़ों ), गन्धर्वों तथा सहस्रों किन्नरोंसे भी उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १४ ॥

जितकामैश्च सिद्धैश्च चारणैश्चोपशोभितम् । आजैर्वैखानसैर्माषैर्वालखिल्यैर्मरीचिपैः ॥ १५ ॥

भावार्थ

कामविजयी सिद्धों, चारणों, ब्रह्माजीके पुत्रों, वानप्रस्थों, माष गोत्रमें उत्पन्न मुनियों, बालखिल्य महात्माओं तथा केवल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले तपस्वीजनोंसे भी वह सागरका तटप्रान्त सुशोभित हो रहा था ॥ १५ ॥

दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम् । क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभिः सहस्रशः ॥ १६ ॥ सेवितं देवपत्नीभिः श्रीमतीभिरुपासितम् । देवदानवसङ्घैश्च चरितं त्वमृताशिभिः ॥ १७ ॥

भावार्थ

दिव्य आभूषणों और पुष्पमालाओंको धारण करनेवाली तथा क्रीड़ा-विहारकी विधिको जाननेवाली सहस्रों दिव्यरूपिणी अप्सराएँ वहाँ सब ओर विचर रही थीं । कितनी ही शोभाशालिनी देवाङ्गनाएँ उस सिन्धुतटका सेवन करती हुई आस-पास बैठी थीं । देवताओं और दानवोंके समूह तथा अमृतभोजी देवगण वहाँ विचर रहे थे ॥ १६-१७ ॥

हंसक्रौञ्चप्लवाकीर्णं सारसैः सम्प्रसादितम् । वैदूर्यप्रस्तरं स्निग्धं सान्द्रं सागरतेजसा ॥ १८ ॥

भावार्थ

सिन्धुका वह तट समुद्रके तेजसे उसकी तरङ्गमालाओंके स्पर्शसे स्निग्ध एवं शीतल था । वहाँ हंस, क्रौञ्च तथा मेढक सब ओर फैले हुए थे और सारस उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । उस तटपर वैदूर्यमणिके सदृश श्याम रंगके प्रस्तर दिखायी देते थे ॥ १८ ॥

पाण्डुराणि विशालानि दिव्यमाल्ययुतानि च । तूर्यगीताभिजुष्टानि विमानानि समन्ततः ॥ १९ ॥ तपसा जितलोकानां कामगान्यभिसम्पतन् । गन्धर्वाप्सरसश्चैव ददर्श धनदानुजः ॥ २० ॥

भावार्थ

आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए कुबेरके छोटे भाई रावणने रास्तेमें सब ओर बहुत-से श्वेत वर्णके विमानों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंको भी देखा । वे इच्छानुसार चलनेवाले विशाल विमान उन पुण्यात्मा पुरुषोंके थे, जिन्होंने तपस्यासे पुण्यलोकोंपर विजय पायी थी । उन विमानोंको दिव्य पुष्पोंसे सजाया गया था और उनके भीतरसे गीत-वाद्यकी ध्वनि प्रकट हो रही थी ॥ १९-२० ॥

निर्यासरसमूलानां चन्दनानां सहस्रशः । वनानि पश्यन् सौम्यानि घ्राणतृप्तिकराणि च ॥ २१ ॥

भावार्थ

आगे बढ़नेपर उसने, जिनकी जड़ोंसे गोंद निकले हुए थे, ऐसे चन्दनोंके सहस्रों वन देखे, जो बड़े ही सुहावने और अपनी सुगन्धसे नासिकाको तृप्त करनेवाले थे ॥ २१ ॥

अगुरूणां च मुख्यानां वनान्युपवनानि च । तक्कोलानां च जात्यानां फलिनां च सुगन्धिनाम् ॥ २२ ॥ पुष्पाणि च तमालस्य गुल्मानि मरिचस्य च । मुक्तानां च समूहानि शुष्यमाणानि तीरतः ॥ २३ ॥ शैलानि प्रवरांश्चैव प्रवालनिचयांस्तथा । काञ्चनानि च शृङ्गाणि राजतानि तथैव च ॥ २४ ॥ प्रस्रवाणि मनोज्ञानि प्रसन्नान्यद्भुतानि च । धनधान्योपपन्नानि स्त्रीरत्नैराबृतानि च ॥ २५ ॥ हस्त्यश्वरथगाढानि नगराणि विलोकयन् ।

भावार्थ

कहीं श्रेष्ठ अगुरुके वन थे, कहीं उत्तम जातिके सुगन्धित फलवाले तक्कोलों ( वृक्षविशेषों ) के उपवन थे । कहीं तमालके फूल खिले हुए थे । कहीं गोल मिर्चकी झाड़ियाँ शोभा पाती थीं और कहीं समुद्रके तटपर ढेर-के-ढेर मोती सूख रहे थे । कहीं श्रेष्ठ पर्वतमालाएँ, कहीं मूँगोंकी राशियाँ, कहीं सोने-चाँदीके शिखर तथा कहीं सुन्दर, अद्भुत और स्वच्छ पानीके झरने दिखायी देते थे । कहीं धन-धान्यसे सम्पन्न, स्त्री-रत्नोंसे भरे हुए तथा हाथी, घोड़े और रथोंसे व्याप्त नगर दृष्टिगोचर होते थे । इन सबको देखता हुआ रावण आगे बढ़ा ॥ २२-२५½ ॥

तं समं सर्वतः स्निग्धं मृदुसंस्पर्शमारुतम् ॥ २६ ॥ अनूपे सिन्धुराजस्य ददर्श त्रिदिवोपमम् ।

भावार्थ

फिर उसने सिंधुराजके तटपर एक ऐसा स्थान देखा, जो स्वर्गके समान मनोहर, सब ओरसे समतल और स्निग्ध था । वहाँ मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिसका स्पर्श बड़ा कोमल जान पड़ता था ॥ २६½ ॥

तत्रापश्यत् स मेघाभं न्यग्रोधं मुनिभिर्वृतम् ॥ २७ ॥ समन्ताद् यस्य ताः शाखाः शतयोजनमायताः ।

भावार्थ

वहाँ सागरतटपर एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया, जो अपनी घनी छायाके कारण मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होता था । उसके नीचे चारों ओर मुनि निवास करते थे । उस वृक्षकी सुप्रसिद्ध शाखाएँ चारों ओर सौ योजनोंतक फैली हुई थीं ॥ २७½ ॥

यस्य हस्तिनमादाय महाकायं च कच्छपम् ॥ २८ ॥ भक्षार्थं गरुडः शाखामाजगाम महाबलः ।

भावार्थ

यह वही वृक्ष था, जिसकी शाखापर किसी समय महाबली गरुड़ एक विशालकाय हाथी और कछुएको लेकर उन्हें खानेके लिये आ बैठे थे ॥ २८½ ॥

तस्य तां सहसा शाखां भारेण पतगोत्तमः ॥ २९ ॥ सुपर्णः पर्णबहुलां बभञ्जाथ महाबलः । तत्र वैखानसा माषा वालखिल्या मरीचिपाः ॥ ३० ॥ आजा बभूवुर्धूम्राश्च संगताः परमर्षयः ।

भावार्थ

पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली गरुड़ने बहुसंख्यक पत्तोंसे भरी हुई उस शाखाको सहसा अपने भारसे तोड़ डाला था ॥ उस शाखाके नीचे बहुत-से वैखानस, माष, बालखिल्य, मरीचिप ( सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले ), ब्रह्मपुत्र और धूम्रप संज्ञावाले महर्षि एक साथ रहते थे ॥ ३०½ ॥

तेषां दयार्थं गरुडस्तां शाखां शतयोजनाम् ॥ ३१ ॥ भग्नामादाय वेगेन तौ चोभौ गजकच्छपौ । एकपादेन धर्मात्मा भक्षयित्वा तदामिषम् ॥ ३२ ॥ निषादविषयं हत्वा शाखया पतगोत्तमः । प्रहर्षमतुलं लेभे मोक्षयित्वा महामुनीन् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उनपर दया करके उनके जीवनकी रक्षा करनेके लिये पक्षियोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा गरुड़ने उस टूटी हुई सौ योजन लंबी शाखाको और उन दोनों हाथी तथा कछुएको भी वेगपूर्वक एक ही पंजेसे पकड़ लिया तथा आकाशमें ही उन दोनों जंतुओंके मांस खाकर फेंकी हुई उस डालीके द्वारा निषाद देशका संहार कर डाला । उस समय पूर्वोक्त महामुनियोंको मृत्युके संकटसे बचा लेनेसे गरुड़को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ३१-३३ ॥

स तु तेन प्रहर्षेण द्विगुणीकृतविक्रमः । अमृतानयनार्थं वै चकार मतिमान् मतिम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

उस महान् हर्षसे बुद्धिमान् गरुड़का पराक्रम दूना हो गया और उन्होंने अमृत ले आनेके लिये पक्का निश्चय कर लिया ॥ ३४ ॥

अयोजालानि निर्मथ्य भित्त्वा रत्नगृहं वरम् । महेन्द्रभवनाद् गुप्तमाजहारामृतं ततः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् इन्द्रलोकमें जाकर उन्होंने इन्द्रभवनकी उन जालियोंको तोड़ डाला, जो लोहेकी सींकचोंसे बनी हुई थीं । फिर रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनको नष्ट-भ्रष्ट करके वहाँ छिपाकर रखे हुए अमृतको वे महेन्द्रभवनसे हर लाये ॥ ३५ ॥

तं महर्षिगणैर्जुष्टं सुपर्णकृतलक्षणम् । नाम्ना सुभद्रं न्यग्रोधं ददर्श धनदानुजः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

गरुड़के द्वारा तोड़ी हुई डालीका वह चिह्न उस बरगदमें उस समय भी मौजूद था । उस वृक्षका नाम था सुभद्रवट । बहुत-से महर्षि उस वृक्षकी छायामें निवास करते थे । कुबेरके छोटे भाई रावणने उस वटवृक्षको देखा ॥ ३६ ॥

तं तु गत्वा परं पारं समुद्रस्य नदीपतेः । ददर्शाश्रममेकान्ते पुण्ये रम्ये वनान्तरे ॥ ३७ ॥

भावार्थ

नदियोंके स्वामी समुद्रके दूसरे तटपर जाकर उसने एक रमणीय वनके भीतर पवित्र एवं एकान्तस्थानमें एक आश्रमका दर्शन किया ॥ ३७ ॥

तत्र कृष्णाजिनधरं जटामण्डलधारिणम् । ददर्श नियताहारं मारीचं नाम राक्षसम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

वहाँ शरीरमें काला मृगचर्म और सिरपर जटाओंका समूह धारण किये नियमित आहार करते हुए मारीच नामक राक्षस निवास करता था। रावण वहाँ जाकर उससे मिला ॥ ३८ ॥

स रावणः समागम्य विधिवत् तेन रक्षसा। मारीचेनार्चितो राजा सर्वकामैरमानुषैः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

मिलनेपर उस राक्षस मारीचने सब प्रकारके अलौकिक कमनीय पदार्थ अर्पित करके राजा रावणका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया ॥ ३९ ॥

तं स्वयं पूजयित्वा च भोजनेनोदकेन च। अर्थोपहितया वाचा मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४० ॥

भावार्थ

अन्न और जलसे स्वयं उसका पूर्ण सत्कार करके मारीचने प्रयोजनकी बातें पूछते हुए उससे इस प्रकार कहा–॥ ४० ॥

कच्चित्ते कुशलं राजल्लँङ्कायां राक्षसेश्वर। केनार्थेन पुनस्त्वं वै तूर्णमेव इहागतः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! तुम्हारी लंकामें कुशल तो है ? राक्षसराज ! तुम किस कामके लिये पुनः इतनी जल्दी यहाँ आये हो ?’ ॥ ४१ ॥

एवमुक्तो महातेजा मारीचेन स रावणः। ततः पश्चादिदं वाक्यमब्रवीद् वाक्यकोविदः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

मारीचके इस प्रकार पूछनेपर बातचीत करनेमें कुशल महातेजस्वी रावणने उससे इस प्रकार कहा ॥ ४२ ॥

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