दोहा 56
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजन सुत बल भाषी॥ उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥१॥
भावार्थ
श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल बखानकर ( अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर ) चले। उधर एक गुप्तचरने रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया॥१॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥२॥
भावार्थ
रावणने उसको सारा मर्म ( हाल ) बतलाया। कालनेमिने सुना और बार-बार सिर पीटा ( खेद प्रकट किया )। [ उसने कहा— ] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?॥२॥
भजु रघुपति करु हित आपना। छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥३॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें रखो॥३॥
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई॥४॥
भावार्थ
मैं-तू ( भेद-भाव ) और ममतारूपी मूढ़ताको त्याग दो। महामोह ( अज्ञान )-रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो। जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं स्वप्नमें भी वह रणमें जीता जा सकता है?॥४॥
सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार। राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥५६॥
भावार्थ
उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमिने मनमें विचार किया कि [ इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा ] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है॥५६॥
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