दोहा 53
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥१॥
भावार्थ
उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल ( गौरवर्ण ) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े॥१॥
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥२॥
भावार्थ
पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर ‘श्रीरामचन्द्रजीकी जय’ पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ी-से-जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जयकी इच्छा कम न थी ( अर्थात् प्रबल थी )॥२॥
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥३॥
भावार्थ
वानर उनको घूँसों और लातोंसे मारते हैं, दाँतोंसे काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। ‘मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो’॥३॥
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥४॥
भावार्थ
नवों खण्डोंमें ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड ( धड़ ) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनन्द॥४॥
रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥५३॥
भावार्थ
खून गड्ढोंमें भर-भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है [ वह दृश्य ऐसा है ] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो॥५३॥
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