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दोहा 78b

चौ०

एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया॥ सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं॥१॥

भावार्थ

हे पक्षिराज! मनमें इतनी [ शङ्का ] लाते ही श्रीरघुनाथजीके द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी। परन्तु वह माया न तो मुझे दुःख देनेवाली हुई और न दूसरे जीवोंकी भाँति संसारमें डालनेवाली हुई॥१॥

चौ०

नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना॥ ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर॥२॥

भावार्थ

हे नाथ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान्‌के वाहन गरुड़जी! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप हैं और जड-चेतन सभी जीव मायाके वश हैं॥२॥

चौ०

जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥ माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी॥३॥

भावार्थ

यदि जीवोंको एकरस ( अखण्ड ) ज्ञान रहे, तो कहिये, फिर ईश्वर और जीवमें भेद ही कैसा? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [ सत्त्व, रज, तम—इन ] तीनों गुणोंकी खान माया ईश्वरके वशमें है॥३॥

चौ०

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥ मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥४॥

भावार्थ

जीव परतन्त्र है, भगवान्‌ स्वतन्त्र हैं; जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान्‌ एक हैं। यद्यपि मायाका किया हुआ यह भेद असत्‌ है तथापि वह भगवान्‌के भजन बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता॥४॥

दो०

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान॥७८ (क)॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान्‌ होनेपर भी बिना पूँछ और सींगका पशु है॥७८ ( क )॥

दो०

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥७८ (ख)॥

भावार्थ

सभी तारागणोंके साथ सोलह कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं उन सबमें दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती॥७८ ( ख )॥

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