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दोहा 64

कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति

चौ०

महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना॥ कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥१॥

भावार्थ

भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्रघात ( बिजली गिरने ) के समान गरजा। मदसे चूर, रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली॥१॥

चौ०

देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥२॥

भावार्थ

उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त जानकर वे उसके मनको प्रिय लगे॥२॥

चौ०

तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥३॥

भावार्थ

[ विभीषणने कहा— ] हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी। उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया। दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [ बहुत ] प्रिय लगा॥३॥

चौ०

सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन॥४॥

भावार्थ

[ कुम्भकर्णने कहा— ] हे पुत्र! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है ( उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है )। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षसकुलका भूषण हो गया॥४॥

चौ०

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर॥५॥

भावार्थ

हे भाई! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा॥५॥

दो०

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥६४॥

भावार्थ

मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना। हे भाई! मैं काल ( मृत्यु )-के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता; इसलिये अब तुम जाओ॥६४॥

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