दोहा 44
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥१॥
भावार्थ
हे भाई! इस शरीरके प्राप्त होनेका फल विषयभोग नहीं है। [ इस जगत्के भोगोंकी तो बात ही क्या ] स्वर्गका भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्तमें दुःख देनेवाला है। अतः जो लोग मनुष्यशरीर पाकर विषयोंमें मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतको बदलकर विष ले लेते हैं॥ १ ॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥ आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी॥२॥
भावार्थ
जो पारसमणिको खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला ( बुद्धिमान् ) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [ अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज ] चार खानों और चौरासी लाख योनियोंमें चक्कर लगाता रहता है॥ २ ॥
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥३॥
भावार्थ
मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणसे घिरा हुआ ( इनके वशमें हुआ ) यह सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण स्नेह करनेवाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्यका शरीर देते हैं॥ ३ ॥
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥४॥
भावार्थ
यह मनुष्यका शरीर भवसागर [ से तारने ] के लिये बेड़ा ( जहाज ) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं। इस प्रकार दुर्लभ ( कठिनतासे मिलनेवाले ) साधन सुलभ होकर ( भगवत्कृपासे सहज ही ) उसे प्राप्त हो गये हैं,॥ ४ ॥
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥४४॥
भावार्थ
जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागरसे न तरे, वह कृतघ्न और मन्द-बुद्धि है और आत्महत्या करनेवालेकी गतिको प्राप्त होता है॥ ४४ ॥
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