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दोहा 79

चौ०

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा॥ बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥१॥

भावार्थ

राक्षसोंकी अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेनाकी बहुत-सी टुकड़ियाँ हैं। अनेकों प्रकारके वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं॥ १ ॥

चौ०

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥ बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥२॥

भावार्थ

मतवाले हाथियोंके बहुत-से झुंड चले। मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षा-ऋतुके बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह हैं, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं॥ २ ॥

चौ०

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥ चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥३॥

भावार्थ

अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो। सेनाके चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे॥ ३ ॥

चौ०

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥ पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥४॥

भावार्थ

इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये। [ फिर सहसा ] पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनिसे बज रहे हैं; जैसे प्रलयकालके बादल गरज रहे हों॥ ४॥

चौ०

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥ केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं॥५॥

भावार्थ

भेरी, नफीरी ( तुरही ) और शहनाईमें योद्धाओंको सुख देनेवाला मारू राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने-अपने बल-पौरुषका बखान कर रहे हैं॥५॥

चौ०

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा॥ हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई॥६॥

भावार्थ

रावणने कहा—हे उत्तम योद्धाओ! सुनो। तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो और मैं दोनों राजकुमार भाइयोंको मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी॥६॥

चौ०

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई॥७॥

भावार्थ

जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े॥७॥

छं०

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥

भावार्थ

वे विशाल और कालके समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णोंके हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान्‌ हैं और किसीका भी डर नहीं मानते। रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय-जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका बखान करते हैं।

दो०

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि। भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥७९॥

भावार्थ

दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान ( चुन )-कर इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये॥७९॥

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