दोहा 12
श्रीसीता-हनुमान्-संवाद
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥ तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥१॥
भावार्थ
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं—हे माता! तू मेरी विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता॥१॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥ सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥२॥
भावार्थ
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने?॥२॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥ निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥३॥
भावार्थ
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [ उसने कहा— ] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥ देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥४॥
भावार्थ
सीताजी [ मन-ही-मन ] कहने लगीं—[ क्या करूँ ] विधाता ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी। आकाशमें अङ्गारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी तारा नहीं आता॥४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हत भागी॥ सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥५॥
भावार्थ
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन! मेरा शोक हर ले और अपना [ अशोक ] नाम सत्य कर॥५॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥ देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥६॥
भावार्थ
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-रोगका अन्त मत कर ( अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक न पहुँचा )। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान्जीको कल्पके समान बीता॥६॥
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब। जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥१२॥
भावार्थ
तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [ सीताजीके सामने ] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अङ्गारा दे दिया। [ यह समझकर ] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥१२॥
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