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दोहा 43

चौ०

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥१॥

भावार्थ

एक बार श्रीरघुनाथजीके बुलाये हुए गुरु वसिष्ठजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगरनिवासी सभामें आये। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके जन्म-मरणको मिटानेवाले श्रीरामजी वचन बोले— ॥ १ ॥

चौ०

सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥२॥

भावार्थ

हे समस्त नगरनिवासियो! मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदयमें कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीतिकी बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है। इसलिये [ संकोच और भय छोड़कर, ध्यान देकर ] मेरी बातोंको सुन लो और [ फिर ] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो!॥ २ ॥

चौ०

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥३॥

भावार्थ

वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीतिकी बात कहूँ तो भय भुलाकर ( बेखटके ) मुझे रोक देना॥ ३ ॥

चौ०

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥४॥

भावार्थ

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है। सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है ( कठिनतासे मिलता है )। यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया,॥ ४॥

दो०

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥४३॥

भावार्थ

वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [ अपना दोष न समझकर ] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है॥ ४३ ॥

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