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दोहा 25

लङ्का-दहन · लङ्का जलानेके बाद हनुमान्‌जीका सीताजीसे विदा माँगना और चूड़ामणि पाना · समुद्रके इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन-प्रवेश,सुग्रीव-मिलन, श्रीराम-हनुमान्-संवाद

चौ०

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥ जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥१॥

भावार्थ

जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ ( अपने स्वामीके पास ) जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता ( सामर्थ्य ) तो देखूँ!॥ १ ॥

चौ०

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥ जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥२॥

भावार्थ

यह वचन सुनते ही हनुमान्‌जी मनमें मुसकराये [ और मन-ही-मन बोले कि ] मैं जान गया, सरस्वतीजी [ इसे ऐसी बुद्धि देनेमें ] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही ( पूँछमें आग लगानेकी ) तैयारी करने लगे॥ २ ॥

चौ०

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥ कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥३॥

भावार्थ

[ पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि ] नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्‌जीने ऐसा खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी ( लंबी हो गयी )। नगरवासीलोग तमाशा देखने आये। वे हनुमान्‌जीको पैरसे ठोकर मारते हैं और उनकी बहुत हँसी करते हैं॥ ३ ॥

चौ०

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥ पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥४॥

भावार्थ

ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्‌जीको नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए देखकर हनुमान्‌जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४ ॥

चौ०

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥

भावार्थ

बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५ ॥

दो०

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥२५॥

भावार्थ

उस समय भगवान्‌की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे। हनुमान्‌जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५ ॥

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