दोहा 81
लक्ष्मण-रावण-युद्ध
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥ हमहू उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥ १ ॥
भावार्थ
ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानोंपर चढ़े हुए आकाशसे युद्ध देख रहे हैं। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! मैं भी उस समाजमें था और श्रीरामजीके रण-रंग ( रणोत्साह )की लीला देख रहा था॥ १ ॥
सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥२॥
भावार्थ
दोनों ओरके योद्धा रण-रसमें मतवाले हो रहे हैं। वानरोंको श्रीरामजीका बल है, इससे वे जयशील हैं ( जीत रहे हैं )। एक दूसरेसे भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरेको मसल-मसलकर पृथ्वीपर डाल देते हैं॥ २ ॥
मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥ उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥३॥
भावार्थ
वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरोंसे दूसरोंको मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओंको पैर पकड़कर पृथ्वीपर पटक देते हैं॥ ३ ॥
निसिचर भट महि गाड़हिं भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥ बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे॥४॥
भावार्थ
राक्षस योद्धाओंको भालू पृथ्वीमें गाड़ देते हैं और ऊपरसे बहुत-सी बालू डाल देते हैं। युद्धमें शत्रुओंसे विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों॥ ४॥
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥१॥
भावार्थ
क्रोधित हुए कालके समान वे वानर खून बहते हुए शरीरोंसे शोभित हो रहे हैं। वे बलवान् वीर राक्षसोंकी सेनाके योद्धाओंको मसलते और मेघकी तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटोंसे मारते, दाँतोंसे काटकर लातोंसे पीस डालते हैं। वानर-भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जायँ॥ १ ॥
धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रह्लादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥२॥
भावार्थ
वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रह्लादके स्वामी श्रीनृसिंहभगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर ( छा ) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वज्र और वज्रसे तृण कर देते हैं ( निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं )॥ २ ॥
निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप॥८१॥
भावार्थ
अपनी सेनाको विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके ‘लौटो’, ‘लौटो’ कहता हुआ चला॥८१॥
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