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दोहा 69

चौ०

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति छन माझ निसाचर धारी॥ भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥१॥

भावार्थ

कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षणमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया॥ १ ॥

चौ०

कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥२॥

भावार्थ

वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बाणोंसे काटकर धूलके समान ( चूर-चूर ) कर डाला॥ २ ॥

चौ०

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक॥ तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥३॥

भावार्थ

फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुषको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [ पीछेसे इस प्रकार ] निकल जाते हैं [ कि उनका पता नहीं चलता ], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं॥ ३ ॥

चौ०

सोनित स्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥४॥

भावार्थ

उसके काले शरीरसे रुधिर बहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेरूके पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा॥ ४ ॥

दो०

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस। महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥६९॥

भावार्थ

और बड़ा घोर शब्द करके गरजा। तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा॥ ६९ ॥

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