दोहा 31
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥१॥
भावार्थ
[ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे पक्षिराज गरुड़जी! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकोंमें पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतोंको सुख और बहुतोंके मनमें शोक हुआ॥ १ ॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥ अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥ २ ॥
भावार्थ
जिन-जिनको शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। [ सर्वत्र प्रकाश छा जानेसे ] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पापरूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये॥ २ ॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥३॥
भावार्थ
भाँति-भाँतिके [ बन्धनकारक ] कर्म, गुण, काल और स्वभाव—ये चकोर हैं, जो [ रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें ] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर ( डाह ), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर ( कला ) भी किसी ओर नहीं चल पाता॥ ३ ॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥ सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥४॥
भावार्थ
धर्मरूपी तालाबमें ज्ञान, विज्ञान—ये अनेकों प्रकारके कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक—ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये॥ ४॥
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥३१॥
भावार्थ
यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे ( धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक ) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे ( अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि ) नाशको प्राप्त होते ( नष्ट हो जाते ) हैं॥ ३१ ॥
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