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अरण्यकाण्ड, सर्ग 15

ततः पञ्चवटीं गत्वा नानाव्यालमृगायुताम् । उवाच लक्ष्मणं रामो भ्रातरं दीप्ततेजसम् ॥ १ ॥

भावार्थ

नाना प्रकारके सर्पों, हिंसक जन्तुओं और मृगोंसे भरी हुई पञ्चवटीमें पहुँचकर श्रीरामने उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मणसे कहा—॥ १ ॥

आगताः स्म यथोद्दिष्टं यं देशं मुनिरब्रवीत् । अयं पञ्चवटीदेशः सौम्य पुष्पितकाननः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! मुनिवर अगस्त्यने हमें जिस स्थानका परिचय दिया था, उनके तथाकथित स्थानमें हमलोग आ पहुँचे । यही पञ्चवटीका प्रदेश है । यहाँका वनप्रान्त पुष्पोंसे कैसी शोभा पा रहा है ॥ २ ॥

सर्वतश्चार्यतां दृष्टिः कानने निपुणो ह्यसि । आश्रमः कतरस्मिन् नो देशे भवति सम्मतः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम इस वनमें चारों ओर दृष्टि डालो; क्योंकि इस कार्यमें निपुण हो । देखकर यह निश्चय करो कि किस स्थानपर आश्रम बनाना हमारे लिये अच्छा होगा ॥ ३ ॥

रमते यत्र वैदेही त्वमहं चैव लक्ष्मण । तादृशो दृश्यतां देशः संनिकृष्टजलाशयः ॥ ४ ॥ वनरामण्यकं यत्र जलरामण्यकं तथा । संनिकृष्टं च यस्मिंस्तु समित्पुष्पकुशोदकम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम किसी ऐसे स्थानको ढूँढ़ निकालो, जहाँसे जलाशय निकट हो, जहाँ विदेहकुमारी सीताका मन लगे, जहाँ तुम और हम भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें, जहाँ वन और जल दोनोंका रमणीय दृश्य हो तथा जिस स्थानके आस-पास ही समिधा, फूल, कुश और जल मिलनेकी सुविधा हो’ ॥ ४-५ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः संयताञ्जलिः । सीतासमक्षं काकुत्स्थमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर सीताके सामने ही उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ ६ ॥

परवानस्मि काकुत्स्थ त्वयि वर्षशतं स्थिते । स्वयं तु रुचिरे देशे क्रियतामिति मां वद ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! आपके रहते हुए मैं सदा पराधीन ही हूँ । मैं सैकड़ों या अनन्त वर्षोंतक आपकी आज्ञाके अधीन ही रहना चाहता हूँ; अतः आप स्वयं ही देखकर जो स्थान सुन्दर जान पड़े, वहाँ आश्रम बनानेके लिये मुझे आज्ञा दें—मुझसे कहें कि तुम अमुक स्थानपर आश्रम बनाओ’ ॥ ७ ॥

सुप्रीतस्तेन वाक्येन लक्ष्मणस्य महाद्युतिः । विमृशन् रोचयामास देशं सर्वगुणान्वितम् ॥ ८ ॥ स तं रुचिरमाक्रम्य देशमाश्रमकर्मणि । हस्ते गृहीत्वा हस्तेन रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥ ९ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके इस वचनसे अत्यन्त तेजस्वी भगवान् श्रीरामको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने स्वयं ही सोच-विचारकर एक ऐसा स्थान पसंद किया, जो सब प्रकारके उत्तम गुणोंसे सम्पन्न और आश्रम बनानेके योग्य था । उस सुन्दर स्थानपर आकर श्रीरामने लक्ष्मणका हाथ अपने हाथमें लेकर कहा—॥ ८-९ ॥

अयं देशः समः श्रीमान् पुष्पितैस्तरुभिर्वृतः । इहाश्रमपदं रम्यं यथावत् कर्तुमर्हसि ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! यह स्थान समतल और सुन्दर है तथा फूले हुए वृक्षोंसे घिरा है । तुम्हें इसी स्थानपर यथोचित रूपसे एक रमणीय आश्रमका निर्माण करना चाहिये ॥ १० ॥

इयमादित्यसंकाशैः पद्मैः सुरभिगन्धिभिः । अदूरे दृश्यते रम्या पद्मिनी पद्मशोभिता ॥ ११ ॥ यथाख्यातमगस्त्येन मुनिना भावितात्मना । इयं गोदावरी रम्या पुष्पितैस्तरुभिर्वृता ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘यह पास ही सूर्यके समान उज्ज्वल कान्तिवाले मनोरम गन्धयुक्त कमलोंसे रमणीय प्रतीत होनेवाली तथा पद्मोंकी शोभासे सम्पन्न पुष्करिणी दिखायी देती है ॥ ‘पवित्र अन्तःकरणवाले अगस्त्य मुनिने जिसके विषयमें कहा था, वह विकसित वृक्षावलियोंसे घिरी हुई रमणीय गोदावरी नदी यही है ॥ १२ ॥

हंसकारण्डवाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता । नातिदूरे न चासन्ने मृगयूथनिपीडिता ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘इसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी विचर रहे हैं । चकवे इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा पानी पीनेके लिये आये हुए मृगोंके झुंड इसके तटपर छाये रहते हैं । यह नदी इस स्थानसे न तो अधिक दूर है और न अत्यन्त निकट ही ॥ १३ ॥

मयूरनादिता रम्याः प्रांशवो बहुकन्दराः । दृश्यन्ते गिरयः सौम्य फुल्लैस्तरुभिरावृताः ॥ १४ ॥ सौवर्णै राजतैस्ताम्रैर्देशो देशो तथा शुभैः । गवाक्षिता इवाभान्ति गजाः परमभक्तिभिः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! यहाँ बहुत-सी कन्दराओंसे युक्त ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखायी दे रहे हैं, जहाँ मयूरोंकी मीठी बोली गूँज रही है । ये रमणीय पर्वत खिले हुए वृक्षोंसे व्याप्त हैं ॥ ‘स्थान-स्थानपर सोने, चाँदी तथा ताँबेके समान रंगवाले सुन्दर गैरिक धातुओंसे उपलक्षित ये पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो झरोखेके आकारमें की गयी नीले, पीले और सफेद आदि रंगोंकी उत्तम शृङ्गाररचनाओंसे अलंकृत हाथी शोभा पा रहे हों ॥ १५ ॥

सालैस्तालैस्तमालैश्च खर्जूरैः पनसैर्द्रुमैः । नीवारैस्तिनिशैश्चैव पुन्नागैश्चोपशोभिताः ॥ १६ ॥ चूतैरशोकैस्तिलकैः केतकैरपि चम्पकैः । पुष्पगुल्मलतोपेतैस्तैस्तैस्तरुभिरावृताः ॥ १७ ॥ स्यन्दनैश्चन्दनैर्नीपैः पर्णासैर्लकुचैरपि । धवाश्वकर्णखदिरैः शमीकिंशुकपाटलैः ॥ १८ ॥

भावार्थ

पुष्पों, गुल्मों तथा लता-वल्लरियोंसे युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जलकदम्ब, तिनिश, पुंनाग, आम, अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, स्यन्दन, चन्दन, कदम्ब, पर्णास, लकुच, धव, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलाश और पाटल ( पाडर ) आदि वृक्षोंसे घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा पा रहे हैं ॥ १६–१८ ॥

इदं पुण्यमिदं रम्यमिदं बहुमृगद्विजम् । इह वत्स्याम सौमित्रे सार्धमेतेन पक्षिणा ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! यह बहुत ही पवित्र और बड़ा रमणीय स्थान है । यहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हैं । हमलोग भी यहीं इन पक्षिराज जटायुके साथ रहेंगे’ ॥१९॥

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः परवीरहा । अचिरेणाश्रमं भ्रातुश्चकार सुमहाबलः ॥ २० ॥

भावार्थ

श्रीरामके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली लक्ष्मणने भाईके लिये शीघ्र ही आश्रम बनाकर तैयार किया ॥ २० ॥

पर्णशालां सुविपुलां तत्र संघातमृत्तिकाम् । सुस्तम्भां मस्करैर्दीर्घैः कृतवंशां सुशोभनाम् ॥ २१ ॥ शमीशाखाभिरास्तीर्य दृढपाशावपाशिताम् । कुशकाशशरैः पर्णैः सुपरिच्छादितां तथा ॥ २२ ॥ समीकृततलां रम्यां चकार सुमहाबलः । निवासं राघवस्यार्थे प्रेक्षणीयमनुत्तमम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

वह आश्रम एक अत्यन्त विस्तृत पर्णशालाके रूपमें बनाया गया था । महाबली लक्ष्मणने पहले वहाँ मिट्टी एकत्र करके दीवार खड़ी की, फिर उसमें सुन्दर एवं सुदृढ़ खम्भे लगाये । खम्भोंके ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे । बाँसोंके रख दिये जानेपर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखायी देने लगी । फिर उन बाँसोंपर उन्होंने शमीवृक्षकी शाखाएँ फैला दीं और उन्हें मजबूत रस्सियोंसे कसकर बाँध दिया । इसके बाद ऊपरसे कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर उस पर्णशालाको भलीभाँति छा दिया तथा नीचेकी भूमिको बराबर करके उस कुटीको बड़ा रमणीय बना दिया । इस प्रकार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके लिये परम उत्तम निवासगृह बना दिया, जो देखने ही योग्य था ॥ २१–२३ ॥

स गत्वा लक्ष्मणः श्रीमान् नदीं गोदावरीं तदा । स्नात्वा पद्मानि चादाय सफलः पुनरागतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

उसे तैयार करके श्रीमान् लक्ष्मणने गोदावरी नदीके तटपर जाकर तत्काल उसमें स्नान किया और कमलके फूल तथा फल लेकर वे फिर वहीं लौट आये ॥ २४ ॥

ततः पुष्पबलिं कृत्वा शान्तिं च स यथाविधि । दर्शयामास रामाय तदाश्रमपदं कृतम् ॥ २५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर शास्त्रीय विधिके अनुसार देवताओंके लिये फूलोंकी बलि ( उपहारसामग्री ) अर्पित की तथा वास्तुशान्ति करके उन्होंने अपना बनाया हुआ आश्रम श्रीरामचन्द्रजीको दिखाया ॥ २५ ॥

स तं दृष्ट्वा कृतं सौम्यमाश्रमं सह सीतया । राघवः पर्णशालायां हर्षमाहारयत् परम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

भगवान् श्रीराम सीताके साथ उस नये बने हुए सुन्दर आश्रमको देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कुछ कालतक उसके भीतर खड़े रहे ॥ २६ ॥

सुसंहृष्टः परिष्वज्य बाहुभ्यां लक्ष्मणं तदा । अतिस्निग्धं च गाढं च वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अत्यन्त हर्षमें भरकर उन्होंने दोनों भुजाओंसे लक्ष्मणको कसकर हृदयसे लगा लिया और बड़े स्नेहके साथ यह बात कही–॥ २७ ॥

प्रीतोऽस्मि ते महत् कर्म त्वया कृतमिदं प्रभो । प्रदेयो यन्निमित्तं ते परिष्वङ्गो मया कृतः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘सामर्थ्यशाली लक्ष्मण ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ । तुमने यह महान् कार्य किया है । उसके लिये और कोई समुचित पुरस्कार न होनेसे मैंने तुम्हें गाढ़ आलिङ्गन प्रदान किया है ॥ २८ ॥

भावज्ञेन कृतज्ञेन धर्मज्ञेन च लक्ष्मण । त्वया पुत्रेण धर्मात्मा न संवृत्तः पिता मम ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम मेरे मनोभावको तत्काल समझ लेनेवाले, कृतज्ञ और धर्मज्ञ हो । तुम-जैसे पुत्रके कारण मेरे धर्मात्मा पिता अभी मरे नहीं है—तुम्हारे रूपमें वे अब भी जीवित ही हैं’ ॥ २९ ॥

एवं लक्ष्मणमुक्त्वा तु राघवो लक्ष्मिवर्धनः । तस्मिन् देशे बहुफले न्यवसत् स सुखं सुखी ॥ ३० ॥ कंचित् कालं स धर्मात्मा सीतया लक्ष्मणेन च । अन्वास्यमानो न्यवसत् स्वर्गलोके यथामरः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर अपनी शोभाका विस्तार करनेवाले सुखी श्रीरामचन्द्रजी प्रचुर फलोंसे सम्पन्न उस पञ्चवटी-प्रदेशमें सबके साथ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ सीता और लक्ष्मणसे सेवित हो धर्मात्मा श्रीराम कुछ कालतक वहाँ उसी प्रकार रहे, जैसे स्वर्गलोकमें देवता निवास करते हैं ॥ ३१ ॥

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