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दोहा 19

चौ०

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥ मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥

भावार्थ

पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने [ अपने जेठे पुत्र ] बलवान्‌ मेघनादको भेजा। ( उससे कहा कि— ) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा जाय कि कहाँका है॥१॥

चौ०

चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥ कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥

भावार्थ

इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान्‌जीने देखा कि अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े॥२॥

चौ०

अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥ रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥३॥

भावार्थ

उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [ उसके प्रहारसे ] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया ( रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया )। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्‌जी अपने शरीरसे मसलने लगे॥३॥

चौ०

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥ मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥

भावार्थ

उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [ लड़ते हुए वे ऐसे मालूम होते थे ] मानो दो गजराज ( श्रेष्ठ हाथी ) भिड़ गये हों। हनुमान्‌जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥४॥

चौ०

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥५॥

भावार्थ

फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे जीते नहीं जाते॥५॥

दो०

ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥१९॥

भावार्थ

अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान ( प्रयोग ) किया, तब हनुमान्‌जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥१९॥

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