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दोहा 7

चौ०

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥ देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥१॥

भावार्थ

जानकीजी सब सासुओंसे मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो॥ १ ॥

चौ०

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥ कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥२॥

भावार्थ

सब माताएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं। [ नेत्रोंसे प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं, परन्तु ] मङ्गलका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं। सोनेके थालसे आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुके श्रीअङ्गोंकी ओर देखती हैं॥ २ ॥

चौ०

नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥ कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥३॥

भावार्थ

अनेकों प्रकारसे निछावरें करती हैं और हृदयमें परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीरको देख रही हैं॥ ३ ॥

चौ०

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥ अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥४॥

भावार्थ

वे बार-बार हृदयमें विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावणको कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान्‌ बली थे॥ ४ ॥

दो०

लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥७॥

भावार्थ

लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्दमें मग्न है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है॥ ७ ॥

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