दोहा 50
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए॥ हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥१॥
भावार्थ
ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठजी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीने हनुमान्जी तथा भरतजी आदि भाइयोंको साथ लिया॥ १ ॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए॥ देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥२॥
भावार्थ
और फिर कृपालु श्रीरामजी नगरके बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया॥ २ ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥३॥
भावार्थ
संसारके सभी श्रमोंको हरनेवाले प्रभुने [ हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें ] श्रमका अनुभव किया और [ श्रम मिटानेको ] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई ( आमोंका बगीचा ) थी। वहाँ भरतजीने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उसपर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे॥ ३ ॥
मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥४॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥५॥
भावार्थ
उस समय पवनपुत्र हनुमान्जी पवन ( पंखा ) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया। [ शिवजी कहने लगे— ] हे गिरिजे! हनुमान्जीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [ स्वयं ] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बड़ाई की है॥ ४-५ ॥
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥५०॥
भावार्थ
उसी अवसरपर नारद मुनि हाथमें वीणा लिये हुए आये। वे श्रीरामजीकी सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कीर्ति गाने लगे॥५०॥
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