अरण्यकाण्ड, सर्ग 14
अथ पञ्चवटीं गच्छन्नन्तरा रघुनन्दनः । आससाद महाकायं गृध्रं भीमपराक्रमम् ॥ १ ॥ तं दृष्ट्वा तौ महाभागौ वनस्थं रामलक्ष्मणौ । मेनाते राक्षसं पक्षिं ब्रुवाणौ को भवानिति ॥ २ ॥
भावार्थ
पञ्चवटी जाते समय बीचमें श्रीरामचन्द्रजीको एक विशालकाय गृध्र मिला, जो भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाला था ॥ वनमें बैठे हुए उस विशाल पक्षीको देखकर महाभाग श्रीराम और लक्ष्मणने उसे राक्षस ही समझा और पूछा— ‘आप कौन हैं ?’ ॥ २ ॥
ततो मधुरया वाचा सौम्यया प्रीणयन्निव । उवाच वत्स मां विद्धि वयस्यं पितुरात्मनः ॥ ३ ॥
भावार्थ
तब उस पक्षीने बड़ी मधुर और कोमल वाणीमें उन्हें प्रसन्न करते हुए-से कहा—‘बेटा ! मुझे अपने पिताका मित्र समझो’ ॥ ३ ॥
स तं पितृसखं मत्वा पूजयामास राघवः । स तस्य कुलमव्यग्रमथ पप्रच्छ नाम च ॥ ४ ॥
भावार्थ
पिताका मित्र जानकर श्रीरामचन्द्रजीने गृध्रका आदर किया और शान्तभावसे उसका कुल एवं नाम पूछा ॥ ४ ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा कुलमात्मानमेव च । आचचक्षे द्विजस्तस्मै सर्वभूतसमुद्भवम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर उस पक्षीने उन्हें अपने कुल और नामका परिचय देते हुए समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम ही बताना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
पूर्वकाले महाबाहो ये प्रजापतयोऽभवन् । तान् मे निगदतः सर्वानादितः शृणु राघव ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महाबाहु रघुनन्दन ! पूर्वकालमें जो-जो प्रजापति हो चुके हैं, उन सबका आदिसे ही वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ६ ॥
कर्दमः प्रथमस्तेषां विकृतस्तदनन्तरम् । शेषश्च संश्रयश्चैव बहुपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘उन प्रजापतियोंमें सबसे प्रथम कर्दम हुए । तदनन्तर दूसरे प्रजापतिका नाम विकृत हुआ, तीसरे शेष, चौथे संश्रय और पाँचवें प्रजापति पराक्रमी बहुपुत्र हुए ॥ ७ ॥
स्थाणुर्मरीचिरत्रिश्च क्रतुश्चैव महाबलः । पुलस्त्यश्चाङ्गिराश्चैव प्रचेताः पुलहस्तथा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘छठे स्थाणु, सातवें मरीचि, आठवें अत्रि, नवें महान् शक्तिशाली क्रतु, दसवें पुलस्त्य, ग्यारहवें अङ्गिरा, बारहवें प्रचेता ( वरुण ) और तेरहवें प्रजापति पुलह हुए ॥ ८ ॥
दक्षो विवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्च राघव । कश्यपश्च महातेजास्तेषामासीच पश्चिमः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘चौदहवें दक्ष, पंद्रहवें विवस्वान्, सोलहवें अरिष्टनेमि और सत्रहवें प्रजापति महातेजस्वी कश्यप हुए । रघुनन्दन ! यह कश्यपजी अन्तिम प्रजापति कहे गये हैं ॥ ९ ॥
प्रजापतेस्तु दक्षस्य बभूवुरिति विश्रुताः । षष्टिर्दुहितरो राम यशस्विन्यो महायशः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महायशस्वी श्रीराम ! प्रजापति दक्षके साठ यशस्विनी कन्याएँ हुईं, जो बहुत ही विख्यात थीं ॥ १० ॥
कश्यपः प्रतिजग्राह तासामष्टौ सुमध्यमाः । अदितिं च दितिं चैव दनूमपि च कालकाम् ॥ ११ ॥ ताम्रां क्रोधवशां चैव मनुं चाप्यनलामपि ।
भावार्थ
उनमेंसे आठ सुन्दरी कन्याओंको प्रजापति कश्यपने पत्नीरूपमें ग्रहण किया । जिनके नाम इस प्रकार हैं—अदिति, दिति, दनु, कालका, ताम्रा, क्रोधवशा, मनु और अनला ॥ ११½ ॥
तास्तु कन्यास्ततः प्रीतः कश्यपः पुनरब्रवीत् ॥ १२ ॥ पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तॄन् वै जनयिष्यथ मत्समान् ।
भावार्थ
तदनन्तर उन कन्याओंसे प्रसन्न होकर कश्यपजीने फिर उनसे कहा—‘देवियो ! तुमलोग ऐसे पुत्रोंको जन्म दोगी, जो तीनों लोकोंका भरण-पोषण करनेमें समर्थ और मेरे समान तेजस्वी होंगे, ॥ १२½ ॥
अदितिस्तन्मना राम दितिश्च दनुरेव च ॥ १३ ॥ कालका च महाबाहो शेषास्त्वमनसोऽभवन् ।
भावार्थ
‘महाबाहु श्रीराम ! इनमेंसे अदिति, दिति, दनु और कालका—इन चारोंने कश्यपजीकी कही हुई बातको मनसे ग्रहण किया; परंतु शेष स्त्रियोंने उधर मन नहीं लगाया । उनके मनमें वैसा मनोरथ नहीं उत्पन्न हुआ ॥ १३½ ॥
अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥ १४ ॥ आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप ।
भावार्थ
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुवीर ! अदितिके गर्भसे तैंतीस देवता उत्पन्न हुए—बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार । शत्रुओंको ताप देनेवाले श्रीराम ! ये ही तैंतीस देवता हैं ॥ १४½ ॥
दितिस्त्वजनयत् पुत्रान् दैत्यांस्तात यशस्विनः ॥ १५ ॥ तेषामियं वसुमती पुराऽऽसीत् सवनार्णवा ।
भावार्थ
‘तात ! दितिने दैत्य नामसे प्रसिद्ध यशस्वी पुत्रोंको जन्म दिया । पूर्वकालमें वन और समुद्रोंसहित सारी पृथिवी उन्हींके अधिकारमें थी ॥ १५½ ॥
दनुस्त्वजनयत् पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम ॥ १६ ॥ नरकं कालकं चैव कालकापि व्यजायत ।
भावार्थ
‘शत्रुदमन ! दनुने अश्वग्रीव नामक पुत्रको उत्पन्न किया और कालकाने नरक एवं कालक नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया ॥ १६½ ॥
क्रौञ्चीं भासीं तथा श्येनीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम् ॥ १७ ॥ ताम्रा तु सुषुवे कन्याः पञ्चैता लोकविश्रुताः ।
भावार्थ
‘ताम्राने क्रौञ्ची, भासी, श्येनी, धृतराष्ट्री तथा शुकी–इन पाँच विश्वविख्यात कन्याओंको उत्पन्न किया ॥ १७½ ॥
उलूकाञ्जनयत् क्रौञ्ची भासी भासान् व्यजायत ॥ १८ ॥ श्येनी श्येनांश्च गृध्रांश्च व्यजायत सुतेजसः । धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इनमेंसे क्रौञ्चीने उल्लुओंको, भासीने भास नामक पक्षियोंको, श्येनीने परम तेजस्वी श्येनों (बाजों) और गीधोंको तथा धृतराष्ट्रीने सब प्रकारके हंसों और कलहंसोंको जन्म दिया ॥ १८-१९ ॥
चक्रवाकांश्च भद्रं ते विजज्ञे सापि भामिनी । शुकी नतां विजज्ञे तु नतायां विनता सुता ॥ २० ॥ दश क्रोधवशा राम विजज्ञेऽप्यात्मसम्भवाः । मृगीं च मृगमन्दां च हरीं भद्रमदामपि ॥ २१ ॥ मातङ्गीमथ शार्दूलीं श्वेतां च सुरभीं तथा । सर्वलक्षणसम्पन्नां सुरसां कद्रुकामपि ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आपका कल्याण हो, उसी भामिनी धृतराष्ट्रीने चक्रवाक नामक पक्षियोंको भी उत्पन्न किया था । ताम्राकी सबसे छोटी पुत्री शुकीने नता नामवाली कन्याको जन्म दिया । नतासे विनता नामवाली पुत्री उत्पन्न हुई ॥ ‘श्रीराम ! क्रोधवशाने अपने पेटसे दस कन्याओंको जन्म दिया । जिनके नाम हैं—मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमदा, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सर्वलक्षणसम्पन्ना सुरसा और कद्रुका ॥ २१-२२ ॥
अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम । ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्चमरास्तथा ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! मृगीकी संतान सारे मृग हैं और मृगमन्दाके ऋक्ष, सृमर और चमर ॥ २३ ॥
ततस्त्विरावतीं नाम जज्ञे भद्रमदा सुताम् । तस्यास्त्वैरावतः पुत्रो लोकनाथो महागजः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘भद्रमदाने इरावती नामक कन्याको जन्म दिया, जिसका पुत्र है ऐरावत नामक महान् गजराज, जो समस्त लोकोंको अभीष्ट है ॥ २४ ॥
हर्यश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तपस्विनः । गोलाङ्गूलाश्च शार्दूली व्याघ्रांश्चाजनयत् सुतान् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘हरीकी संतानें हरि ( सिंह ) तथा तपस्वी ( विचारशील ) वानर तथा गोलांगूल ( लंगूर ) हैं । क्रोधवशाकी पुत्री शार्दूलीने व्याघ्र नामक पुत्र उत्पन्न किये ॥ २५ ॥
मातङ्ग्यास्त्वथ मातङ्गा अपत्यं मनुजर्षभ । दिशागजं तु काकुत्स्थ श्वेता व्यजनयत् सुतम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! मातङ्गीकी संतानें मातङ्ग ( हाथी ) हैं । काकुत्स्थ ! श्वेताने अपने पुत्रके रूपमें एक दिग्गजको जन्म दिया ॥ २६ ॥
ततो दुहितरौ राम सुरभिर्द्वे व्यजायत । रोहिणीं नाम भद्रं ते गन्धर्वीं च यशस्विनीम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आपका भला हो । क्रोधवशाकी पुत्री सुरभी देवीने दो कन्याएँ उत्पन्न कीं—रोहिणी और यशस्विनी गन्धर्वी ॥ २७ ॥
रोहिण्यजनयद् गावो गन्धर्वी वाजिनः सुतान् । सुरसाजनयन्नागान् राम कद्रूश्च पन्नगान् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रोहिणीने गौओंको जन्म दिया और गन्धर्वीने घोड़ोंको ही पुत्ररूपमें प्रकट किया । श्रीराम ! सुरसाने नागोंको और कद्रूने पन्नगोंको जन्म दिया ॥ २८ ॥
मनुर्मनुष्याञ्जनयत् कश्यपस्य महात्मनः । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान्शूद्रांश्च मनुजर्षभ ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! महात्मा कश्यपकी पत्नी मनुने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिवाले मनुष्योंको जन्म दिया ॥ २९ ॥
मुखतो ब्राह्मणा जाता उरसः क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्याः पद्भ्यां शूद्रा इति श्रुतिः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए और हृदयसे क्षत्रिय । दोनों ऊरुओंसे वैश्योंका जन्म हुआ और दोनों पैरोंसे शूद्रोंका—ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ३० ॥
सर्वान् पुण्यफलान् वृक्षाननलापि व्यजायत । विनता च शुकीपौत्री कद्रूश्च सुरसास्वसा ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘( कश्यपपत्नी ) अनलाने पवित्र फलवाले समस्त वृक्षोंको जन्म दिया । कश्यपपत्नी ताम्राकी पुत्री जो शुकी थी, उसकी पौत्री विनता थी तथा कद्रू सुरसाकी बहिन ( एवं क्रोधवशाकी पुत्री ) कही गयी है ॥ ३१ ॥
कद्रूर्नागसहस्रं तु विजज्ञे धरणीधरान् । द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु गरुडोऽरुण एव च ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इनमेंसे कद्रूने एक सहस्र नागोंको उत्पन्न किया, जो इस पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं तथा विनताके दो पुत्र हुए— गरुड़ और अरुण ॥ ३२ ॥
तस्माज्जातोऽहमरुणात् सम्पातिश्च ममाग्रजः । जटायुरिति मां विद्धि श्येनीपुत्रमरिंदम ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘उन्हीं विनतानन्दन अरुणसे मैं तथा मेरे बड़े भाई सम्पाति उत्पन्न हुए । शत्रुदमन रघुवीर ! आप मेरा नाम जटायु समझें । मैं श्येनीका पुत्र हूँ ( ताम्राकी पुत्री जो श्येनी बतायी गयी है, उसीकी परम्परामें उत्पन्न हुई एक श्येनी मेरी माता हुई ) ॥ ३३ ॥
सोऽहं वाससहायस्ते भविष्यामि यदीच्छसि । इदं दुर्गं हि कान्तारं मृगराक्षससेवितम् । सीतां च तात रक्षिष्ये त्वयि याते सलक्ष्मणे ॥ ३४ ॥ जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् । पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा- नटायुषा संकथितं पुनः पुनः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘तात ! यदि आप चाहें तो मैं यहाँ आपके निवासमें सहायक होऊँगा । यह दुर्गम वन मृगों तथा राक्षसोंसे सेवित है । लक्ष्मणसहित आप यदि अपनी पर्णशालासे कभी बाहर चले जायँ तो उस अवसरपर मैं देवी सीताकी रक्षा करूँगा’ ॥ यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने जटायुका बड़ा सम्मान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके गले लगकर वे उनके सामने नतमस्तक हो गये । फिर पिताके साथ जिस प्रकार उनकी मित्रता हुई थी, वह प्रसङ्ग मनस्वी श्रीरामने जटायुके मुखसे बारंबार सुना ॥ ३५ ॥
स तत्र सीतां परिदाय मैथिलीं सहैव तेनातिबलेन पक्षिणा। जगाम तां पञ्चवटीं सलक्ष्मणो रिपून् दिधक्षन्शलभानिवानलः॥३६॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वे मिथिलेशकुमारी सीताको उनके संरक्षणमें सौंपकर लक्ष्मण और उन अत्यन्त बलशाली पक्षी जटायुके साथ ही पञ्चवटीकी ओर ही चल दिये । श्रीरामचन्द्रजी मुनि-द्रोही राक्षसोंको शत्रु समझकर उन्हें उसी प्रकार दग्ध कर डालना चाहते थे, जैसे आग पतिङ्गोंको जलाकर भस्म कर देती है ॥ ३६ ॥
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