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दोहा 6b

चौ०

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥ सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥१॥

भावार्थ

फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्नजीसे गले लगकर मिले और इस प्रकार विरहसे उत्पन्न दुःसह दुःखका नाश किया। फिर भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजीने सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया॥१॥

चौ०

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥ प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥२॥

भावार्थ

प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोगसे उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गये। सब लोगोंको प्रेमविह्वल [ और मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर ] देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया॥२॥

चौ०

अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहि कृपाला॥ कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥३॥

भावार्थ

उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपोंमें प्रकट हो गये और सबसे [ एक ही साथ ] यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब नर-नारियोंको शोकसे रहित कर दिया॥ ३ ॥

चौ०

छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥ एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥४॥

भावार्थ

भगवान्‌ क्षणमात्रमें सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसीने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणोंके धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े॥ ४ ॥

चौ०

कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई॥५॥

भावार्थ

कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ोंको देखकर दौड़ी हों॥ ५ ॥

छं०

जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥

भावार्थ

मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ोंको घरपर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयी हों और दिनका अन्त होनेपर [ बछड़ोंसे मिलनेके लिये ] हुंकार करके थनसे दूध गिराती हुई नगरकी ओर दौड़ी हों। प्रभुने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकारके कोमल वचन कहे। वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [ भगवान्‌से मिलकर और उनके वचन सुनकर ] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।

दो०

भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि॥६ (क)॥

भावार्थ

सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजीके चरणोंमें प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदयमें बहुत सकुचायीं॥ ६ ( क ) ॥

दो०

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥६ (ख)॥

भावार्थ

लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजीसे बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ ( रोष ) नहीं जाता॥ ६ ( ख ) ॥

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