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दोहा 49

नारदजीका आना और स्तुति करके ब्रह्मलोकको लौट जाना

चौ०

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥१॥

भावार्थ

जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [ वर्णाश्रमके ] धर्म, श्रुतियोंसे उत्पन्न ( वेदविहित ) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम ( इन्द्रियनिग्रह ), तीर्थस्नान आदि जहाँतक वेद और संतजनोंने धर्म कहे हैं [ उनके करनेका ]— ॥ १ ॥

चौ०

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥ तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर॥२॥

भावार्थ

[ तथा ] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुननेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो॥ २ ॥

चौ०

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥३॥

भावार्थ

मैलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है? [ उसी प्रकार ] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [ निर्मल ] जलके बिना अन्तःकरणका मल कभी नहीं जाता॥ ३ ॥

चौ०

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥४॥

भावार्थ

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है॥ ४॥

दो०

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥४९॥

भावार्थ

हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु ( आप ) के चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तरमें भी कभी न घटे॥ ४९ ॥

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