दोहा 93
दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी। बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी॥ गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी। धायउ दसहु सरासन तानी॥१॥
भावार्थ
सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान् अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा॥ १ ॥
समर भूमि दसकंधर कोप्यो। बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो॥ दंड एक रथ देखि न परेऊ। जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ॥२॥
भावार्थ
रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया। एक दण्ड ( घड़ी ) तक रथ दिखलायी न पड़ा, मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो॥ २ ॥
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा। तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा॥ सर निवारि रिपु के सिर काटे। ते दिसि बिदिसि गगन महि पाटे॥३॥
भावार्थ
जब देवताओंने हाहाकार किया, तब प्रभुने क्रोध करके धनुष उठाया। और शत्रुके बाणोंको हटाकर उन्होंने शत्रुके सिर काटे और उनसे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया॥ ३ ॥
काटे सिर नभ मारग धावहिं। जय जय धुनि करि भय उपजावहिं॥ कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा। कहँ रघुबीर कोसलाधीसा॥४॥
भावार्थ
काटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। ‘लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं ? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं ?’॥ ४॥
कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले। संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं। करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं॥
भावार्थ
‘राम कहाँ हैं ?’ यह कहकर सिरोंके समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर भाग चले। तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजीने हँसकर बाणोंसे उन सिरोंको भलीभाँति बेध डाला। हाथोंमें मुण्डोंकी मालाएँ लेकर बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-की-झुंड मिलकर इकट्ठी हुईं और वे रुधिरकी नदीमें स्नान करके चलीं, मानो संग्रामरूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हों।
पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड। चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड॥९३॥
भावार्थ
फिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल ( यमराज ) का दण्ड हो॥ ९३ ॥
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