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दोहा 40

चौ०

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥ तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥१॥

भावार्थ

माल्यवान्‌ नामका एक बहुत ही बुद्धिमान्‌ मन्त्री था। उसने उन ( विभीषण ) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [ और कहा— ] हे तात! आपके छोटे भाई नीतिविभूषण ( नीतिको भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात्‌ नीतिमान्‌ ) हैं। विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये॥१॥

चौ०

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥ माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥२॥

भावार्थ

[ रावणने कहा— ] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं। यहाँ कोई है ? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान्‌ तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे— ॥२॥

चौ०

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥३॥

भावार्थ

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि ( अच्छी बुद्धि ) और कुबुद्धि ( खोटी बुद्धि ) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ ( सुखकी स्थिति ) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति ( दुःख ) रहती है॥३॥

चौ०

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥ कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥४॥

भावार्थ

आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसीसे आप हितको अहित और शत्रुको मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुलके लिये कालरात्रि [ के समान ] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति है॥४॥

दो०

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार। सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥४०॥

भावार्थ

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ ( विनती करता हूँ ) कि आप मेरा दुलार रखिये ( मुझ बालकके आग्रहको स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये )। श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो॥४०॥

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