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दोहा 70b

चौ०

बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी॥ सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥१॥

भावार्थ

काकभुशुण्डिजीने फिर कहा—पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था ( अर्थात्‌ बहुत था )—हे नाथ! आप सब प्रकारसे मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजीके कृपापात्र हैं॥ १ ॥

चौ०

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया॥ पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥२॥

भावार्थ

आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ! आपने तो मुझपर दया की है। हे पक्षिराज! मोहके बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है॥ २ ॥

चौ०

तुम्ह निज मोह कही खगसाईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥ नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥३॥

भावार्थ

हे पक्षियोंके स्वामी! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाईं! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, ब्रह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं॥ ३ ॥

चौ०

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही॥ तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा॥४॥

भावार्थ

उनमेंसे भी किस-किसको मोहने अंधा ( विवेकशून्य ) नहीं किया? जगत्‌में ऐसा कौन है जिसे कामने न नचाया हो? तृष्णाने किसको मतवाला नहीं बनाया? क्रोधने किसका हृदय नहीं जलाया?॥ ४ ॥

दो०

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार॥७० (क)॥

भावार्थ

इस संसारमें ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान्‌ और गुणोंका धाम है, जिसकी लोभने विडम्बना ( मिट्टी पलीद ) न की हो॥ ७० ( क )॥

दो०

श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि॥७० (ख)॥

भावार्थ

लक्ष्मीके मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी ( युवती स्त्री ) के नेत्र-बाण न लगे हों?॥ ७० ( ख )॥

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