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दोहा 47

माल्यवान्‌का रावणको समझाना

चौ०

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥ समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥१॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये। उन्होंने अङ्गद और हनुमान्‌को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया। सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े॥ १॥

चौ०

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥२॥

भावार्थ

फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [ सब प्रकारके ] सन्देह दूर हो जाते हैं॥ २॥

चौ०

भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥ हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥३॥

भावार्थ

भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भयसे रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान्‌ और अङ्गद रणमें गरज उठे। उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे॥ ३॥

चौ०

भागत भट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥४॥

भावार्थ

भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर और भालू पकड़कर पृथ्वीपर दे मारते हैं। और अद्भुत ( आश्चर्यजनक ) करनी करते हैं ( युद्धकौशल दिखलाते हैं )। पैर पकड़कर उन्हें समुद्रमें डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा डालते हैं॥ ४॥

दो०

कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥४७॥

भावार्थ

कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़पर चढ़ गये। अपने बलसे शत्रुदलको विचलित करके रीछ और वानर [ वीर ] गरज रहे हैं॥ ४७॥

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